Sunday, February 4, 2018

दुनिया को गुरिल्ला युद्ध सिखाने वाली शिवाजी की पलटन के 250 साल पूरे


भारतीय सेना की सबसे पुरानी रेजीमेंट में से एक मराठा लाईट इंफेंट्री रविवार यानि 4 फरवरी को अपना 250वां स्थापना दिवस मना रही है. भारतीय सेना की इस रेजीमेंट का गठन छत्रपति शिवाजी महाराज ने किया था. बाद में अंग्रेंजों ने मराठा पलटन की गुरिल्ला-रणनीति से प्रभावित होकर इसे अपनी सेना का हिस्सा बना लिया था. लेकिन आज भी इस रेजीमेंट का स्थापना दिवस उसी दिन यानि 4 फरवरी को मनाया जाता है जिस दिन 1670 में शिवाजी  ने अपनी खास छापेमारी-युद्धकला से पहली बार सिंहगढ़ किले पर कब्जा किया था. आज यही गुरिल्ला युद्धकला दुनियाभर की 32 देशों की सेनाओं की ही एक खास रणशैली है.

मराठा लाइट इंफेंट्री के ढाई सौ साल पूरे होने के उपलक्ष्य में रेजीमेंटल सेंटर बेलगाम (कनार्टक) सहित पूरे भारतवर्ष में जहां जहां यूनिट्स तैनात हैं खास कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है. मराठा रेजीमेंट की हर यूनिट में आज भी शिवाजी की मूर्ति और तस्वीर जरूर मौजूद रहती है.

मराठा-लाई के ढाई सौ साल (250) पूरे होने के मौके पर भारतीय सेना शिवाजी महाराज पर एक किताब रिलीज करने जा रही है जिसमें उन्हें ‘नेवल विज़नरी’(NAVAL VISIONARY) माना गया है. क्योंकि माना जाता है कि शिवाजी ने ही भारत में आधुनिक काल की नौसेना के जंगी बेड़े की स्थापना की थी. यही वजह है कि मराठा-लाई के सभी पोस्टर्स पर मराठा नौसेना के सबसे प्रमुख एडमिरल, कान्होजी आंग्रे को भी दर्शाया गया है.

मराठा लाइट इंफेंट्री की आज भी कई यूनिट्स नौसेना और वायुसेना के जंगी बेंड़े के साथ तैनात रहती हैं. यही वजह है कि हाल ही में जब भारत ने रशिया के साथ सबसे बड़ी एक्सरसाइज, इन्द्रा की तो उसमें थलसेना का नेतृत्व मराठा रेजीमेंट ने ही किया था. यहां तक की इस साल 26 जनवरी को जब गणतंत्र दिवस परेड में 10 देशों के राष्ट्रध्यक्षों के सामने कदम-ताल करनी थी तो मराठा रेजीमेंट को भी चुना गया था. क्योंकि मराठा लाई के सैनिक सबसे तेज कदमों से मार्च-पास्ट करते हैं. वे 140 कदम प्रति मिनट के हिसाब से कदम-ताल करते हैं. मराठा लाई ही एक मात्र ऐसी भारतीय रेजीमेंट है जो हमेशा विश्राम की मुद्रा में रहती है. उसे सावधान-विश्राम कहने की जरुरत नहीं होती है.

कर्तव्य, मान और साहस...ये तीनों आर्दश-वाक्य जुड़े हैं भारतीय सेना की मराठा लाइट इंफेंट्री रेजीमेंट से. क्योंकि ये तीनों विशेषताएं छत्रपति शिवाजी से जुड़ी हुई हैं. यही वजह है कि इस रेजीमेंट का युद्धघोष ही है 'बोलो छत्रपति शिवाजी महाराज की जय.' और इस रेजीमेंट का हर सैनिक अपने को शिवाजी का साहसिक सैनिक मानकार अपने कर्तव्य और मान के लिए कुछ भी कर गुजर सकता है. मराठा लाइट इंफेंट्री यानि मराठा-लाई 4 फरवरी को अपना स्थापना दिवस इसलिए मनाती है क्योंकि इसी दिन 1670 में शिवाजी ने सिंहगढ़ किले पर अपना पताका फहराया था. इसके लिए उन्होनें एक खास प्राणी, घोरपड़ की मदद ली थी. घोरपड़ के पैरों में रस्सी बांधकर शिवाजी के सैनिक इस किले पर चढ़ गए थे.

