Sunday, January 4, 2015

झोल में भी हैं कई झोल !

कई पत्रकारों ने तो ट्वीट कर यहां तक चुटकी ले ली कि रक्षा और सामरिक मामलों के 'बड़े' रिपोर्टर और संपादकों को ये बात हजम नहीं हो रही है कि पाकिस्तानी संदिग्ध बोट की स्टोरी उन्होनें क्यों नहीं ब्रेक की और इसीलिए वे कोस्टगार्ड के ऑपरेशन पर सवाल खड़े कर रहे हैं...

नए साल के दूसरे दिन राजधानी दिल्ली में जबरदस्त ठंड पड़ रही थी. सूर्य देवता तो दूर-दूर तक कहीं नजर नहीं आ रहे थे, चारों तरफ कुहासा छाया हुआ था. लेकिन दिन के दूसरे पखवाड़े में जैसे ही ये खबर आई कि भारत की समुद्री सीमा में गोला-बारुद से भरी एक पाकिस्तानी नाव पकड़ी गई है, अनायास ही दिल्ली के मौसम में गर्मी पैदा हो गई. खबरों की दुनिया में अगर आतंक से जुड़ी किसी खबर में पाकिस्तान जुड़ जाता है तो भारत में तो क्या अमेरिका तक में उसकी तपस साफ दिखाई पड़ने लगती है. अमेरिका में लोकप्रिय हो रहे होमलैंड सीरियल में जिस तरह पाकिस्तान और वहां पनप (माफ कीजिए फल-फूल) रहे आंतकवाद को दिखाया गया है वो इसे समझने के लिए काफी है. लेकिन पाकिस्तान की संदिग्ध नाव ने (शायद पहली बार) भारतीय मीडिया को दो धड़ों में बांट दिया. और फिर शुरु हुई झोल में झोल की कहानी. कैसे, आईये देखते हैं. 

      नए साल को शुरु हुए अभी ज्यादा घंटे नहीं बीते थे कि 2 जनवरी की दोपहर को खबर आई कि गुजरात के पोरबंदर से करीब 365 किलोमीटर दूर भारतीय समुद्री सीमा में एक पाकिस्तानी नाव पकड़ी गई है. नाव में गोला-बारुद और हथियार भरा था. लेकिन इससे पहले कि भारतीय कोस्टगार्ड के अधिकारी उस नाव और उसमें मौजूद चार संदिग्ध लोगों को पकड़ पाते उन्होनें नाव को खुद आग के हवाले कर दिया. कोस्टगार्ड का एक समुद्री-जहाज आईसीजी राजरतन और डोरनियर एयरक्राफ्ट पाकिस्तान से आई संदिग्ध नाव को घेरे हुए थे, लेकिन इससे पहले की उसे अपने कब्जे में कर पाते उसमें धमाके के साथ आग लग गई.

     रक्षा मंत्रालय के मुताबिक, 31 दिसम्बर को कोस्टगार्ड को खुफिया जानकारी मिली थी कि पाकिस्तान में कराची के करीब केटी-बंदर(गाह) से एक मछली-पकड़ने वाली नौका भारत की तरफ निकली है और अरब सागर में कोई गैर-कानूनी लेनदेन कर सकती है. इसी सूचना के आधार पर कोस्टगार्ड ने टोही विमान डोरनियर को अरब सागर में सर्च करने के लिए भेजा. कुछ घंटे बाद डोरनियर ने साफ कर दिया कि अरब सागर में एक संदिग्ध नाव खड़ी हुई है. कई घंटे तक उसपर नजर रखने के बाद भी जब वो नाव एक ही जगह खड़ी पाई गई तो डोरनियर ने समुद्र में गश्त लगा रहे कोस्टगार्ड के जहाज राजरतन को इस संदिग्ध बोट के बारे में जानकारी दी. कुछ ही देर में राजरतन जहाज इस बोट के करीब पहुंच गया.
     
     जैसा कि इस तरह की संदिग्ध बोट के बारे में एसओपी (स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसिजर यानि नियम-कानून) होते हैं, कोस्टगार्ड के अधिकारियों ने इस बोट से थोड़ी दूरी बनाकर लाउडस्पीकर से चेतावनी दी कि नाव में सवार (चार) लोग अपनी पहचान बताएं. लेकिन अपनी पहचान बताने की बजाए चारों लोग नाव को विपरीत दिशा में लेकर भागने लगे. कोस्टगार्ड का जहाज लगातार नाव को रुकने की चेतावनी देता रहा, लेकिन बोट नहीं रुकी. करीब एक घंटे तक पीछा करने के बाद सुबह के करीब साढ़े तीन बजे (1 जनवरी 2015 यानि नए साल के आगाज पर) कोस्टगार्ड के अधिकारियों ने देखा कि नाव में मौजूद चारों लोग नीचे डेक में चले गए हैं और बोट को आग लगा दी है. आग लगाते ही बोट में धमाका हुआ और आग की उंची-उंची लपटें उठने लगीं. ये सभी तस्वीरें कोस्टगार्ड के अधिकारियों ने अपनी कैमरे में कैद कर लीं. बोट में मौजूद चारों लोग आग के साथ स्वाहा हो गए या फिर समुद्र में कूद गए इस बात का कोस्टगार्ड के अधिकारियों को भी ठीक-ठीक नहीं पता है. लेकिन संभावना इस बात की ज्यादा है कि वे चारों इस आग की चपेट में आ गए थे.
   
     पाकिस्तानी संदिग्ध बोट और उसमें लगी आग की कई मीटर ऊंची लपटों की तस्वीरें जैसे ही भारतीय मीडिया में आईं, चारों तरफ सनसनी फैल गई. लोगों को 2008 की मुंबई (26/11) हमले की याद ताजा होने लगी. किस तरह से पाकिस्तान के कराची से समंदर के रास्ते बोट में आए दस आतंकियों (कसाब सहित) ने देश की व्यापारिक राजधानी मुंबई पर हमला किया और 166 लोगों (जिनमें विदेशी नागरिक भी शामिल थे) को बड़े ही बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया था.
  
       हालांकि रक्षा मंत्रालय ने मीडिया के लिए जारी प्रेस रिलीज में कहीं इस बात का जिक्र नहीं किया था कि ये बोट किसी आतंकी घटना को अंजाम देने आए थी, या उसमें गोला-बारुद भरा था. हां इतना जरुर लिखा था कि आग में नाव लगने के बाद धमाका हुआ था. उसी से मीडिया ने अंदाजा लगाना शुरु कर दिया कि हो ना हो इस नाव में विस्फोटक-सामग्री और हथियार हो सकते हैं. क्योंकि ऐसा नहीं था तो बोट में मौजूद लोग भागते क्यों और नाव को आग के हवाले क्यों करते. बस फिर क्या था सभी को लगा कि मुंबई के 26/11 जैसा दूसरा हमला समय रहते खुफिया एजेंसियों और कोस्टगार्ड की मुस्तैदी से टाल दिया गया.
    
