Wednesday, September 14, 2016

राफेल फाइटर प्लेन : एशिया का गेम-चेंजर

फ्रांस के साथ हुए सौदे में जो 36 राफेल (या रफाल) फाइटर प्लेन भारत को मिलने वाले हैं, वे अत्याधुनिक हथियारों और मिसाइलों से लैस हैं. खास है दुनिया की सबसे घातक समझे जाने वाली हवा से हवा में मार करन वाली 'मेटेओर' मिसाइल. ये मिसाइल चीन तो क्या किसी भी एशियाई देश के पास नहीं है. यानि राफेल प्लेन वाकई दक्षिण-एशिया में गेम-चेंजर साबित हो सकता है.

सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, भारत ने राफेल सौदे में करीब 710 मिलियन यूरो (यानि करीब 5341 करोड़ रुपये) लड़ाकू विमानों के हथियारों पर खर्च किए हैं. गौरतलब है कि पूरे सौदे की कीमत करीब 7.9 बिलियन यूरो है यानि करीब 59 हजार करोड़ रुपये है.

रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर के मुताबिक, राफेल सौदा आखिरी चरण में है और आखिरी मुहर लगनी बाकी है. सौदे से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक, सौदे का प्रारुप तैयार किया जा रहा है और अगले कुछ दिनों में सौदे की घोषणा कर दी जायेगी. अभी ये सौदा इंटर गर्वमेंटल कमेटी के पास फाइनल होने के लिए भेजा गया है.

जानकारी के मुताबिक, वियोंड विज्युल रेंज ‘मेटेओर’ मिसाइल की रेंज करीब 150 किलोमीटर है. हवा से हवा में मार करने वाली ये मिसाइल दुनिया की सबसे घातक हथियारों में गिनी जाती है. इसके अलावा राफेल फाइटर जेट लंबी दूरी की हवा से सतह में मार करने वाली 'स्कैल्प' क्रूज मिसाइल और हवा से हवा में मार करने वाली 'माइका' मिसाइल से भी लैस है.

सूत्रों के मुताबिक, राफेल प्लेन में एक और खासयित है. वो ये कि इसके पायलट के हेलमेट में ही फाइटर प्लेन का पूरा डिस्पले सिस्टम होगा. यानि उसे प्लेन के कॉकपिट में लगे सिस्टम को देखने की जरुरत भी नहीं पड़ेगी. उसका पूरा कॉकपिट का डिस्पले हेलमेट में होगा.

माना जा रहा है कि सौदे पर स्टैंप लगने के बाद पहला प्लने अगले 36 महीने में भारत पहुंच जायेगा. सभी 36 प्लेन अगले 66 महीने में भारतीय वायुसेना में शामिल होने के लिए तैयार हो जायेंगे.

जानकारी के मुताबिक, राफेल बनाने वाली कंपनी से भारत ने ये भी सुनिश्चित कराया है कि एक समय में 75 प्रतिशत प्लेन हमेशा ऑपरेशनली-रेडी रहने चाहिए. इसके अलावा भारतीय जलवायु और लेह-लद्दाख जैसे इलाकों के लिए खास तरह के उपकरण लगाए गए हैं.

राफेल का फुल पैकेज कुछ इस तरह है. 36 विमानों की कीमत 3402 मिलियन यूरो, विमानों के स्पेयर पार्टस 1800 मिलियन यूरो के हैं जबकि भारत के जलवायु के अनुरुप बनाने में खर्चा हुआ है 1700 मिलियन यूरो का. इसके अलवा पर्फोमेंस बेस्ड लॉजिस्टिक का खर्चा है करीब 353 मिलियन यूरो का.

Tuesday, September 13, 2016

सारागढ़ी की लड़ाई अब रुपहले परदे पर !


विश्व- प्रसिद्ध ऐतिहासिक ‘सारागढ़ी की लड़ाई’ पर जाने-माने फिल्मकार राजकुमार संतोषी फिल्म बनाने जा रहे हैं. आज राजधानी दिल्ली में रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर, सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी और सूचना एवम प्रसारण राज्य मंत्री राज्यवर्धन राठौर ने फिल्म का मुहूर्त शॉट दिया. फिल्म में मुख्य भूमिका में हैं रणदीप हुड्डा.