हालांकि छत्रपति शिवाजी ने मराठा सैनिकों को 17वी शताब्दी में ही एकत्रित कर अपनी सेना खड़ी कर ली थी,लेकिन मराठा रेजीमेंट की स्थापना अंग्रेजों ने 1768 में की थी. यही वजह है कि मराठा रेजीमेंट की स्थापना के इस वर्ष ढाई सौ साल पूरे हो गए हैं. 1841 में अफगान-युद्ध में गुरिल्ला युद्धकला का इस्तेमाल कर मराठा सैनिकों ने दुश्मन के छक्के छुड़ा दिए थे. जिसके बाद अंग्रेजों ने मराठा रेजीमेंट को मराठा लाइट इंफेंट्री (यानि‘मराठा-लाई’) की उपाधि दी थी, जिसके कारण ये भारतीय सेना की पहली ऐसी लाइट रेजीमेंट बनी थी. यहां तक की आजादी के बाद भी जब भारतीय सेना ने अपनी खास स्पेशल फोर्स रेजीमेंट बनाई गईं तो मराठा-लाई की दो यूनिट्स को पैरा-एसएफ में तब्दील कर दी गई. ये हैं 4 पैरा और 21 पैरा. ये 21 पैरा वही है जिसने वर्ष 2015 में म्यांमार सीमा पर उग्रवादियों के कैंप्स पर पहली सर्जिकल स्ट्राइक की थी. आज दुनिया की करीब 32 देशों की सेनाओं में गुरिल्ला-वॉरफेयर को खास तौर से सिखाया जाता है.

मराठा लाइट इंफंट्री भारतीय सेना की सबसे पुरानी रेजीमेंट में से एक तो है ही साथ ही सबसे सम्मानित भी है. प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध में पूरी दुनिया में अपना लोहा मनवाने के साथ-साथ आजादी के बाद भी 1962 में चीन से जंग हो या फिर 1965 या 1971 सभी में मराठा रेजीमेंट ने अपनी बहादुरी और बलिदान से देश का नाम रोशन किया है. मराठा रेजीमेंट की एक यूनिट हमेशा जम्मू-कश्मीर में काउंटर-टेरिरज्म ऑपरेशन यानि आपरेशन रक्षक में शामिल राष्ट्रीय राईफल्स (आरआर) में तैनात रहती है. यहां पर आपको ये भी बता दें कि 60 के दशक में नागा-विद्रोह को कुचलने में भी मराठा रेजीमेंट ने खास भूमिका निभाई थी. 1947 से अबतक इस रेजीमेंट ने 05 महावीर चक्र, 05 अशोक चक्र, 14 क्रीति चक्र, 58 शोर्य चक्र और 44 वीर चक्र हासिल किए हैं. यही वजह है कि मराठा रेजीमेंट को 'जंगी-पलटन' के नाम से भी जाना जाता है.  

Friday, March 24, 2017

सैन्य साजो-सामान निर्यात करने के लिए तैयार है भारत

रक्षा मंत्री अरूण जेटली डीआरडीओ के सोनार सिस्टम का निरीक्षण करते हुए

भारत ने अब सैन्य साजो सामान का निर्यात करना शुरू कर दिया है. पहली बार भारत म्यामांर को टोरपीडो और युद्धपोत में इस्तेमाल होने वाले सोनार सिस्टम देना जा रहा है. इस बारे में आज डीआरडीओ ने रक्षा मंत्री अरूण जेटली को म्यांमार के साथ हुए समझौते की कॉपी सौंपी.

अभी तक भारत दुनिया के सबसे बड़े हथियारों के आयातक के तौर पर जाना जाता है. लेकिन अब भारत ने स्वदेशी सैन्य सामानों को निर्यात करना शुरु कर दिया है. ऐसे तीन (03) सोनार सिस्टम भारत म्यांमार को दे रहा है, जिनकी कुल कीमत करीब 180 करोड़ है. म्यांमार इन सोनार को अपने उंग-ज़ेया क्लास के वॉरशिप के लिए भारत से खरीद रहा है.