     ये बात जरुर है कि रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर के एक ट्वीट ने इस थ्योरी को मजबूत कर दिया कि ये संदिग्ध पाकिस्तानी नाव किसी आतंकी घटना को अंजाम देने के इरादे से भारत की समुद्री-सीमा में दाखिल हुई थी. रक्षा मंत्री ने 2 जनवरी की शाम को ट्वीट किया कि “...आंतकियों को ले जारी रही बोट को समय रहते पकड़ने के लिए कोस्टगार्ड को बधाई देता हूं.

      लेकिन अपनी खोजी पत्रकारिता के लिए माने जाने वाले अखबार इंडियन एक्सप्रेस ने  देर रात अपनी वेबसाइट पर ये खबर प्रकाशित कि आतंक की बोट वाली थ्योरी में झोल है. ये लेख लिखा था सामरिक मामलों के संपादक प्रवीण स्वामी ने. एक-एककर उन्होनें बताने की कोशिश की कि जिसे आतंक की बोट माना जा रहा है वो दरअसल समुद्र में स्मगलिंग करने वाले छुटभैये तस्करों की थी और उसमे शराब या फिर सल्फर जैसा कोई पदार्थ था जिसमें आग लगाई गई थी, ना कि गोला-बारुद में.

     लेकिन जैसे ही इंडियन एक्सप्रेस की ये स्टोरी ऑन-लाइन प्रकाशित हुई बवाल खड़ा हो गया. हेडलाइंस टुडे के एंकर-पत्रकार ने ट्वीटर पर प्रवीण स्वामी की खबर पर सवाल खड़े कर दिए कि उनकी स्टोरी की पहली लाइन ही गलत है. क्योंकि कोस्टगार्ड या फिर रक्षा मंत्रालय ने आधिकारिक प्रेस रिलीज में कहीं भी आतंक शब्द का इस्तेमाल ही नहीं किया था. ना ही इस बात का दावा किया गया था कि उस बोट में मौजूद लोग आतंकी थे. जल्द ही प्रवीण स्वामी को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होनें तुरंत ही अपनी स्टोरी में हुई गलती सुधार ली. संपादित स्टोरी अगले दिन के अखबार में प्रकाशित हुई.  उन्होनें सवाल खड़ा किया कि क्या मच्छीमार नाव (पाकिस्तानी संदिग्ध नाव) कोस्टगार्ड के स्टेट ऑफ द आर्ट जहाज एक घंटे तक छका सकती है (जैसा कि रक्षा मंत्रालय की प्रेस विज्ञप्ति में छपा था). साथ ही जिस रात अरब सागर में कोस्टगार्ड ने इस ऑपरेशन को अंजाम दिया, मौसम विभाग की वेबसाइट के मुताबिक, मौसम बिल्कुल सामान्य था. दरअसल, रक्षा मंत्रालय ने प्रेस-रिलीज में लिखा था कि संदिग्ध बोट में मौजूद लोगों को ढूंढने और नाव के मलबे को ढूंढने में खराब मौसम के चलते मुश्किल आ रही है.
   
     साथ ही ये भी लिखा कि आग की उंची-उंची  लपटें किसी दूसरी नाव को क्यों नहीं दिखाई दीं. सवाल ये भी खड़ा किया गया कि एनटीआरओ यानि नेशनल टेक्निकल रिर्सच ऑर्गेनाईजेशन ने जो कराची का जो फोन इंटरसेप्ट किया था उसे आईबी और रॉ जैसे दूसरी (बड़ी) खुफिया एजेंसियों से क्यों नहीं साझा किया था.

    प्रवीण स्वामी का तर्क है कि अगर नाव में विस्फोट होता तो उसके परखच्चे उड़ गए होते. लेकिन रक्षा मंत्रालय द्वारा जारी तस्वीरों में ऐसा कुछ नहीं दिखाई दे रहा था.
  
    सामरिक मामलों को प्रवीण स्वामी काफी अर्से से कवर कर रहे हैं, ऐसे में वो अगर कुछ लिखते हैं तो उसमें दम नजर आता है. लेकिन अगर गौर से देखें तो उनके तर्कों में ही झोल नजर आते हैं. पहला ये कि कोस्टगार्ड और भारतीय नौसेना कभी भी किसी संदिग्ध बोट के करीब तबतक नहीं जाती जबतक कि उन्हे पूरा यकीन ना हो जाए कि उसके करीब जाना खतरे से खाली नहीं है. किसी भी संदिग्ध बोट को शुरुआत में पहचान स्थापित करने के लिए लाउडस्पीकर पर चेतावनी दी जाती है. सभी जानते है कि अगर पाकिस्तानी नाव में बारुद होता (जैसा कि संदेह किया जा रहा है) और कोस्टगार्ड के जहाज को करीब आने पर वो उस नाव को उससे टकरा देते तो क्या हश्र होता. जो तस्वीरें हम देख रहे हैं उससे साफ है कि बोट में कई मीटर ऊंची लपटें उठ रहीं हैं. अमेरिकी युद्धपोत 'कॉल' को ठीक इसी इसी तरह से वर्ष 2000 में यमन में आत्मघाती हमले में अलकायदा के आतंकियों ने नष्ट कर दिया था. इस हमले में आतंकियों ने गोला-बारुद से भरी एक छोटी नाव को अमेरिका जहाज से उस वक्त टकराकर तहस-नहस कर दिया जब वो एडन में रिफ्यूलिंग कर रहा था.  यूएस नेवी के 17 अधिकारी और नौसैनिक इस आत्मघाती हमले में मारे गए थे और करीब दो दर्जन घायल हुए थे.

          सितंबर 2013 में तालिबानी आतंकियों ने कराची में खड़े पाकिस्तानी नौसेना के युद्धपोत पर कब्जे करने की कोशिश की थी. माना जा रहा है कि उस जहाज पर कब्जा कर आतंकी भारत के किसी युद्धपोत से टकराकर नष्ट करने की योजना बना रहे थे. लेकिन उनके नापाक मंसूबे पूरे होने से पहले ही आतंकियों को पाकिस्तानी सुरक्षाबलों ने ढेर कर दिया. खबर ये भी आई कि इस नाकाम साजिश में पाकिस्तानी नौसेना के अधिकारी भी मिले हुए थे.