सारागढ़ी की लड़ाई 12 सितबंर 1897 को पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा पर सारागढ़ी चौकी पर लड़ी गई थी. इस लड़ाई में 21 सिख योद्धाओं ने 10 हजार अफगानी कबीलाईयों से मुकाबला किया था. हालांकि लड़ते लड़ते सभी 21 सिख सैनिक शहीद हो गए थे, लेकिन मरने से पहले उन्होनें 600 अफगानियों को मौत के घाट उतार दिया था. करीब साढ़े छह घंटे चली इस लड़ाई में बेहद बहादुरी से लड़े इन वीर सैनिकों ने अफगानी कबीलाईयों को नाकों चने चबा दिए थे. यही वजह है कि यूनेस्को ने इस लड़ाई को इतिहास की आठ (08) सर्वश्रेष्ठ बहादुरी की गाथाओं में जगह दी है.

राजकुमार संतोषी ने इस फिल्म का टाइटल दिया है ’21 द लास्ट स्टैंड---द बैटेल ऑफ सारागढ़ी’. फिल्म के मुहूर्त शॉट के लिए राजधानी दिल्ली में सेना के मानेकशॉ-सेंटर में रणदीप हुड्डा और बाकी 20 सैनिकों को अंग्रेजों की फौज की वर्दी में मुहूर्त शॉट लिया गया. खास बात ये है कि मुहूर्त शॉट की क्लैपिंग केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने की और कैमरे पर थे मनोहर पर्रीकर और राज्यवर्धन राठौर. राजकुमार संतोषी ने फिल्म के महूर्त के लिए 12  सितम्बर का ही दिन चुना--यानी जिस दिन ये लड़ाई वास्तव में लड़ी गयी थी आज से 119 साल पहले. 

सारागढ़ी की लड़ाई की बारे में कम ही लोग जानते हैं. यही वजह है कि राजकुमार संतोषी इस लड़ाई को फिल्मी पर्दे पर उतारकर देश के आमजन तक पहुंचाने चाहते हैं. इस मौके पर बोलते हुए राजकुमार संतोषी ने कहा कि इस फिल्म के जरिए देश की गौरवगाथा का तो लोगों को पता चलेगा ही साथ ही सिखों को भी बालीवुड में एक उचित स्थान मिलेगा, जो अभी तक सिर्फ कॉमेडियन या फिर छोटे मोटे रोल तक सीमित रह जाते हैं. इस फिल्म के जरिए सिखों की बहादुरी की सच्ची कहानी लोगों तक पहुंचेगी. मिलेट्री इतिहास के जानकारों के मुताबिक हमारे देश के कम लोग ही इस विश्व-प्रसिद्ध जंग से वाकिफ हैं. हालांकि कई देशों की फौज में इस लड़ाई को (ट्रेनिंग) कोर्स के दौरान पढ़ाया जाता है--की कैसे विपरीत परिस्तिथियों में भी अपना मोर्चा नहीं छोड़ते हैं और दुश्मन से डटकर मुक़ाबला करते हैं.  

1897 में जब ये लड़ाई लड़ी गई थी उस वक्त हिंदुस्तान (यानि आज के भारत और पाकिस्तान में) अंग्रेजों की हुकुमत थी. ये 21 सिख सैनिक अंग्रेजी फौज का हिस्सा थे. ये सैनिक सिख रेजीमेंट का हिस्सा थे और नार्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस (आज के पाकिस्तान में) सारागढ़ी किले की चौकसी का काम करते थे. बताते हैं कि इस इलाकों को अंग्रेजी हुकुमत से आजाद कराने के लिए अफगानी कबीलाईयों ने सारागढ़ी चौकी पर हमला बोल दिया था. लेकिन मात्र 21 सैनिकों ने मरते दम तक इस चौकी को नहीं छोड़ा. राजकुमार संतोषी के मुताबिक, ये 21 सैनिक चाहते तो सरेंडर भी कर सकते थे, लेकिन उन्होनें अपना कर्तव्य निभाना ज्यादा जरुरी समझा.

