Tuesday, February 17, 2015

डिजिटल-आर्मी




प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने केन्द्र में सत्ता संभालने के बाद ‘डिजिटल-इंडिया’ का जोरदार नारा दिया था. इसका उद्देश्य है पूरे देश को आईटी से जोड़ने और इंफोर्मेशन-टेक्नोलॉजी का लाभ दूर-दराज में रहने वाले हर भारतवासी तक पहुंच सके. डिजिटल-इंडिया से  ही जुड़ा हुआ है पीएम मोदी का ‘डिजिटल-आर्मी’ का विचार. आखिर क्या है डिजिटल-आर्मी और किस तरह से सेना इसे लागू करने के लिए युद्धस्तर पर काम कर रही है उससे पहले दो-तीन घटनाओं को जानना बेहद जरुरी है.

    सबसे पहली हुई 15 फरवरी को. सेना की आंख-कान समझे जाने वाले सिग्नल-कोर ने इस दिन (यानि 15 फरवरी) को अपना 105वां स्थापना दिवस मनाया. किसी भी संस्था के लिए एक शताब्दी से भी ज्यादा का सफर अपने-आप में कई मायने रखता है. दूरसंचार, रेडिया और सैटेलाइट फोन या फिर ‘सेक्योर-लाइन’ के जरिए 13 लाख की सेना को एक सूत्र में बांधने का काम करता है सिग्नल-कोर. साथ ही दुश्मन को हमारी खुफिया जानकारी हाथ ना लगने पाए, इसकी जिम्मेदारी भी सिग्नल कोर की ही होती है.

       दूसरी घटना अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की हाल ही में गणतंत्र-दिवस परेड में मुख्य-अतिथि के दौर पर भारत यात्रा से जुड़ी है. ओबामा के भारत दौरे पर आने पर उनका खास तरह का मोबाइल फोन खासा चर्चा में रहा था. जो जानकारी मिल पाई थी उसके मुताबिक, उनका फोन अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी यानि एनएसए ने इस तरह तैयार किया था कि कोई भी ना तो इस फोन को टैप कर सकता था और ना ही उसे हैक कर सकता था. ये खास फोन एनएसए ने इसलिए तैयार किया था क्योंकि, दुनिया के सबसे ताकतवर शख्स किससे और क्या बातचीत करता है इसका दुश्मन को कतई पता नहीं चलना चाहिए.

     तीसरी घटना थोड़ी पुरानी है. लेकिन इतनी भी पुरानी नहीं है कि आमजन उसे भूल गए हों. वैसे इस घटना ने जितना नुकसान भारतीय सेना का किया था उतना तो शायद चीन से हार के बाद भी नहीं हुआ था. वो था, तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल वी के सिंह का उम्र-विवाद. ये विवाद जनरल और सेना के दस्तावेजों में हेरफेर के चलते हुआ था. इन दस्तावेजों में कैसे गलती हुई या किसकी वजह से गलती हुई, अब इस पर विचार करने से कोई फायदा नहीं है. इस (उम्र) विवाद और जनरल को एक अतिरिक्त साल नौकरी करने के मुद्दे से भारतीय सेना की साख पर बट्टा जरुर लग गया. लेकिन अब इसे सुधारने का तो नहीं, लेकिन इससे सीख लेना का समय जरुर आ गया है. कैसे, आईये हम जान लेते हैं. और फिर ऊपर की तीनों घटनाओं के समन्वय करने की कोशिश करेंगे, जो पीएम मोदी के डिजिटल-इंडिया या फिर फिर डिजिटल-आर्म्ड फोर्सेज के नारे को स्वरुप देने में कारगर सिद्ध होता दिखाई देता है.
एकीकृत कमांडर कांफ्रेस को संबोधित करते प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी


     देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने केन्द्र में सत्ता संभालने के बाद जब पहली बार तीनों सेनाओं के साझा सम्मेलन को संबोधित किया, तो उन्होनें सेनाओं को ‘डिजिटिल-आर्मड फोर्सेज’ बनाने पर जोर दिया था. डिजिटिल-सेना का मतलब ये है कि सेनाएं ज्यादा से ज्यादा काम कम्पयूटर के जरिए करें, ताकि गलती की गुजाइंश कम हो जाए. साथ ही काम भी कम समय में पूरा कर लिया जाए.
     लेकिन डिजिटल-आर्मी का अर्थ सिर्फ इतना ही नहीं है. इसका मतलब ये है कि सेना के शीर्ष नेतृत्व से लेकर सबसे नीचे काम करने वाले जवान तक इसका सीधा-सीधा असर या फिर प्रभाव दिखाई देना चाहिए. इसके लिए सेना ने रेजीमेंटल सेंटर से लेकर फॉरमेशन-लेवल पर सीटीएल यानि कम्प्यूटर ट्रैनिंग लैब को स्थापित किया है. ताकि सेना के सभी जवानों को यहां कम्पयूटर की बेसिक शिक्षा जरुर दी जाये-चाहे वो पहले से जानता है या नहीं.

     वैसे, डिजिटल-आर्मी का काम सिर्फ इतना नहीं है कि हरेक जवान को कम्प्यूटर चलाना आता हो. बल्कि इससे कहीं ज्यादा है. इसका अर्थ ये है कि उसकी जिंदगी—निजी और सरकारी—में उसका उपयोग भी होना चाहिए. इसके लिए सेना ने सबसे पहला काम ये किया है कि ऊपर से लेकर नीचे तक सभी अधिकारियों और जवानों के शैक्षिक और सरकारी दस्तावेजों को डिजिटाईज्ड करना शुरु कर दिया है. यानि अब किसी भी जवान को अपने दस्तावेजों को एक जगह से दूसरी जगह लेकर घूमने की जरुरत नहीं पड़ेगी. वो अब एक ही जगह यानि अपने रेजीमेंटल सेंटर में दस्तावेजों को डिजिटली-स्टोर करवा सकता है. यहां रखवाने के बाद वो अपना ‘रिकॉर्ड-सर्टिफिकेट’ प्राप्त कर सकता है और जहां भी उसकी पोस्टिंग हो उसे साथ लेकर जा सकता है. इससे एक तो उसके मूल दस्तावेज खोने का डर खत्म हो जायेगा. दूसरा ये कि कहीं पर भी उसके दस्तावेजों को लेकर कोई परेशानी खड़ी नहीं होगी—जैसा कि जनरल वी के सिंह के समय आई थी.

     दरअसल, जनरल वी के सिंह का दावा था कि उनके सरकारी (सेना के) दस्तावेजों में उनकी उम्र एक साल बढ़ा दी गई थी. जबकि उनके स्कूल-सर्टिफिकेट में उम्र कुछ और दी हुई थी. लेकिन इस गड़बड़ी को समय रहते सुधारा नहीं गया, जिसके चलते इतना बड़ा बवाल खड़ा हो गया कि एक साल नौकरी बढ़वाने के लिए सेना प्रमुख ने सरकार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक का दरवाजा खटखटा दिया था. खैर, जनरल वी के सिंह मनमसोस कर रह गए थे. लेकिन इस घटना से सबक लेते हुए सेना ने अपने सभी रैंक एंड फाइल के दस्तावेज डिजीटाईज्ड करने शुरु कर दिए. ताकि समय-समय पर कोई भी अधिकारी अपने दस्तावेज सेना के दस्तावेज से मेल करा सकता है और गड़बड़ी पाने पर समय रहते सुधार करा सकता है.

     अभी तक सेना के सभी अधिकारियों और जवानों का रिकॉर्ड दिल्ली में सेना मुख्यालय स्थित एमएस यानि मिलेट्री-सैकेटरी ब्रांच में होता था. लेकिन देश के दूर-दराज और बॉर्डर इलाकों में ड्यूटी होने के चलते अधिकारियों के लिए एमएस ब्रांच से संपर्क करने में खासी दिक्कत आती थी. लेकिन अब ये रिकॉर्ड-रुम हर रेजीमेंटल सेंटर में स्थापित किए जाएंगे. ताकि अपनी उम्र और द्स्तावेजों या फिर सर्विस-रिकॉर्ड को लेकर किसी के मन में कोई दुविधा या गलतफहमी पैदा ना हो.

     ये सभी रेजीमेंटल-रिकॉर्ड-रुम सेना मुख्यालय से भी जुड़े होंगे. इसके लिए भारतीय सेना ने दिल्ली में एवॉल यानि आर्मी वाइड एरिया नेटवर्क, लॉकल एरिया नेटवर्क और कैंपस वाइड नेटवर्क स्थापित किया है.