       कराची की इस घटना के बाद से ही भारतीय नौसेना के मुखिया एडमिरल आर के धवन ने खुलासा किया था कि हमारे युद्धपोत पाकिस्तानी जहाजों के करीब नहीं जाते हैं. साफ है कि कराची की घटना के बाद से ही नौसेना और कोस्टगार्ड पाकिस्तानी जहाज और बोट्स से दूरी बना कर रखते हैं. तो ऐसे में ये कहना कि कोस्टगार्ड के अधिकारियों को पाकिस्तानी संदिग्ध बोट को पकड़कर उसमें मौजूद लोगों को हिरासत में लेना चाहिए, थोड़ा मुश्किल लगता है. साथ ही अगर कोस्टगार्ड के सुरक्षाबल नाव पर फायरिंग करते और किसी बेगुनाह मछुआरे की मौत हो जाती तो कितना बवाल खड़ा हो जाता (इटली के मेरिन कमांडो का मामला जग-जाहिर है).

    रही (साफ और खराब) मौसम की बात तो सभी जानते हैं कि मौसम विभाग की दी हुई सूचना कई बार गलत साबित हुई हैं. कई बार देखा गया है कि मौसंम विभाग साफ आसमान की जानकारी देता है लेकिन अगले ही दिन बारिश हो जाती है-समुद्र के मौसम का अनुमान लगाना तो और ज्यादा मुश्किल है. एयरएशिया का विमान QZ8501 खराब मौसम के चलते ही सुराबाया से सिंगापुर जाते वक्त क्रैश हुआ था. यहां ये बात दीगर है कि दुनियाभर की फ्लाईट्स और विमान मौसम विभाग के अनुमानित-जानकारी के आधार पर ही हवा में उड़ते हैं. लेकिन ना जाने कब मौसम खराब हो जाए, इसका ठीक-ठीक अंदाजा मौसम विभाग भी नहीं निकल सकता है.

     अगर कोस्टगार्ड द्वारा जारी संदिग्ध बोट को गौर से देखेंगे तो पता चलेगा कि अरब सागर में वो बोट अकेली खड़ी है. दूर-दूर तक कोई दूसरी बोट या फिर जहाज नहीं दिखाई दे रहा है. ऐसे में अगर रात के अधेंरे में कोई विशाल अरब सागर में एक बोट में धमाका और आग लगती है तो जरुरी नहीं है कि उसे किसी ने देखा ही हो. अगर देखा भी हो तो जरुरी नहीं कि वे लोग पत्रकारों या फिर मछलीमार-यूनियन को जाकर ही बताएं. जरुरी ये भी नहीं कि तट से 365 किलोमीटर दूर समुद्र में किसी नाव ने ये देखा हो तो वो इतनी जल्दी क्या समुद्रतट पर पहुंच सकती है.


     रक्षा मंत्रालय या फिर कोस्टगार्ड ने ये कभी नहीं कहा कि बोट बारुद से लदी हुई थी. हो सकता है शराब या फिर किसी दूसरे ज्वलनशील पदार्थ की आड़ में संदिग्ध लोग हथियारों का कोई जखीरा लेकर भारत की सरजमीं पर आना चाहते हों या फिर किसी को ट्रांसफर करने के इरादे से खड़े हो. अगर एक-47 जैसी गन और हेंडग्रेनेड (जैसा आंतकी 26/11 के हमले के दौरान लेकर आए थे) उस आग में स्वाह हो गईं हों तो जरुरी नहीं है कि बोट के परखच्चे उड़ जाएं.

     रही बात इंटेलीजेंस साझा करने की, तो कई बार व्यक्तिगत तौर पर खुफिया अधिकारी पुलिस और सुरक्षाबलों में अपने दोस्तों से खुफिया जानकारी शेयर कर लेते हैं. 26/11 हमले से पहले ना जाने कितनी बार दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल (आतंक-विरोधी दस्ता) के अधिकारी कश्मीर से लेकर पंजाब, बिहार, मुंबई और कोलकाता तक आतंकियों को गिरफ्तार या फिर मुठभेड़ में ढेर कर देते थे. ये सब स्पेशल सेल के एक आला-अधिकारी के एक खुफिया अधिकारी की खास दोस्ती के चलते ही संभव हो पाता था. लेकिन मुंबई हमले के बाद स्थिति बदल गई है. अब सभी खुफिया सूचना को मल्टी एजेंसी सेंटर (मैक) में सभी खुफिया एजेंसियों के साथ साझा करना पड़ता है.

     लेकिन अगर कोई मुसीबत सिर पर खड़ी हो जैसाकि पोरबंदर वाली पाकिस्तानी बोट के मामले में हुआ तो क्या कोई इंटेलीजेंस-ऑफिसर या एजेंसी मैक की मीटिंग का इंतजार करेगा. कराची के केटीबंदर से निकली संदिग्ध नाव अंर्तराष्ट्रीय सीमा को पार कर भारत की समुद्री सीमा में आ चुकी थी और लगातार कराची में बैठे अपने संपर्क-सूत्रों से दिशा-निर्देश ली रहे थे. ये संपर्क-सूत्र कोई और नहीं आईएसआई और पाकिस्तान की मेरिन सिक्योरिटी एजेंसी (पाकिस्तानी कोस्टागार्ड) है जो अपने देश की नेवी के अंतर्गत काम करती है. वही नौसेना जिसके अधिकारियों के आतंकियों से रिश्ते की कहानी सितंबर 2013 में ही सामने आ चुकी थी. वो सीधे उस अलर्ट से जुड़ी सुरक्षा एजेंसी को इसकी खबर करेगा-जैसाकि इस संदिग्ध नाव के बारे में हुआ. एनटीआरओ (के अधिकारियों) ने समुद्र से जुड़े खतरे के अलर्ट को उन्ही एजेंसियों को दिया, जो उससे जुड़ी थीं-कोस्टगार्ड और नौसेना. अब ये भी खबर आ रही है कि गुजरात पुलिस को भी इस अलर्ट के बारे में आगाह किया गया था. तो ऐसे में आईबी या रॉ के साथ इस (खतरे की बोट की) सूचना को साझा नहीं किया तो क्या आफत आ गई.
 
    दबी जुबान में तो लोग ये भी कह रहे हैं कि दरअसल, इस संदिग्ध नाव की कहानी में किसी को झोल नजर आ रहे है तो वो देश की बड़ी गुप्तचर एजेंसी आईबी (इंटेलीजेंस एजेंसी) को. इसीलिए अगर झोल कहीं है तो वो है आईबी और एनटीआरओ के रिश्तों में. लोग तो यहां तक कह रहे हैं कि आईबी को ये बात हजम नहीं हो रही है कि जुमा-जुमा चार दिन पहले खड़ी की गई एनटीआरओ इतने सफल ऑपरेशन का हिस्सा कैसे बन गई-एनटीआरओ का जन्म वर्ष 2004 में हुआ था. यही वजह है कि कोस्टगार्ड के ऑपरेशन में झोल की स्टोरियों दरअसल आईबी प्लांट करा रही है.  लेकिन यहां मुद्दा ये नहीं है कि किसी फंला एजेंसी ने क्या स्टोरी प्लांट की है. मुद्दा है फैक्टस (तथ्यों) का.