Wednesday, June 29, 2016

सातवें वेतन आयोग से नाखुश है सेना

सातवे वेतन आयोग से सेना नाखुश है. सूत्रों के मुताबिक, सातवे वेतन आयोग में कई विसंगतियां तो हैं ही, सेना द्वारा उठाईं गईं मांगों पर भी ध्यान नहीं दिया गया है.

खुद रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर ने कहा कि हालांकि उन्होनें काफी मांगों को मनवाने की कोशिश की, लेकिन 'कुछ मांगे' पूरी होने से रह गई हैं.

जानकारी के मुताबिक, 7वे वेतन आयोग के लिए सेना ने अपनी तीन-चार मुख्य मांगे रखी थीं.

1.      एनएफयू---नॉन फंक्शनल अपग्रेड. इसके ग्रेड के मुताबिक, एक ही बैच के सैन्य अधिकारियों को उनके  पद को देखे बिना बराबर सैलरी मिलनी चाहिए. यानि के 2005 बैच के सभी अधिकारियों को बराबर सैलरी मिलनी चाहिए. क्योंकि ऐसा हो सकता है कि इस बैच को कोई अधिकारी कर्नल के पद पर ही जबकि उसी बैच को कोई अफसर पदोन्निति के बाद ब्रिगेडियर के पद पर हो. जबकि सरकारी (सिविल सेवा) नौकरी में एक बैच के सभी आईएएस (आईपीएस इत्यादि) को एक ही सैलरी मिलती है (चाहे रैंक डायरेक्टर हो या ज्वाइंट-सेक्रेटरी). सेना की इस मांग को  सातवे वेतन आयोग ने नहीं माना है.

2.      एमएसपी—मिलेट्री सर्विस पेय. अभी तक एमएसपी सिर्फ ब्रिगेडयर रैंक तक के अधिकारियों को मिलती है. सेना की मांग है कि मेजर-जनरल और लेफ्टिनेंट-जनरल रैंक के अधिकारियों को भी एमएसपी मिलनी चाहिए. अभी तक एमएसपी सैनिकों की मुश्किल हालात में काम करने के लिए दी जाती है. लेकिन सेना की मांग है कि क्योंकि उनकों ना तो यूनियन और एसोशियन बनाने की इजाजत है और ना ही आवाज उठाने का अधिकार . इसलिए एमएसपी सीनियर अधिकारियों को भी मिलनी चाहिए. इस मांग को भी नहीं माना गया है.

3.      सैनिकों और सरकारी कर्मचारियों के लिए एक समान ‘पेय-मैट्रिक्स’ हो----अभी तक सिविल और सैन्य दोनों के लिए अलग-अलग पेय मैट्रिक्स है. लेकिन सेना की मांग है कि क्योंकि सरकारी नौकरी में स्थिरता नहीं होती है जबकि फौज में रुकावट आ जाती है. इसलिए दोनों के लिए सामान पेय-मैट्रिक्स हो.

4.      मिलेट्री हज़ार्ड पेय (जोखिम भत्ता)---अभी ये भत्ता सरकारी कर्मचारियों का ज्यादा है. जबकि सैनिकों का कम है. सेना चाहती है कि ये बराबर हो. इसे अगर कैलकुलेट किया जाए तो गुवाहटी में कार्यरत सरकारी कर्मचारी का भत्ता, सियाचिन में तैनात सैनिक से ज्यादा होता है. सेना की मांग है कि इस तरह की विसंगतियों को दूर किया जाए. जहां नार्थ ईस्ट में तैनात एक आईएएस को 54 हजार का भत्ता मिलता है. तो सेना के एक अधिकारी को सियाचिन में 31 हजार रूपये का भत्ता मिलता है. जबकि सियाचिन में काम करना बेहद जोखिम भरा है.

सरकार का कहना है कि भत्ते को लेकर अलग से कमेटी बनाई जायेगी, जो तय करेगी कि क्या वाकई विसंगतियां है क्या.