भारत म्यांमार को डीआरडीओ द्वारा निर्मित डायरेक्ट गियर सोनार-एैरे  दे रहा है. ये सोनार युद्धपोत के निचले हिस्सों में लगाया जाता है.  ये सोनार समंदर में दुश्मन के  युद्धपोत, पनडुब्बी और टोरपीडो का पता लगाने में कारगर साबित होता है. ये दुश्मन के युद्धपोत, पनडुब्बी और टोरपीडो की साउंड यानिआवाज से ही पता लगा लेती है. जिससे समय रहते उन्हें युद्धपोत के करीब आने से पहले ही नेस्तानबूत किया जा सकता है.
म्यांमार पहला देश है जिसे भारत टोरपीडो और सोनार निर्यात कर रहा है
इसके अलावा डीआरडीओ द्वारा डिजायन किए गए टोरपीडो का एक्सपोर्ट-करार भी म्यांमार से किया गया है. इस समझौते की कीमत 37.90 मिलियन डॉलर है. ये टोरपीडो एलएंडटी और बीडीएल मिलकर म्यांमार को लिए तैयार करेंगे.

डीआरडीओ ने इन एैरे-सोनार का उत्पादन शुरू कर दिया है. आज रक्षा मंत्री अरूण जेटली ने इस सोनार सिस्टम को नौसेना के हवाले कर दिया. नौसेना कुल दस (10) सिस्टम डीआरडीओ से खरीद रहा है.

आज डीआरडीओ भवन में हुए एक समारोह में रक्षा मंत्री  ने भारत में तैयार हुए 'ऊषस-2' सोनार सिस्टम को नौसेना प्रमुख अनुपल सुनी लांबा को सौंपी. ये सोनार सिस्टम पनडुब्बियों में लगाया जाता है. हाल ही में आई हिंदी फिल्म, 'द गाज़ी अटैक' में दिखाया गया था कि किस तरह से सोनार की मदद से भारतीय पनडुब्बी पाकिस्तान की गाज़ी नाम की सबमोरिन का पता लगाकर समंदर के नीचे ही मार गिराती है.
शिप नेवीगेशन सिस्टम

इसके अलावा डीआरडीओ ने युद्धपोतों के नेवीगेशन-सिस्टम बनाने का गौरव भी प्राप्त कर लिया है. अभी तक इस तकनीक को मात्र चार (04) देश ही अबतक बनाते थे. बाकी सभी देश इन चार देशों से अपने समुद्री जहाजों को चलाने के लिए इन चार देशों पर ही निर्भर रहते थे. ये चार देश हैं अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस और इजरायल. भारत पांचवा ऐसा देश है जिसने ये 'इनर्शियल नेवीगेशन सिस्टम फॉर शिप एप्लीकेशन' यानि आईएनएसए बनाने की महारत हासिल की है.


पाकिस्तान से हुआ तेज बहादुर का फोटो वायरल, सेना प्रमुख ने कहा टेक्नोलॉजी के साथ करो कदम-ताल

राजधानी दिल्ली में आयोजित मिलेट्री-कम्युनिकेशंस सम्मेलन, डेफकॉम
साईबर-हमलों और सोशल मीडिया पर दुश्मन का सामना करने के लिए सेना को टेक्नोलॉजी के साथ कदम-ताल करने की जरुरत है. क्योंकि टेक्नोलॉजी आज के समय में बेहद तेजी से बदल रही है. ये मानना है थलसेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत का. थलसेनाध्यक्ष के मुताबिक, हमारे जैसे देश को लगातार गैर-पारंपरिक युद्धों को झेलना पड़ेगा.