पत्रकारों ने तो ट्वीट कर ये तक कह डाला कि रक्षा और सामरिक मामलों के बड़े जानकारों (रिपोर्टर और संपादकों) को ये बात हजम नहीं हो रही है कि पाकिस्तानी संदिग्ध बोट की स्टोरी उन्होनें क्यों नहीं ब्रेक की.  रक्षा मंत्रालय और कोस्टगार्ड ने इतनी बड़ी स्टोरी उन्हे क्यों नहीं पहले बताई.  बस इसी बात की खुन्नस निकालने के लिए वे कोस्टगार्ड के ऑपरेशन को नीचा दिखाने की कोशिश में उसपर सवाल खड़े कर रहे हैं.

वैसे अगर एंडियन एक्सप्रेस और प्रवीण स्वामी (और कांग्रेस पार्टी) को छोड़ दें तो ज्यादातर न्यूज चैनल और अखबार, कोस्टगार्ड और रक्षा मंत्रालय की थ्योरी पर सवाल ही नहीं खड़ा कर रहे हैं.

खुद कोस्टगार्ड और रक्षा मंत्रालय ने साफ किया कि इस संदिग्ध मामले की जांच जारी है और जांच पूरी होने के बाद ही संदिग्ध नाव की पूरी तस्वीर साफ हो पायेगी. और अधिकतर मीडिया इस जांच पूरी होने का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं.

Saturday, December 20, 2014

चंगेज़ खान और भारत-चीन सीमा विवाद

 चीन अपने पड़ोसी देश मंगोलिया से किस कदर डरता था इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि चीन ने ग्रेट वॉल ऑफ चायनामंगोलिया द्वारा लगातार किए जाए रहे आक्रमणों को रोकने के उद्देश्य से ही बनवाई थी...

मध्यकालीन मंगोलियाई बर्बर सम्राट चंगेज़ खान का नाम सुनकर अच्छे-अच्छे सुरमाओं के पसीने छूट जाते हैं. 12वी और 13वी सदी के शुरुआत में चंगेज खान नें ना केवल मंगोलिया के बिखरे हुए लड़ाकू-कबीलों को एकजुट और संगठित किया बल्कि दुनिया के एक बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया था. चीन से लेकर बुखारा, समरकंद, रशिया, अफगानिस्तान, ईरान, ईराक, बुल्गारिया और हंगरी तक चंगेज खान का साम्राज्य फैला हुआ था. जहां-जहां भी चंगेज़ खान की फौज जाती उसकी बर्बरता के कारण लोग दहशत के मारे कांपने लगते. एक अनुमान के मुताबिक, चंगेज खान (1162-1227 ईसवी) ने करीब 4 करोड़ लोगों को मौत के घाट उतारा था जिनमें, बड़े-बड़े राजाओं, सिपहसलारों और सैनिकों सहित आम नागरिक भी शामिल थे. माना जाता है कि जब चंगेज़ खान ने चीन पर आक्रमण किया और उसकी राजधानी बीजिंग (प्राचीन नाम झोंगडु) पर कब्जा किया तो उसके बाद चीन की जनसंख्या में बड़ी गिरावट दर्ज की गई थी. 

चंगेज़ खान की मूर्ति

          ऐसे में 800 साल बाद जब मंगोलिया की फौज भारत को अपने देश के सबसे बड़े राजा, चंगेज़ खान की मूर्ति भेंट स्वरुप पेश करती है तो इन दोनों देशों के बीच सैंडविच, चीन की त्यौंरियां जरुर चढ़ सकती हैं.

          हाल ही में मंगोलिया की बॉर्डर फोर्स के अधिकारी भारत के दौरे पर आए थे. इस दौरान भारत की सबसे बड़ी सीमा सुरक्षा बल, बीएसएफ के साथ मंगोलिया ने सीमा-सुरक्षा के क्षेत्र में आपसी सहयोग बढ़ाने के करार पर सहमति जताई. जैसा कि ऐसे समारोह में अक्सर होता है बीएसएफ के डीजी ने शिष्टाचार के नाते मंगोलिया के प्रतिनिधि-मंडल को भेंट स्वरुप शील्ड प्रदान की. लेकिन समारोह में मौजूद सभी लोग उस वक्त हतप्रभ रह गए जब मंगोलिया के प्रतिनिधि-मंडल का नेतृत्व कर रहे बॉर्डर-एथोरिटी के चीफ, ब्रिगेडयर-जनरल लाहचिंजव ने बीएसएफ के महानिदेशक को अपने देश के सबसे महान राजा चंगेज़ खान की मूर्ति भेंट की.

          हालांकि भारत का मंगोलिया के साथ कोई साझा सीमा-क्षेत्र नहीं है लेकिन दोनों देशों के बॉर्डर में कई समानताएं हैं. दोनो देशों की एक बड़ी सीमा चीन से लगी हुई है. मंगोलिया की साढ़े चार हजार (4500) किलोमीटर से भी ज्यादा लंबी सीमा चीन से सटी है. इसी तरह से भारत का भी करीब 4000 किलोमीटर लंबा बॉर्डर चीन से लगा हुआ है. दोनों देशों का चीन के साथ लंबा सीमा विवाद रहा है. दोनों ही देशों का सीमा क्षेत्र बर्फीले पहाड़ों से लेकर रेगिस्तान तक फैला हुआ है.

        जिस तरह से भारत और चीन का लंबा सीमा विवाद रहा है और लगातार चीन के भारत में घुसपैठ की खबरें आतीं रहतीं हैं, इसी तरह से कभी चीन और मंगोलिया के बीच भी विवाद था. चीन का अपने सभी पड़ोसी देशों से सीमा को लेकर विवाद रहा है. लेकिन चीन अगर किसी देश से डरता था तो वो था मंगोलिया. चीन अपने पड़ोसी देश मंगोलिया से किस कदर डरता था इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि चीन ने ग्रेट वॉल ऑफ चायनायानि लंबी-दीवार  मंगोलिया द्वारा लगातार किए जाए रहे आक्रमणों को रोकने के उद्देश्य से ही बनवाई थी. छह हजार (6000) किलोमीटर लंबी दीवार बनवाकर चीन ने अपनी सीमाओं को मंगोलियाई आक्रंताओं से बचाने की कोशिश की थी, जो आज दुनिया के सात अजूबों में शुमार करती है.

        लेकिन कुछ साल पहले चीन ने मंगोलिया के साथ सीमा-करार कर लिया और उसके बाद से दोनों देशों के बीच सदियों से चली आ रही तल्खी काफी कम हो गई. अब दोनों देशों के संबध काफी सुधर गए हैं.