जानकारों के मुताबिक, वेतन आयोग में सशस्त्र सेनाओं की भागीदारी नहीं थी. इसलिए आयोग के सदस्य सेनाओं की जरूरतों और उनके काम करने के हालातों को ठीक से समझ नहीं पाते. यहां तक की सेनाओं के प्रमुखों को भी आयोग में अपनी राय रखने का मौका नहीं दिया गया.

सेना इस बात से खुश नहीं है कि तीसरे वेतन आयोग के बाद से लगातार सेना को सिविल अधिकारियों के अपेक्षा कम तरजीह दी जाती आ रही है. लगातार सेना के अधिकारियों की सैलरी सिविल अधिकारियों के मुकाबले कम दी जा रही है. जबकि मुश्किल हालातों में चाहे वो युद्ध का मैदान हो या आतंकियों से लड़ना या फिर बाढ़ और भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदा या फिर सांप्रदायिक दंगे, वहां सिविल मशीनरी फेल होने के बाद सेना को ही बुलाया जाता है.

 यहां तक की हाल ही मे हरियाणा मे जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान भड़की हिंसा को भी सेना ने ही शांत कराया था. यहां तक की बोरवेल में गिरे बच्चों को बचाने के लिए भी सेना की मदद ली जाती है.

जानकारी के मुताबिक, अब सेना में एक सिपाही (SEPOY) की सैलरी 21,700/ रुपये हो जायेगी. अभी तक एक सिपाही की पेय 8470/ रुपये है. इसी तरह से एक मेजर रैंक के अधिकारी की सैलरी करीब 70 हजार रुपये (69,700/) हो जायेगी. जबकि अभी तक एक मेजर की सैलरी 27,880/ रुपये है.

Monday, June 27, 2016

उड़ान भरने के लिए तैयार तेजस

1 जुलाई को वायुसेना को स्वदेशी लड़ाकू विमान, तेजस की पहली स्कावड्रन मिल जायेगी. शुरूआत में इस स्कावड्रन में 02 विमान होंगे. ये स्कावड्रन कोयम्बटूर के करीब शोलुर मे बेस होगी. लेकिन शुरूआत के दो ( 02 ) साल ये स्कावड्रन बैंगलुरू से ऑपरेट करेगी. 

लंबे इंतजार के बाद आखिरकार, स्वदेशी लड़ाकू विमान, तेजस भारतीय वायुसेना में आधिकारिक तौर से शामिल होने जा रहा है. 1जुलाई को पारंपरिक सैन्य तरीके से बैंगलूरू में वायुसेना की स्कावड्रन स्थापित की जायेगी.

लेकिन बताते चलें कि तेजस को फाइनल ऑपरेशनल क्लीयरेंस अभी तक नहीं मिली है. इस बारे में वायुसेना के अधिकारियों कहना है कि जल्द ही क्लीयरेंस मिल जायेगी.

जानकारी के मुताबिक, इस साल के अंत तक स्कावड्रन में तेजस विमानों की संख्या 06 तक पहुंच जायेगी. ये हल्के लड़ाकू विमान (लाइट काॅम्बेट एयरक्राफ्ट एलसीए) पुराने पड़ चुके मिग-21 की जगह लेंगे. तेजस की स्कावड्रन का नाम भी वही है जो मिग-21 का था यानि 55 स्कावड्रन, जिसे 'फ्लाईंग-डैगर्स' के नाम से भी जाना जाता है.

 वायुसेना एचएएल से 120 तेजस खरीदेगा. सूत्रों के मुताबिक, एक तेजस की कीमत करीब ढाई सौ (250) करोड़ रूपये है.

1983 मे शुरू हुए इस प्रोजेक्ट की कीमत करीब 560 करोड़ रुपये थी, लेकिन अब इसकी कीमत 10,398 करोड़ रुपये तक पहुंच गई है. 

पिछले साल यानि अप्रैल 2015 में सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में इस स्वदेशी विमान पर कई सवाल खड़े किए थे. रिपोर्ट में प्रोजेक्ट के 20 साल पीछे चलने, ट्रैनर एयरक्राफ्ट ना होने,  प्रोजेक्ट की बढ़ती कीमत और विमान की तकनीक और फाइनल ऑपरेशनल क्लीयरेंस पर भी सवाल खड़े किए गए थे.