जनरल बिपिन रावत आज मिलेट्री-कम्युनिकेशन पर आयोजित सेना की सिग्नल कोर और सीआईआई के साझा सम्मलेन, डेफकॉम में बोल रहे थे. जनरल रावत का ये बयान उसदिन आया है जब बीएसएफ के जवान तेजबहादुर की फर्जी तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है. विश्वसनीय सूत्रों से जानकारी मिली है कि तेज बहादुर की इस फर्जी तस्वीर को सोशल मीडिया पर पाकिस्तान से जारी किया गया है. ये तस्वीर किसी के शव की है जिसे तेज बहादुर का बताकर वायरल किया जा रहा है. बीएसएफ पहले ही इस तस्वीर को फर्जी करार दे चुका है.

बीएसएफ के प्रवक्ता के मुताबिक, जवान तेज बहादुर "पूरी तरह से स्वस्थ और ठीक है." एक 'प्रोपेगेंडा' के तहत तेज बहादुर की फर्जी तस्वीर को वायरल किया जा रहा है.

दरअसल जिस शव को तेजबहादुर का बताकर भ्रम फैलाया जा रहा है वो दरअसल सीआरपीएफ के एक एएसआई, एच बी भट्ट का है जो 11 मार्च को छत्तीसगढ़ के सुकमा में माओवादियों के हमले में शहीद हो गए थे. इस हमले में सीआरपीएफ के कुल 12 जवान और अधिकारी शहीद हुए थे. भ्रामक प्रचार करने वाले पाकिस्तानी ट्वीटर एकाउंट ने सीआरपीएफ के शहीद के फोटो को तेज बहादुर का बताकर वायरल करने की कोशिश की.
सीआरपीएफ के शहीद एएसआई एच बी भट्ट

सम्मेलन में बोलते हुए सेना प्रमुख जनरल विपिन रावत ने कहा कि हम पसंद करें या ना करें लेकिन सोशल मीडिया तेजी से बढ़ रहा है. उन्होनें कहा कि साईबर-अटैक हमें लगातार परेशान करते रहेंगे. क्योंकि दुश्मन डिजीडाईजेशन और तकनीक का पूरा फायदा उठा रहा है.

थलसेनाध्यक्ष ने कहा कि आज के समय में तकनीक इतनी तेजी से बदल रही है कि जबतक हमतक  पहुंचती है वो पुरानी हो चुकी होती है. इसलिए बेहद जरुरी है कि हम इस बात की पहचान करें कि हमें कौन सी तकनीक और सैन्य साजों-सामान की जरुरत है. उनके ट्रायल को भी बहुत लंबा ना खींचें और समय रहते जरूरी साजों-सामान खरीद लिया जाए.

रक्षा राज्यमंत्री डाक्टर सुभाषराव भामरे की उपस्थिति में जनरल बिपिन रावत ने ये भी कहा कि हमें सरहद पर होने वाले पारंपरिक-युद्ध के लिए भी तैयार रहेना होगा.

Tuesday, March 21, 2017

हमारे लिए पीओके भी जम्मू-कश्मीर है: सर्जिकल स्ट्राइक हीरो

सर्जिकल स्ट्राइक के नायक मेजर रोहित सूरी सम्मानित

पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम देने वाले सेना के दो (02) शूरवीरों को आज वीरता मेडल से नवाजा गया. राष्ट्रपति भवन में हुए रक्षा अंलकरण समारोह में राष्ट्रपति ने दोनों को कीर्ति चक्र और शोर्य चक्र से नवाजा. इस मौके पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और तीनों सेनाओं के प्रमुख सहित कई गणमान्य मौजूद थे.

सर्जिकल स्ट्राइक में हिस्सा लेने वाली एक टीम का नेतृत्व करने वाले मेजर (रोहित सूरी) को कीर्ति चक्र से नवाजा गया है. मेडल देने के समय प्रशस्ति-पत्र पढ़कर सुनाया गया. बताया गया कि 'मेजर रोहित सूरी उस दल के मिशन लीडर थे जिसे जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी ठिकानों  पर कार्रवाई करने का कार्य सौंपा गया था.' धर्मयुद्ध के पास प्रशस्ति-पत्र की कॉपी है.

जैसै ही मेजर रोहित सूरी को राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने कीर्ति मेडल से अलंकृत किया, समारोह में मौजूद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और दूसरे गणमान्य व्यक्तियों ने जोरदार ताली की गड़गड़हाट से उनका सम्मान किया.