       ऐसे में मंगोलिया के भारत के साथ रक्षा और सामरिक सहयोग का महत्व काफी बढ़ जाता है. 
बहुत संभावनाएं हैं कि जरूरत पड़ने पर (युद्ध इत्यादि की ) मंगोलिया भारत के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा दिखाई दे सकता है.

            साथ ही भारत मंगोलिया से एक सीख भी ले सकता है. वो ये कि अगर मंगोलिया और चीन के बीच सीमा विवाद सुलझ सकता है तो क्या भारत और चीन के बीच बॉर्डर विवाद नहीं सुधर सकता ?
सीमा पर चीन और मंगोलिया के जवान (साभार गूगल इमेज)
      भारत बॉर्डर-मैनेजमेंट में मंगोलिया से काफी कुछ सीख सकता है. मंगोलिया प्रतिनिधि मंडल जब भारत के दौरे पर आया तो उसने बीएसएफ के डीजी डी के पाठक को चंगेज़ खान की मूर्ति के साथ-साथ एक फोटो-एलबम बुक भी भेंट की. इस एलबम में दिखाया गया था कि किस तरह से सदियों से मंगोलिया के लड़ाके अपने देश की सीमाओं को सुरक्षा प्रदान करते आ रहे हैं. साथ ही मंगोलिया का बॉर्डर इतिहास बताता है कि किस तरह से अपने स्वाभिमान के साथ समझौते किए बगैर सीमा विवाद को (चीन के साथ) भी सुलझाया जा सकता है.

        दोनों देशों की बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स के बीच में हुए करार के मुताबिक, बीएसएफ, मंगोलिया के बॉर्डर गार्ड्स को स्पेशल ऑपरेशन और प्राकृतिक आपदाओं से निपटने में ट्रैनिंग देगी. इसी तरह से बीएसएफ, एसएसबी और आईटीबीपी (चीन सीमा पर तैनात भारत का बॉर्डर फोर्स) के अधिकारी समय-समय पर मंगोलिया की यात्रा पर जाएंगे और सीमा-सुरक्षा का अध्यन करेंगे.  
चंगेज खान का साम्राज्य (पीले भाग में)
       कहते हैं कि चंगेज़ खान जब पूरी दुनिया को जीतने के इरादे से अपने सेना के साथ निकला तो वो अफगानिस्तान तक पहुंच गया था और गजनी (पेशावर भी) पर कब्जा कर लिया था. माना जाता है कि वो भारत पर भी आक्रमण करने का इरादा रखता था. वो सिंधु नदी पार कर उत्तर-भारत से होता हुआ आसाम के रास्ते मंगोलिया लौटना चाहता था. लेकिन किन्ही कारणों से उसे पेशावर से ही वापस लौट जाना पड़ा. 

           भारत में मुगल-शासन की नींव रखने वाला बाबर अपने को चंगेज़ खान का वशंज मानता था. बाबर मानता था कि उसकी मां चंगेज़ खान के वंश की थी. कुछ इतिहासकारों के मुताबिक, 'मुगल' शब्द भी 'मंगोल' से ही निकला है यानि मंगोल-प्रजाति के वंशज. ऐसे में ऐसा नहीं माना जा सकता है चंगेज खान की मूर्ति भेंट करने से ही भारत के मंगोलिया से रिश्ते की नई शुरुआत हुई है. मंगोलिया से भारत का रिश्ता उतना ही पुराना है जितना मुगल-शासन का भारतवर्ष से यानि ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामरिक.



Tuesday, December 9, 2014

सेना, सोशल-मीडिया और कश्मीर-ऑपरेशन



     


हमारी सेना की नीतियां और संस्कार, जिन्हे मजबूत सैन्य न्याय-प्रणाली का आधार प्राप्त है, दुनिया में सर्वोत्तम हैं. वे हमें मार्गदर्शन के साथ-साथ सुरक्षा प्रदान करने का काम भी करेंगी


हाल ही में जम्मू-कश्मीर की दो-तीन घटनाओं ने पूरे देश का ध्यान अपनी और खींचा है. वैसे तो जम्मू-कश्मीर आजादी के बाद से ही दुनिया के पटल पर किसी ना किसी कारण से चर्चा (विवादों) में रहा है. चाहे वो बंटवारे के तुरंत बाद पाकिस्तान समर्थित जेहादियों द्वारा कश्मीर पर आक्रमण हो और या फिर भारतीय सेना द्वारा कठिन परिस्थितियों मे युद्ध लड़ना रहा हो या फिर नेहरु द्वारा युद्ध-विराम की घोषणा हो या जम्मू-कश्मीर के मुद्दे को संयुक्त-राष्ट्र में सुलझाना हो या फिर जनमत संग्रह, किसी ना किसी कारण से जम्मू-कश्मीर का विवादों से चोली-दामन का साथ रहा है.

      लेकिन पिछले 25-30 सालों से आतंक की मार झेल रहे कश्मीर में अब शांति की किरण नजर आने लगी थी. हाल ही के विधानसभा चुनावों के शुरुआती दौर में बड़ी तादाद में मतदान ने इस थ्योरी को और बल दिया कि जम्मू-कश्मीर की आवाम अब शांति चाहती है. वहां का युवा हाथों में एके-47 लिए-लिए थक गया है. 

      ऐसे में पिछले महीने यानि 3 नबम्बर को बड़गाम में सेना के जवानों द्वारा कार में जा रहे दो कश्मीरी युवकों पर गलती से फायरिंग करना और उनकी मौत हो जाने से एकबार फिर घाटी में अशांति फैलने का डर पैदा हो गया. वो बात और है कि घटना के तुरंत बाद ही सेना के नार्थन कमांड (जिसके अंतर्गत जम्मू-कश्मीर राज्य आता है) के जीओसी लेफ्टिनेंट जनरल डी एस हुड्डा द्वारा गलती स्वीकार करने के चलते मामला तूल नहीं पकड़ा. लेकिन इस घटना से एक बार फिर राज्य में लागू आर्म्ड फॉर्स स्पेशल पॉवर (आफ्सपा) एक्ट को हटाने की मांग पकड़ने लगी.

   
ये मामला अभी शांत भी नहीं हुआ था कि 5 दिसम्बर को उरी में सेना के तोपखाने पर फिदाईन हमला हो गया. सेना ने छह विदेशीआतंकियों को तो मार गिराया लेकिन इस मुठभेड़ में सेना के लेफ्टिनेंट कर्नल समते आठ जवान शहीद हो गए. आतंकियों से लड़ने आए जम्मू-कश्मीर पुलिस के तीन जवानों को भी इस एनकाउंटर में शहादत प्राप्त हुई. 