Saturday, June 25, 2016

चीनी सीमा पर तैनात होंगी अमेरिकी तोपें

रक्षा मंत्रालय ने आज थलसेना के लिए अमेरिका से 145 अल्ट्रा लाइट होवित्ज़र तोपें खरीदने का रास्ता साफ कर दिया है. सेना की नई माउंटन स्ट्राइक कोर के लिए खरीदी जाने वाली इन तोपों की कीमत 750 मिलयन डाॅलर है.

रक्षा मंत्रालय की अपेक्स कमेटी, रक्षा खरीद परिषद (डिफेंस एक्युजेशन कमेटी यानि डीएसी) ने आज इस सौदे को हरी झंडी दी. रक्षा मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक, अमेरिका से एम-777 तोपें सीधे फाॅरेन मिलेट्री सेल्स (एफएमएस) रूट से आयात की जायेंगी.

इन तोपों में कुछ को सीधे आयात किया जायेगा और बाकी को भारत मे ही एसेम्बल किया जायेगा.

जानकारी के मुताबिक, चीन की बढ़ती ताकत को देखते हुए ही सेना की बंगाल के पानागढ़ में नई माउंटेन स्ट्राइक कोर तैयार की जा रही है. उसी को देखते हुए हल्की तोपें अमेरिका से खरीदी जा रहीं हैं. इन तोपों को चीनी सीमा पर तैनात किया जायेगा. ये तोपें इतनी हल्की हैं कि हेलीकाॅप्टर से पैरा-ड्राॅप तक किया जा सकता है.

अल्ट्रा लाइट होवित्जर के साथ-साथ रक्षा खरीद परिषद ने आज स्वदेशी 'धनुष' तोपों के निर्माण पर संतोष जताया. साथ ही इस महीने के अंत तक 03 धनुष तोपें सेना को इस्तेमाल करने की क्लीयरंस दी गई है. अगली 03 तोपें सितंबर तक देने के लिए कहा गया है. इसके अलावा 18 तोपें के निर्माण का रास्ता भी खोल दिया गया है.

डीएसी ने आज करीब 28 हजार करोड़ रूपये के सौदों और प्रोजेक्टस को हरी झंडी दी. इसमें नौसेना के लिए 13600 करोड़ के 06 मिसाइल शिप खरीदना भी शामिल है.

डीएसी की अध्यक्षता रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर ने की. बैठक में तीनों सेनाओं के प्रमुख सहित रक्षा राज्यमंत्री और रक्षा सचिव भी मौजूद थे.

भारत बना परमाणु त्रिशक्ति देश !


भारतीय वायुसेना आज दुनिया की पहली ऐसी एयरफोर्स बन गई है जिसके जंगी बेड़े में सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल जुड़ गई है. इसके साथ ही आज भारत परमाणु त्रिशक्ति देश भी बन गया है. यानि जरूरत पड़ने पर भारत थल,जल और आकाश से न्युक्लिर हमला करने में सक्षम हो गया है.

जानकारी के मुताबिक, नासिक में आज एचएएल एयरपोर्ट पर वायुसेना के फ्रंट-लाइन लड़ाकू विमान, सुखोई-एमकेआई का फोर्मिडेवल सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल, बह्मोस के साथ टेस्ट-फ्लाई किया गया. ये परीक्षण सफल रहा. अगले कुछ महीनों में बह्मोस के एयर-वर्जन मिसाइल का सुखोई विमान से टेस्ट फायर किया जायेगा.

ये पहला ऐसा मौका है जब सुपरसोनिक फाइटर प्लेन से सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल का टेस्ट फ्लाई किया गया. किसी भी देश की वायुसेना के पास ऐसी तकनीक नहीं है. 

बह्मोस कंपनी के अधिकारियों के मुताबिक, बह्मोस मिसाइल के जंगी बेड़े में शामिल होने से भारतीय वायुसेना की रेंज और ताकत में बड़ा इजाफा हुआ है. इससे दुश्मन की सीमा में सुखोई अंदर तक हमला (डीप-पैनिट्रेशन) करने में सक्षम हो गई है. इससे वायुसेना विदइन और बियोंड विजयुल रेंज हमला कर सकती है.