'मेजर रोहित सूरी ने अपनी निर्णायक सोच पेशेवर दृष्टिकोण, योद्घा स्वभाव, अनुकरणीय नेतृत्व तथा कर्तव्य से ऊपर उठकर अपने साहस से कार्य का क्रियान्वयन परिपूर्ण रूप से सुनिश्चित किया औऩर निकट मुठभेड़ में चार आतंकवादियों का सफाया कर दिया.'

मेजर रोहित सूरी सेना की स्पेशल फोर्स की चौथी बटालियन में जम्मू-कश्मीर में तैनात हैं.

प्रशस्ति पत्र में ना तो सर्जिकल स्ट्राइक का जिक्र किया गया है और पीओके की जगह 'जम्मू-कश्मीर' लिखा गया है. उस बारे में जब एबीपी न्यूज ने इस ऑपरेशन में शामिल एक अधिकारी से कारण पूछा तो उन्होनेें कहा कि हमारे लिए (पीओके) पूरा जम्मू-कश्मीर है."
नायब सूबेदार विजय कुमार को सम्मानित करते राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी

सम्मानित होने वालों में नायब सूबेदार विजय कुमार भी शामिल थे. 'विजय कुमार उस हमलावर टीम के सदस्य थे जिसे जम्मू कश्मीर में आतंकवादी ठिकानों पर कारवाई करने का कार्य दिया गया था. उन्होनें हमले से पहले  की गई गुप्त रेकी के दौरान महत्वपूर्ण सूचना एकत्र की और मिशन योजना को सुगम बनाया. हमले को दौरान वो उस दल को कमांडर थे जिन्हें सहयोगी गोलीबारी करने और आतंकवादी ठिकाने से अलग हो जाने को बाद टीम को निकालने में मदद करने का कार्य दिया गया था.'

रक्षा मंत्रालय के सूत्रो के मुताबिक सर्जिकल स्ट्राइक की टीम के बाकी सदस्यों को अगले महीने होने वाले अलंकरण समारोह के दूसरे हिस्से में वीरता मेडल से नवाजा गया है. हर साल ये समारोह दो बार होता है.

उरी में सेना के कैंप पर हुए हमले को बाद सेना ने 29 सितंबर को पीओके में घुसकर पाकिस्तानी सेना की मदद से चलाए जा रहे आतंकियों के लांचिग-पैड्स को स्पेशल फोर्स के कमांडोज़ ने सर्जिकल स्ट्राइक के बाद तबाह कर दिया था. इस हमले में शामिल डेढ़ दर्जन से भी ज्यादा (कुल 19) सेना के अधिकारियों और जवानों को सरकार ने वीरता मेडल से नवाजा है.

अलंकरण समारोह में पठानकोट हमले, जम्मू-कश्मीर और उत्तर-पूर्व राज्यों में आतंकियों का सफाया करने वाले शूरवीरों को भी वीरता मेडल से नवाजा गया. इसके अलावा सेना की पू्र्वी कमान के मुखिया, लेफ्टिनेंट जनरल प्रवीन बख्शी सहित वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों को परम विशिष्ठ सेवा मेडल (पीवीएसएम) और अति विशिष्ठ सेवा मेडल (एवीएसएम) से अलंकृत किया गया.

Friday, March 17, 2017

हथियारों के सबसे बड़े आयातक का 'टैग' हटाना चाहती है मोदी सरकार


रक्षा मंत्री अरुण जेटली ने आज कहा कि देश पर लगे सबसे बड़े हथियारों के आयातक के 'टैग' से सरकार खुश नहीं हैं. इसलिए मोदी सरकार चाहती हैं कि भारत का सबसे बड़ा आयातक देश रशिया हमारे देश में ही स्पेयर-पार्टस बनाने का काम करें.