       इस एनकाउंटर के बाद, पहले तो सोशल मीडिया और फिर कुछ अखबारों में ये प्रचार होने लगा कि उरी में सेना के कैंप पर जब हमला हुआ तो वहां तैनात जवानों ने इसलिए आतंकियों पर देर से फायरिंग की क्योंकि वे अपने सीनियर अधिकारियों के आदेश का इतंजार कर रहे थे. उन्हे बड़गाम घटना का डर सताने लगा था, कि बिना अधिकारियों के आदेश के वे गोलियां नहीं चलाएंगे. हालांकि सेना ने इस तरह के दुष्प्रचार का पुरजोर विरोध किया.

      
लेकिन सोशल मीडिया पर इस दुष्प्रचार ने इसलिए भी जोर पकड़ा क्योंकि बड़गाम की घटना के बाद जम्मू-कश्मीर क्षेत्र में सेना के जीओसी (यानि जनरल ऑफिसर इन कमांडिग) लें.जनरल डी एस हुड्डा ने अपने सभी मातहत अधिकारियों को एनकाउंटर और सेना के ऑपरेशन्स को लेकर एक चिठ्ठी लिखी थी, जो किसी तरह से लीकहो गई थी. इस चिठ्ठी के उजागर होने के बाद ही उरी में फिदाईन-हमला हो गया और व्हॉटसअप जैसे सोशल मीडिया साईट्स पर ये  संदेश तेजी से फैलने लगा कि जवानों ने आतंकियों की गाड़ी पर इसलिए रोकने या फायरिंग नहीं की क्योंकि कुछ दिन पहले ही (बड़गाम घटना) एक कार को रोकने के चक्कर में सैनिकों ने फायरिंग कर दी थी, जिसके बाद उन सैनिकों का कोर्ट-मार्शल हो गया था. व्हॉटसअप मैसेज में लिखा था कि कोर्ट-मार्शल झेलने से अच्छा है आतंकियों की गोलियों से मर जाना. इस संदेश में सेना के उच्च-अधिकारियों के नेतृत्व पर भी सवाल खड़े किए गए थे.
       
       
लेकिन सेना मुख्यालय इस व्हॉटसअप मैसेज का पुरजोर विरोध कर रहा है. उनका मानना है कि आतंकियों को रोकने और फायरिंग करने में कोई देरी नहीं हुई थी. ना ही सुरक्षाकर्मियों ने अपने सीनियर अधिकारियों से फायरिंग के लिए ऑर्डर लिया था. उन्होनें तुरंत ही फिदाईन हमलावरों को मुकाबला करना शुरु कर दिया था. जिसके चलते ही छह घंटे के अंदर ही मिलेट्री-ट्रैनिंगपाए उन आतंकियों को मार गिराया गया. साथ ही आतंकी किसी गाड़ी में नहीं आए थे जैसाकि बड़गाम घटना में आए थे. इसलिए उन्हे रोकने और ना रोकने का सवाल ही नहीं खड़ा होता.

        ऐसे में ये एक बड़ा सवाल खड़ा होता है कि क्या ये पाकिस्तान और अलगाववादियों द्वारा फैलाया जा रहा दुष्प्रचार तो नहीं है ? जो किसी तरह से हमारे बहादुर सैनिकों का मनोबल गिराना चाहते हैं. क्योंकि, भारतीय सेना की रीढ़ हैं ये बहादुर जवान जिनके त्याग, बलिदान और शहादत के किस्से ना केवल हमारे देश बल्कि दुनियाभर में प्रसिद्ध हैं. यही वजह है कि ब्रिटेन जैसा देश भी हमारे सैनिकों (जिन्होने विश्व-युद्ध में हिस्सा लिया था) के लिए वॉर-मेमोरियल बना रहा है.

      लेकिन ये भी सवाल लाजमी है कि आखिर जनरल हुड्डा ने उस चिठ्ठी में ऐसा क्या लिखा था कि सोशल मीडिया पर सेना के उच्च-नेतृत्व पर सवालिया निशान लगने लगे. इस पत्र का पूरा मजमून कुछ यूं है....

       
         “ मैं ये पत्र सभी कमांडिग ऑफिसर्स को एक महत्वपूर्ण मुद्दे पर लिख रहा हूं जो सभी अपनी-अपनी यूनिट तक पहुंचा दें. आज हम सभी उत्तरी-कमान में ऐसी चुनौतियों से जूझ रहे हैं जिनसे मुकाबला करना ही हमें ना केवल पूरे राष्ट्र बल्कि अपनी नजरों में ये बताएगा कि हम अपने आप को किस तरह से परखते हैं.
     
      बड़ी ही बहादुरी और बलिदान के बाद हम जम्मू-कश्मीर में छद्म-युद्ध पर काबू कर पाए हैं. लेकिन ये शांति बड़ी नाजुक है. आज की स्थिति पहले के मुकाबले ज्यादा मुश्किल है जब आतंकियों को ज्यादा से ज्यादा संख्या में मार गिराना ही हमारे कामयाबी का मापदंड था. आज हमें आतंकी हिंसा पर काबू पाने के साथ-साथ स्थानीय अभिलाषाओं को भी ध्यान में रखना होगा. हालांकि सिद्धांत में इस को भली-भांति समझते हैं लेकिन हकीकत में इस को और अधिक समझने की जरुरत है. हम जो ऑपरेशन्स करते हैं उन्हे आज के माहौल के अनुरुप ढालने की जरुरत है. बिडवंना ये है कि हमारे काम का ढंग माहौल के साथ कदमताल नहीं कर पा रहा है. मेरी सभी कमांडिग-ऑफिसर्स से दरख्सात है कि वे अधिकारियों और जवानों की ट्रैनिंग की तरफ ज्यादा से ज्यादा ध्यान दें और समझाएं कि हम किस तरह के वातावरण में काम कर रहे हैं और हमारी आंचर-संहिता (कॉड-ऑफ-कंडक्ट) क्या हैं.

       प्रिंट, इलैक्ट्रोनिक या फिर सोशल मीडिया, ये सभी ऐसे महत्वपूर्ण औजार हैं जो ना केवल जनमानस के विचारों को प्रभावित करते हैं बल्कि हमारे अधिकारियों और जवानों की भावनाओं को भी प्रभावित कर सकते हैं. लेकिन हमें इनका शिकार नहीं बनना हैं. हम इनका  मुकाबला अपने बहादुरी से और इससे कर सकते हैं कि हम जो कर रहे हैं वो पेशेवर तरीके से उचित है और सम्मानजनक है. सेना जम्मू-कश्मीर में एक काम करने आई है और वो हम बेहतर तरीके से करेंगे. गलतियां हो जाती हैं. मैं आपको विश्वास दिलाना चाहता हूं कि मुझे पता है कि आप विषम परिस्थितियों में काम कर रहे हैं लेकिन किसी के साथ कोई अन्याय नहीं होगा. ये संदेश सभी यूनिट्स तक पहुंचना चाहिए.