गौरतलब है कि बह्मोस मिसाइल न्युक्लिर वाॅर-हेड ले जाने में सक्षम है. यानि परमाणु मिसाइल सुपरसोनिक स्पीड से फायर कर सकती है. इसीलिए इस मिसाइल को दुनिया की सबसे घातक मिसाइल मानी जाती है. इसके सुखोई विमान के साथ जुड़ने से इसकी मारक क्षमता कई गुना बढ़ गई है.

भारत के सरकारी रक्षा उपक्रम, डीआरडीओ ने इस मिसाइल को रशिया की मदद से तैयार किया है. इसके लिए इसी नाम से ('बह्मोस') एक नई कंपनी तैयार की गई है. जिसमें भारत और रशिया की बराबर की भागीदारी है. बह्मोस मिसाइल पहले से ही थलसेना और नौसेना की जंगी बेड़े मे शामिल है. अब वायुसेना मे शामिल होने से भारत परमाणु त्रिशक्ति बन गया है.

Friday, June 24, 2016

जल्द पूरा होगा राष्ट्रीय युद्ध-स्मारक का सपना !


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की महत्वकांक्षी योजनाओं में से एक, नेशनल वॉर मेमोरियल यानि युद्ध-स्मारक के लिए रक्षा मंत्रालय जल्द ही ग्लोबल एड यानि विज्ञापन निकालने वाला है. इस विज्ञापन के जरिए मंत्रालय देश-विदेश के आर्किटेक्ट, कंपनियां से युद्ध स्मारक के डिजाइन के लिए सुझाव मंगाएगा. खास बात ये है कि इस डिजाइन के लिए कोई साधारण व्यक्ति भी अपनी राय और सुझाव दे सकता है. पीएम मोदी ने सेना और रक्षा मंत्रालय को आदेश दिया था कि अगले दो साल यानि 2018 तक वॉर मेमोरियल और म्यूजियम बनकर तैयार हो जाना चाहिए. आदेश ये भी दिया है कि ये युद्ध स्मारक विश्व-स्तर का होना चाहिए.

नई प्लान के मुताबिक, युद्ध-स्मारक मौजूदा इंडिया गेट के बेहद करीब बनाया जायेगा. खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आदेश दिया है कि 
ये वाॅर-मेमोरियल वर्ल्ड-क्लाॅस होना चाहिए. यानि जो भी विदेशी पर्यटक एक बार भारत आए तो वो इसे देखा बिना अपने देश ना लौटे. लेकिन इस बात का खास ध्यान रखा जायेगा कि इंडिया-गेट का सम्मान किसी भी तरह से कम ना होने पाए. साथ ही युद्ध-स्मारक बनने के बाद भी इंडिया-गेट का महत्व किसी भी तरीके से कम नहीं होगा.

युद्ध-स्मारक के साथ-साथ वॉर-म्यूजियम भी बनाया जायेगा. ये म्यूजियम इंडिया गेट के बेहद करीब प्रिंसेज-पार्क में बनाया जायेगा. इस म्यूजिमय में वॉर-ट्रॉफी यानि दुश्मन देशों से जीते हुए हथियार, टैंक और तोप रखे जायेंगे. साथ ही भारतीय सेना के गौरवपूर्ण इतिहास को भी यहां दर्शाया जायेगा. 15 एकड़ में फैला प्रिंसेज-पार्क एक ऐतिहासिक जगह. अंग्रेजों के समय में ये सैनिकों के बैरक के तौर पर इस्तेमाल किया जाता था. कहते हैं कि देश आजादी की घोषणा के बाद सबसे पहले तिरंगा यहीं फहराया गया था.

गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब भी किसी देश की यात्रा पर जाते हैं तो वहां के युद्ध स्मारक और शहीदों को नमन करना कभी नहीं भूलते. हाल ही में जब वे अमेरिका की यात्रा पर गए तो सबसे पहले उन्होनें अमेरिका के वॉर-मेमोरियल पर अपना सर नत-मस्तक किया. यही नहीं अमेरिका कांग्रेस के साझा-सत्र संबोधन में सबसे पहले उन्होनें वीर शहीदों को ही याद किया. लेकिन अपने देश में पीएम मोदी को वॉर-मेमोरियल की कमी हमेशा खलती रही है. यही वजह है कि दिल्ली में सत्ता संभालते ही पीएम मोदी ने सबसे पहले जिन महत्वकांक्षी योजनाओं की घोषणा की उनमें नेशनल वॉर मेमोरियल भी सबसे पहली थी.

मोदी सरकार के पहले ही बजट में वॉर-मेमोरियल और म्यूजियम के लिए अलग से 500 करोड़ रूपये की एक बड़ी राशि मुकरर कर दी गई. घोषणा ये भी की गई कि देश का युद्ध-स्मारक इंडिया गेट पर बनाया जायेगा. और अब करीब दो साल बाद वो घड़ी आ गई है जब युद्ध-स्मारक के लिए रक्षा मंत्रालय ग्लोबल एड यानि युद्ध-स्मारक के डिजाइन और स्ट्रक्चर के लिए विज्ञापन देने जा रही है. जल्द ही ये विज्ञापन दुनियाभर में जारी किया जायेगा. इसके जरिए कोई भी कंपनी, ग्रुप या फिर व्यक्ति भारत में तैयार होने वाले वॉर-मेमोरियल के लिए अपनी राय और डिजाइन दे सकता है. उसके बाद रक्षा मंत्रालय और सेना तय करेगी कि देश के पहले विश्व-स्तरीय युद्ध-स्मारक और म्यूजियम का डिजाइन कैसा होगा.

दीगर है कि पिछले 55 सालों से देश के युद्ध-स्मारक की मांग अधर में अटकी हुई है. पहली बार सेना ने वॉर-मेमोरियल की मांग वर्ष 1960 में की थी. लेकिन किसी ना किसी कारण ये मांग पूरी नहीं हुई. कभी गृह मंत्रालय तो कभी सुरक्षा-कारणों और ट्रैफिक-मैनेजमेंट को लेकर दिल्ली पुलिस इस युद्ध-स्मारक की मांग में अडंगा अटकाती रही. साथ ही कभी इस बात पर भी सहमति नहीं बन पाई कि आखिर देश का युद्ध-स्मारक कहां बनेगा. कभी यमुना-बैंक तो कभी रिज, तो कभी धौला-कुआं में वॉर-मेमोरियल बनाने का प्रस्ताव रखा गया. लेकिन सेना, रक्षा मंत्रालय, गृह मंत्रालय, दिल्ली पुलिस और शहरी विकास मंत्रालय में आम-सहमति कभी नहीं बन पाई.

वर्ष २०१२ में दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने नेशनल वॉर मेमोरियल को इंडिया गेट पर बनाने के लिए इसलिए मना कर दिया।था क्योंकि उन्हें लगता था की इसके यहाँ बनने से इंडिया गेट की खूबसूरती काम हो जाएगी और टूरिस्ट यहाँ नहीं आएंगे.

शुरूआत में वाॅर-मेमोरियल बनाने की जिम्मेदारी शहरी विकास मंत्रालय को दी गई थी. लेकिन जब सालोसाल तक प्रोजेक्ट एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा तो सेना और रक्षा मंत्रालय को इसको तैयार करने की जिम्मेदारी दे दी गई. प्रधामंत्री नरेंद्र मोदी ने सख्त आदेश दिए हैं कि वाॅर-मेमोरियल अगले दो साल यानि 2018 तक बनकर तैयार हो जाना चाहिए. पहले युद्ध-स्मारक बनाने के लिए पांच साल का समय था. साफ है कि पीएम चाहते हैं कि उनकी सरकार के पहले कार्यकाल से पहले ही वाॅर-मेमोरियल दुनिया के सामने हो.