रक्षा और वित्त मंत्री अरुण जेटली आज भारत-रशिया मिलेट्री इंडिस्ट्रियल कांफ्रेंस के उद्घाटन समारोह में राजधानी दिल्ली में बोल रहे थे. जेटली के मुताबिक, रशिया भारत का सबसे बड़ा स्ट्रेटेजिक-पार्टनर है और सबसे ज्यादा हथियार और सैन्य साजों-सामान भारत को रशिया से ही मिलता है. इसलिए वे चाहते हैं कि रशियन कंपनियां प्रधानमंत्री के मेक इंन इंडिया प्रोजेक्ट के तहत इन मिलेट्री-प्लेटफार्म्स के स्पेयर-पार्ट्स भारत में ही बनाने का काम करें. रक्षा मंत्री के मुताबिक, इससे भारत पर लगा सबसे बड़े आयातक का 'लेबल' तो हट ही जायेगा साथ ही सेनाओं को समय से स्पेयर पार्ट्स भी मिल सकेंगे.

भारत ने पहली बार किसी देश के साथ इस तरह का मिलेट्री इंडिस्ट्रियल सम्मेलन आयोजित किया है. ये साल भारत और रशिया के कूटनीतिक संबंधों का 70वां साल भी है. जेटली के मुताबिक, रशिया भारत का मुसीबत के समय का सामरिक-साथी (स्ट्रेटेजिक-पार्टनर’) है.

इस मौके पर बोलते हुए रशिया के ट्रैड और इंडस्ट्री मंत्री डेनिस मैंन्ट्यूरोव ने कहा कि रशिया भारत का भरोसेमंद और एकलौता ऐसा देश है जो भारत को तकनीक भी साझा करता है. उन्होनें कहा कि भविष्य में भी रशिया भारत को साजों-सामान देता रहेगा.

भारतीय सेनाओं को रशिया से सबसे ज्यादा हथियार और मिलेट्री-प्लेटफार्म्स मिलते हैं. इनमें नौसेना की पनडुब्बी (परमाणु भी), युद्धपोत, एयरक्राफ्ट कैरियर, मिग लड़ाकू विमानों से लेकर टैंक शामिल हैं. इसके अलावा भारत और रशिया मिलकर ब्रह्मोस मिसाइल और सुखोई लड़ाकू विमान भी मिलकर बनाते हैं.

दो दिन के सैन्य-सम्मलेन के दौरान आज एचएएल और रशियान कंपनियों के बीच सुखोई विमानों के स्पेयर पार्ट्स को लेकर पांच साल का करार हुआ.  

Monday, February 27, 2017

गुरमेहर के पिता शहीद तो हैं लेकिन करगिल युद्ध के नहीं !


दिल्ली विश्वविद्यालय की जिस छात्रा गुरमेहर कौर का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है और जिसकों लेकर विवाद खड़ा हुआ है, उसके पिता सेना के अधिकारी थे और आतंकियों से लड़ते हुए शहीद हुए थे.

सेना के रिकॉर्ड्स के मुताबिक, कैप्टन मंदीप सिंह अगस्त 1999 में जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा सेक्टर में आतंकियों से हुई एक एनकाउंटर में शहीद हो गए थे.

रिकॉर्ड्स के मुताबिक, वे सेना की एयर-डिफेंस रेजीमेंट के अधिकारी थे और करगिल युद्ध के तुरंत बाद यानि अगस्त 1999 में सेना की राष्ट्रीय राईफल्स यूनिट (4 आरआर) में तैनात थे. सेना की आरआर यूनिट कश्मीर में सीआईऑप्स यानि काउंटर-इनसर्जेंसी ऑपरेशन करती है. इसी एक ऑपरेशन के दौरान वे शहीद हो गए.

सूत्रों के मुताबिक, गुरमेहर के पिता कैप्टन मंदीप सिंह ने करगिल युद्ध में पाकिस्तान के खिलाफ भी लड़ाई लड़ी थी. उस वक्त वे 4 राष्ट्रीय राईफल्स में तैनात थे. लेकिन वे करगिल युद्ध के दौरान शहीद नहीं हुए थे. करगिल युद्ध 26 जुलाई 1999 को आधिकारिक तौर से खत्म हो गया था. हालांकि ये भी बात सही है कि शहीद, शहीद होता है चाहे वो  दुश्मन के खिलाफ जंग लड़ते हुए देश के लिए अपनी जान न्यौछावर कर दे या फिर आतंकियों से लड़ते हुए प्रॉक्सी-वॉर में.