       हमारी सेना की नीतियां और संस्कार, जिन्हे मजबूत सैन्य न्याय-प्रणाली का आधार प्राप्त है, दुनिया में सर्वोत्तम हैं. वे हमें मार्गदर्शन का और बचाने का काम भी करेंगी. आप और आपके सैनिक एक बेहतरीन काम कर रहे हैं और आप सबका ख्याल मेरे ध्यान में सर्वोपरि है.

       जनरल हुड्डा की इस चिठ्ठी से दो-तीन बातें साफ हो जाती है. पहला तो ये कि जिस तरह से 90 के दशक में सेना आंतकियों को चुनचुनकर मारती थी-जैसा कि हाल ही में रिलीज हुई हिंदी फिल्म हैदर में दर्शाया गया था-वो प्रणाली खत्म हो गई है.

       दूसरा कश्मीर घाटी में हालत तेजी से बदल रहे हैं. यानि
अब वहां के लोग अमन-चैन चाहते हैं. ऐसे में जबतक जरुरत ना हो वहां के लोगों पर गोलियां ना बरसाईं जाएं. लेकिन इसका अर्थ ये कदापि नहीं हैं कि आतंकियों की गोलियां का जवाब ना दिया जाये. अपनी देश के स्वाभिमान और अपनी रक्षा से ऊपर कुछ नहीं है.

       तीसरा ये कि मीडिया में (खासतौर से सोशल मीडिया) प्रचारित (दुष्)प्रचार की तरफ ज्यादा ध्यान देने की जरुरत नहीं है. अपना काम यानि देश की सीमाओं और स्वाभिमान के साथ-साथ जो काम दिया गया है (जम्मू-कश्मीर में शांति-बहाली) उसे पेशेवर तरीके से पूरा करें.

तीसरा ये कि हमारी सेना की नीतियां और न्याय-प्रणाली किसी भी जवान के साथ अन्याय नहीं होने देगी.
 
      लेकिन उरी के घटना के बाद सेना को एक नई चुनौती का सामना जरुर करना पड़ रहा है और वो है सोशल मीडिया. माना जाता है कि भारतीय सेना का प्रचार-तंत्र बहुत मजबूत है. यहां तक की अमेरिकी सेना की तर्ज पर ही भारतीय सेना में भी एमआई यानि मिलैट्री-इंटेलीजेंस के अंतर्गत इंर्फोमेशन-वॉरफेयर की एक अलग यूनिट काम करती है. कभी साईकोलोजिकल-ऑपरेशन्स (साई-ऑप्स) के नाम से जाने वाली आईडब्लू यूनिट दुश्मन-देश और उनकी सेनाओं के साथ-साथ आंतकी संगठनों के मीडिया में दुष्प्रचार को रोकने और जवाब देने में अहम भूमिका निभाती है. लेकिन अब आईडब्लू यूनिट को सोशल-मीडिया से दो-दो हाथ करने के लिए भी कमर कसनी होगी.

Thursday, December 4, 2014

चोल राजा राजेन्द्र की सैन्य विरासत

राजेन्द्र चोल ने भी भारत की उस सांस्कृतिक और सैन्य विरासत का ही अनुसरण किया था जैसा रामायण में राम और बाद में चक्रवर्ती सम्राट अशोक ने किया था

राजेन्द्र चोल की 1000वी जयंती को मनाने के लिए समुद्री-यात्रा पर निकलता आईएनएस सुर्दशनी
 
हमारे देश का ये ना केवल इतिहास है बल्कि सांस्कृतिक विरासत भी है कि हमने ना तो किसी देश पर हमला किया है और ना ही उनपर कभी अपनी प्रभुता स्थापित की. अगर हमला किया और दूसरे देश पर विजय हासिल की है तो उसके पीछे कोई ना कोई कारण रहा होगा. भगवान राम ने लंका पर हमला कर अपनी पताका फैलाई थी तो सिर्फ इसलिए की वहां के राजा रावण ने उनकी पत्नी का अपहरण कर बंधक बना लिया था. अपनी पत्नी को वापस पाने के लिए ही राम ने समुद्र पर पुल बनाया और लंका पहुंचकर रावण का वध कर अपनी पत्नी को सकुशल वापस पा लिया. लेकिन लंका पर विजय हासिल करने के बाद भी राम ने वहां शासन नहीं किया. बल्कि रावण के भाई विभीषण को वहां का राजा बनाकर वापस अपने राज्य अयोध्या वापस लौट आए.

        ये कहानी इतनी ही पुरानी है जितना पुराना भारतवर्ष का पुराणिक-इतिहास है. लेकिन हाल ही में भारत के रक्षा मंत्री ने इस कहानी को दुहरा कर एक बार साफ कर दिया कि हम चाहे कितने भी शक्तिशाली क्यों ना हो जाएं लेकिन हम किसी दूसरे देश पर बिना किसी कारण के हमला नहीं करेंगे. लेकिन रक्षा मंत्री ने इसके साथ ही ये भी साफ कर दिया कि इतिहास गवाह है कि जिस देश की नौसेना शक्तिशाली है उसी ने पूरी दुनिया पर राज किया है.

        आज यानि 4 दिसम्बर को नौसेना दिवस है. 1971 के पाकिस्तान-युद्ध में भारत की जीत में अहम भूमिका निभाने के बाद से ही नौसेना हर साल 4 दिसम्बर को ये दिवस मनाती है. 
लेकिन ये साल भारतीय नौसेना दक्षिण-भारत के चोल राजवंश के प्रतापी राजा राजेन्द्र-प्रथम के राज्यभिषेक की एक हजार जंयती भी मना रही है. 1014 ईसवी में राजेन्द्र ने चोल राज्य की कमान संभाली थी. उस वक्त चोल राज्य आज के तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और आंध्र-प्रदेश के बड़े हिस्सों तक फैला था. राजेन्द्र (1014-1044 ईसवी) से पहले उनके बड़े भाई (कहीं पर पिता कहा गया है) राजराजा चोलवंश के राजा थे और उन्होनें अपने राज्य की सीमा को तमिलनाडु से बढ़ाकर दूसरे पड़ोसी राज्य तक फैलाई थीं. 1012 में राजराजा ने अपने छोटे भाई (या पुत्र) को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था. दो साल तक दोनों भाईयों ने एक साथ चोल राज्य पर शासन किया. हालांकि अपने भाई के राज्यकाल के दौरान ही राजेन्द्र ने कई युद्धों में अहम भूमिका निभाई थी जिसके चलते ही चोल राज्य की सीमाएं तमिलनाडु से बढ़कर पड़ोसी राज्यों तक फैल गई थीं.