देश की राजधानी, दिल्ली के बीचो-बीच अंग्रेजों ने इंडिया-गेट को युद्ध-स्मारक के तौर पर बनवाया था. लेकिन सेना का मानना था कि इंडिया-गेट को ब्रिटिश-सरकार ने पहले विश्व-युद्ध के शहीदों की याद में तैयार कराया था. इसलिए उसे सही मायनों में भारतीय सेना या यूं कहे हैं कि देश का युद्ध-स्मारक नहीं माना जा सकता है. ये बात जरुर है कि 1971 के पाकिस्तान युद्ध में शहीद हुए सैनिकों की याद में यहां पर एक जलती हुई मशाल जरुर लगाई गई. ये मशाल चौबीसों घंटे और 12 महीने जलती रहती है. तीनों सेनाओं के जवान दिन-रात इसकी रखवाली करते हैं. अभी तक शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिये सेना के बड़े अधिकारियों से लेकर प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति यहीं आते हैं. अंग्रेजों ने पहले विश्व-युद्ध में शहीद हुए भारतीय सैनिकों के लिए इंडिया-गेट के रुप में युद्ध-स्मारक तैयार कराया था. बाकयदा युद्ध में शहीद हुए सैनिकों के नाम तक इंडिया-गेट पर उकरे गए थे.

लेकिन आजादी के बाद से अबतक करीब 21 हजार भारतीय सैनिक अलग-अलग युद्ध और ऑपरेशन्स में अपनी जान देश पर न्यौछावार कर चुके हैं. लेकिन उनकी याद में अभी तक देश को अपना वॉर-मेमोरियल नहीं मिल पाया है. मोदी सरकार की घोषणा के बाद अब जाकर युद्ध-स्मारक को बनाने को लेकर सेना में नया जोश आ गया है. और इसको बनाने को लेकर तैयारियां जोरो-शोरों से शुरु हो गईं हैं.

सेना को वॉर-मेमोरियल बनाने में तो कोई  दिक्कत नहीं आने वाली है. क्योंकि इंडिया-गेट और उसके आसपास का एरिया पहले से ही रक्षा मंत्रालय और शहरी विकास मंत्रालय के अधीन है. लेकिन वाॅर-म्यूजियम बनाने में सरकार को खासी मुश्किल का सामना करना पड़ सकता है. क्योंकि प्रिंसेज-पार्क में जहां ये युद्ध-संग्रहालय बनाया जाना हैं वहां पर अभी सेना का ट्रांजिट-हॉस्टल है. और उसके साथ ही यहां पर दो सौ (200) से भी ज्यादा परिवार भी पिछले 30-40 सालों से रहते हैं.

प्रिंसेज पार्क के हॉस्टल में काम करने वाले ये सभी परिवार सिविलयन हैं. इन परिवारों के लिए बाकयदा यहां स्टॉफ क्वार्ट्स बने हुए हैं. करीब में ही दो दर्जन दुकानें भी बन गई हैं. इन परिवारों को हटाना और दुकानों को तोड़ना सेना के लिए टेढ़ी खीर साबित हो सकता है. यही वजह है कि शहरी विकास मंत्रालय ने भी रक्षा मंत्रालय को साफ कर दिया है कि इस जमीन से किसी भी तरह का अवैध कब्जा हटाने कि जिम्मेदारी रक्षा मंत्रालय की ही है.

यहाँ  रहने वाले लोगों की इस मामले पर प्रतिक्रिया जाननी चाही, तो उन्हे ये जानकर बेहद निराशा हुई कि सरकार उन्हे यहां से विस्थापित करने वाली है. उनका मानना है कि वे यहां आजादी के पहले से यहां रह रहे हैं. ना केवल उनके बाप-दादाओं ने अंग्रजों की सेवा की बल्कि वाॅर-मेमोरियल की घोषणा होने तक वे सेना के बड़े अधिकारियों की सेवा में थे. उनके घरों से लेकर सीएसडी कैंटीन तक में भी वे उनकी सेवा करते थे. लेकिन क्योंकि मामला देश के शहीदों और गौरव से जुड़ा है तो वे ये जगह खाली करने के लिए तो तैयार हैं लेकिन सरकार को उनके पुर्नवास के लिए जरूर सोचना चाहिए.