मूलरुप से पंजाब के जालंधर के रहने वाले कैप्टन मंदीप सिंह अपने साथियों के बीच हैरी के नाम से मशहूर थे. कॉलेज में पढ़ने के दौरान उन्हें बॉडी-बिल्डिंग का शौक था और उन्होनें मिस्टर पंजाब और मिस्टर जालंधर प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया था.

अपने पिता की मौत के दौरान गुरमेहर महज़ दो (02) साल की थी. इनदिनों वो राजधानी दिल्ली के जानेमाने लेडी श्रीराम कॉलेज में पढ़ रही है. 
 22 फरवरी को रामदस कॉलेज में छात्रों के दो गुटों में हुई झड़प के बाद, गुरमेहर ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में एक छात्र-संगठन के खिलाफ पोस्ट डाली थी. ऐसे मे विरोधी गुट ने उसका छह महीने पुराना एक वीडियो वायरल कर दिया जिसमें वो अपने पिता को 'करगिल युद्ध का शहीद' बताते हुए कह रही थी कि उसके पिता को 'पाकिस्तान ने नहीं बल्कि युद्ध ने मारा है.' बस इसके बाद से ही सोशल मीडिया से लेकर दिल्ली यूनिवर्सिटी की सड़कों पर हंगामा बरपा हुआ है.

Tuesday, February 21, 2017

क्यों है भारत हथियारों का सबसे बड़ा आयातक !

भारत एक बार फिर दुनिया में हथियारों के सबसे बड़े आयातक के तौर पर उभर कर सामने आया है. हथियारों की खरीद-फरोख्त से जुड़े आंकड़े प्रस्तुत करने वाली जानी मानी अंतर्राष्ट्रीय संस्था, सिपरी ने ये घोषणा की है. सिपरी के मुताबिक, भारत के बाद सऊदी अरब, यूएई, चीन और अल्जीरिया दुनिया के सबसे बड़े आर्म्स-इम्पोर्टर हैं.


स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट यानि सिपरी के मुताबिक, 2012 से लेकर 2016 यानि पिछले पांच सालों में इंटरनेशनल आर्म्स ट्रांसफर की बात करें तो भारत का वैश्विक हथियारों की खरीद में कुल 13 प्रतिशत हिस्सा है. जबकि सऊदी अरब का हिस्सा 8.2, यूएई का 4.6 और चीन का 4.5 प्रतिशत हिस्सा है. पाकिस्तान नवें नंबर पर है.

सिपरी के मुताबिक, ग्लोबल आर्म्स ट्रांसफर में अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा निर्यातक है. वैश्विक आर्म्स ट्रेड में अमेरिका का कुल हिस्सा 33 प्रतिशत है, जबिक चिर-प्रतिद्धंदी रशिया का हिस्सा कुल 23 प्रतिशत है. इसके बाद चीन और फ्रांस करीब 6-6 प्रतिशत के साथ तीसरे और चौथे नंबर पर आते हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक, भारत को मिलने वाले बड़े हथियारों में  रशिया का सबसे बड़ा योगदान है. अभी भी भारत को जितने भी हथियार मिलते हैं उसमें रशिया का हिस्सा करीब 68 प्रतिशत है जबकि अमेरिका का हिस्सा 14 प्रतिशत है और इजरायल का 7.2 प्रतिशत है.

बताते चलें कि भारत को पिछले पांच सालों में रशिया से विमान-वाहक युद्धपोत, आईएनएस विक्रमादित्य (एडमिरल गोर्शोकोव), सुखोई लड़ाकू विमान, न्युकलिर परमाणु पनडुब्बी, आईएनएस चक्र (लीज पर), एमआई-17वी5 हेलीकॉप्टर और ट्रांसपोर्ट विमान मिले हैं. जबकि अमेरिका से सी-17 ग्लोबमास्टर और सी130 जे सुपर-हरक्युलिस मालवाहक विमान, पी8आई टोही विमान मिले हैं तो अपाचे और चिनूक हेलीकॉप्टर का सौदा हो चुका है. साथ ही 145 एम-777 होवित्जर गन्स की डील भी अमेरिका से हो चुकी है. फ्रांस से ही हाल ही में 36  रफाल लड़ाकू विमानों का सौदा भी भारत ने करीब 59 हजार करोड़ रुपये में किया है. इजरायल से भी मिसाइल, ड्रोन और रडारर्स के बड़े सौदे भारत ने किए हैं.