        लेकिन राजेन्द्र चोल को इतिहास में इसलिए अधिक याद किया जाता है क्योंकि उन्होनें समुद्र पार कर ना केवल (श्री)लंका बल्कि दक्षिण-पूर्व के कई देश जैसे सुमात्रा, मलाया और जावा (आज के इंडोनेशिया) तक अपनी जीत का पताका फहराया था. उस वक्त सुमात्रा और उसके आस-पास के द्वीपों में श्रीविजया नाम का राज्य था. समुद्रतट के करीब सम्राज्य होने के चलते चोल राजाओं ने अपनी एक बड़ी नौसेना तैयार की थी. इसी नौसेना के बदौलत राजेन्द्र चोल ने दक्षिण-पूर्व के देशों तक अपनी जीत का परचम फहराया था. साथ ही उसने समुद्र के रास्ते चीन तक अपने राजनयिक-मिशन भेजे थे. इसके अलावा बर्मा (म्यंमार) और बांग्लादेश तक चोल राज्य के निशान दिखाई पड़ते हैं.
 
       लेकिन सवाल खड़ा होता है कि क्या राजेन्द्र चोल भारतीय इतिहास में ऐसा अपवाद है जिन्होनें दूसरे देश पर हमला किया, जो भारत की सांस्कृतिक विरासत के उलट है. यानि बिना किसी कारण के दूसरे देशों पर हमला करना. अगर ऐसा है तो भारतीय नौसेना राजेन्द्र चोल के राज्यभिषेक की 1000वी जयंती क्यों मना रही है ? क्या भारतीय नौसेना भी राजेन्द्र चोल की तरह ही हिंद महासागर में अपना वर्चस्व कायम करना चाहती है ?

      इसका जवाब ठीक-ठीक किसी के पास नहीं है कि राजेन्द्र ने श्रीविजया राज्य पर क्यों आक्रमण क्यों किया. कुछ इतिहासकारों का मानना है कि राजेन्द्र ने अपने समकालीन राज्यों चेरा, पांड्या और कलिंगा राज्य पर पहले ही विजय हासिल कर ली थी. यहां तक की उसकी सेना गंगा तक लड़ने गई थी, यानि दक्षिण से लेकर उत्तर के राज्यों तक उसने जीत हासिल कर ली थी. गंगा कूच कर लौटने के बाद ही राजेन्द्र ने अपनी नई राजधानी गंगाईकोंडा-चोलापुरम की स्थापना की थी. लगभग पूरे भारतवर्ष पर फतह हासिल करने के बाद उसने श्रीविजया सम्राज्य की और कूच किया. उसका मकसद वहां भारतवर्ष और चोलराज्य की पताका फहराना था. इसकी एक वजह ये भी हो सकती है क्योंकि उसने श्रीविजया पर विजय पाने के बाद उसने दिग्विजय की उपाधि अपने नाम के साथ जोड़ ली थी.
चोल सम्राज्य और चीन को भेजे राजनयिक-मिशन का समुद्री-रुट


     लेकिन कुछ इतिहासकारों का मानना है कि राजेन्द्र के श्रीविजया पर हमले करने की तिथि यानि तारीख को गौर से देखना होगा. उसी में उसके हमले करने का राज़ छिपा है. राजेन्द्र चोल ने श्रीविजया देश पर आक्रमण किया था 1025 ईसवी में. इससे पहले यानि 1016 में राजेन्द्र ने एक राजनयिक-मिशन समुद्र के रास्ते चीन भेजा था. ये मिशन राजनयिक के साथ-साथ व्यापारिक भी था. कुछ इतिहासकारों के मुताबिक, ऐसा प्रतीत होता है कि श्रीविजया राज्य ने राजेन्द्र के मिशन के चीन जाने में अड़ंगा अड़ाया था. वो राजेन्द्र के मिशन को चीन नहीं जाने देना चाहता था, इसलिए सबक सिखाने के इरादे से राजेन्द्र ने श्रीविजया राज्य पर आक्रमण किया था. दरअसल, राजेन्द्र ने श्रीविजया राज्य पर वर्ष 1025 में आक्रमण किया था. यानि चीन को भेजे जाने वाले पहले मिशन (1016) के नौ साल बाद. इसके बाद दूसरा मिशन भेजा 1033 में यानि श्रीविजया पर विजय हासिल करने के आठ साल बाद.

        ऐसे में इस बात को बल मिलता है कि श्रीविजया पर आक्रमण करने का मुख्य मकसद श्रीविजया को सबक तो सिखाना था ही, चीन तक जाने वाले समुद्री-रास्ते को किसी भी अड़चन से साफ रखना भी था. क्योंकि चीन का समुद्री-रास्ता श्रीविजया के राज्य की सरहदों से गुजरता था. साथ ही राजेन्द्र चोल ने श्रीविजया के राजा संग्राम विजयतुंगवर्मन को हराकर उसे कब्जा नहीं किया. बल्कि विजयतुंगवर्मन को एक बार फिर से राजा बना दिया, लेकिन इस शर्त पर की उसे चोलराज्य की अधीनता स्वीकार करनी पड़ेगी. यही वजह है कि राजेन्द्र प्रथम की मौत के कई साल बाद का एक तमिल अभिलेख (1088 ईसवी) सुमात्रा में पाया गया जिसमें लिखा था कि दोनों देशों (चोल और श्रीविजया) के बीच में कई सदियों तक संबध कायम थे.
राजेन्द्र चोल द्वारा स्थापित राजधानी गंगाईकोंडा-चोलापुरम

      साफ है कि राजेन्द्र चोल ने भी भारत की उस सांस्कृतिक और सैन्य विरासत का ही अनुसरण किया था जैसा रामायण में राम और बाद में चक्रवर्ती सम्राट अशोक ने किया था. यहां तक की जब राजेन्द्र चोल ने श्रीलंका पर आक्रमण किया और विजय हासिल की तो वहां के सिंहली राजा को ही राज्य सौंपकर अपने देश वापस लौट आया था. सिंहली राजा ने भी राजेन्द्र चोल की अधीनता स्वीकार कर ली थी.

      राजेन्द्र चोल को कम्पूचिया (कंबोडिया) के खमेर राजा और थाईलैंड से भेंट भी मिलती थी. जो एक राजा दूसरे राजा को स्वाधीन होने के वक्त ही देता है या फिर तब देता है जबकि दोनों के बीच में मधुर संबध रहे हों. साथ ही राजेन्द्र की एक उपाधि थी कदर्रम-कोंडनजिसका अर्थ है वो जिसने केदाह (आज के मलेशिया) पर जीत हासिल की हो.

    शायद यही वजह है कि भारतीय नौसेना राजेन्द्र चोल के राज्यभिषेक की 1000वी जंयती मना रही है. इस प्रण के साथ की हम किसी देश पर आक्रमण नहीं करेंगे. लेकिन अगर कोई हमारे समुद्री-हितों के बीच में (खासकर हिंद महासागर में) अड़चन या फिर टकराने की जुर्रुत करेगा तो उसका वही हाल होगा जो राजेन्द्र चोल ने श्रीविजया सम्राज्य का किया था.