सिपरी रिपोर्ट के मुताबिक, अगर 2007-11 और 2012-16 के आंकड़ों की बात करें तो भारत के बड़े हथियारों के निर्यात में करीब 43 प्रतिशत की बढोत्तरी हुई है. गौरतलब है कि इस साल भारत का रक्षा बजट करीब 2.75 लाख करोड़ रुपये है (अगर इसमें रक्षा मंत्रालय से जुड़ी पेंशन मिला दें तो ये करीब 3.40 लाख करोड़ रुपये पहुंच जाता है). इसमें से 87 हजार करोड़ रुपये सेनाओं के साजों-सामान के लिए निर्धारित किया गया है.

जानकारों के मुताबिक, भारत की जियो-पोलिटिकलस्थिति इस तरह है कि उसे हमेशा युद्ध के लिए तैयार रहना होगा. दो तरफ से भारत ऐसे देशों से घिरा हुआ है जिनसे युद्ध हो चुके हैं और जो भारत की सीमाओं में घुसने की ताक में हरदम बैठे रहते हैं. लेकिन स्वदेशी हथियार बनाने में नाकाम रहने के चलते भारत को अपने मित्र-देशों से हथियारों का आयात करना पड़ता है.

आजादी के बाद से भारत एक-दो नहीं बल्कि चार बड़े युद्ध लड़ चुका है (1948, 62, 65, 71). इसके अलावा करगिल, सियाचिन, नाथूला-चोला और सुंगद्रांशु सैन्य झड़पें भी भारत झेल चुका है. पाकिस्तान समर्थितप्रोक्सी-वॉर किसी से छिपा नहीं रहा है. हाल ही में उरी में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने जब पाकिस्तान की सीमा में घुसकर सर्जिकल-स्ट्राइक की गई तो युद्ध जैसे हालत खड़े हो गए थे. ऐसे में भारत को अपनी सैन्य-तैयारियां हमेशा रखनी होगी. भारत के सामरिक-रणनीतिकार ये भी भली-भातिं जानते हैं कि अगर इस बार पाकिस्तान से युद्ध हुआ तो चीन जरूर सीधे तौर से हस्तक्षेप कर सकता है. इसलिए भारत को 'टू फ्रंट वॉर' के लिए भी जरूरी सैन्य तैयारी करके रखनी पड़ेगी. 

साथ ही हिंद महासागर में जिस तरह से चीन और चीन की पनडुब्बियां का दबदबा बन रहा है उसको देखते हुए भारतीय नौसेना को भी जरुरी साजों-सामान से लैस करना बेहद जरुरी है.

जानकारों की मानें तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मेक इन इंडिया कार्यक्रम के तहत स्वेदशी आयुद्ध कंपनियां को बढ़ावा दिया जा रहा है ताकि हथियारों के लिए भारत की सेनाओं को आयात पर ज्यादा निर्भर ना रहना पड़े. इसके तहत माना जा रहा है कि अगले दस (10) सालों में भारत का रक्षा मंत्रालय हथियारों के निर्यात का बजट आधा करने की जुगत में है. हाल ही में रक्षा राज्यमंत्री सुभाषराव भामरे ने एक सार्वजनिक सभा में इस बात की घोषणा भी की थी.

सिपरी रिपोर्ट के मुताबिक, मिडिल-ईस्ट में चले रहे संघर्ष के चलते सऊदी अरब और यूएई जैसे देश भी हथियारों की बड़ी तादाद में आयात कर रहे हैं. शीत-युद्ध के बाद पहली बार दुनिया के आर्म्स-ट्रांसफर का बजट इतना ज्यादा बढ़ा है.