   साथ ही सेना के सभी छोटे-बड़े सेटंर्स पर एटीएम-बूथ की तर्ज पर इंफो-कियोस्क स्थापित किए जाएंगे. ताकि कोई भी जवान इन कियोस्क से सेना से जुड़ी जानकारी, कोर्स, नए पाठ्यक्रम इत्यादि किसी भी वक्त ले सकता है. आईएमए, एनडीए और वॉर-कॉलेज जैसे महत्वपूर्ण संस्थानों में नेशनल नॉलेज नेटवर्क स्थापित किए जाएंगे, जो कि ई-लाईब्रेरी की तरह काम करेंगे.

    इसके अलावा छुट्टी पर जाने वाले जवानों को अब यात्रा में इस्तेमाल होने वाले वारंट भी इलेक्ट्रोनिकली दिए जाएंगे. अभी तक इन वारंटस को लेने के लिए जवान को रेलवे स्टेशन पर एमसीओ दफ्तर में लंबी लाइन में लगना पड़ता था. लेकिन अब ये ई-वारंट उसे छुट्टी पर जाने से पहले ही मुहैया करा दिए जाएंगे.

     यानि सेना में ‘क्लॉउड-कम्प्यूटिंग’ का कार्य युद्ध-स्तर पर जारी है. ताकि कोई भी डाटा वर्चूयली कही भी उपलब्ध किया जा सके.

    
ऐसा नहीं है कि सेना में कम्प्यूटरीकरण की शुरुआत नई सरकार बनने के बाद हुई है. सेना पहले से ही अधिकारियों के कैरियर मैनेजमेंट, सर्विस-रिकॉर्ड, वेतन-भत्ता और हथियारों (और मशीनों) के रखरखाव का पूरा डाटा ऑनलाइन अपडेट करती रही है. साथ ही सेना का मैसेज सिस्टम यानि (सामरिक) संदेश भेजने की पूरी प्रणाली डिजिटल माध्यम से बेहद ही गोपनीय तरीके से की जाती रही है. सेना की मिसाइल से लेकर परमाणु हथियारों तक के ऑपरेशन पूरी तरह कम्प्यूटराइजड है.

     अब फर्क ये आया है कि ज्यादा से ज्यादा काम ऑनलाइन किया जाने लगा है. और इसकी उपयोगिता को हर सिपाही और जवान तक पहुंचाये जाने की कोशिश तेज हो गई है.

    डिजिटल-आर्मी का दूसरा सबसे बड़ा पड़ाव है पूरी सेना को सेक्योर-लाइन के जरिए जोड़ना. इसका अर्थ ये है कि अभी तक सेना के सिर्फ सीनियर अधिकारी ही ऐसे फोन इस्तेमाल करते थे, जो पूरी तरह से सेक्योर यानि सुरक्षित थे. यानि की ना तो इन फोन-कॉल्स को कोई डिकोड कर सकता है और ना ही आसानी से हैक कर सकता है. पिछले 15 सालों से सेना का शीर्ष-नेतृत्व इस तरह के संचार माध्यमों को इस्तेमाल कर रहा है. लेकिन डिजिटल-सेना के तहत इस सेक्यूर-लाइन को सभी अधिकारियों के साथ-साथ सभी जवानों तक पहुंचाने का है. इसके लिए सेना की सिग्नल-कोर ने अपनी अलग फोन-लाइन स्थापित की है. जो कि प्राईवेट या फिर दूसरी सरकारी संचार सेवाओं से कहीं ज्यादा सुरक्षित है.

     सेक्योर-लाइन से जुड़ा हुआ है एमसीसीएस सिस्टम यानि मोबाइल सेल्युलर कम्यूनिकेशनस सिस्टम. इस सिस्टम के तहत सेना के लिए सार्वजिनक कंपनी बीईएल (भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड) ने एक खास मोबाइल फोन डिजाइन किया है, जो ना तो हैक किया जा सकता है और ना ही टैप किया जा सकता है.
इस हैंडसेट से जवान सिर्फ सेना के लोगों से ही फोन पर बातचीत (मैसेज या फिर एमएमएस भेज) सकते हैं. ये फोन ठीक वैसा ही जैसा कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा इस्तेमाल करते हैं. सेना की दो कोर यानि लेह स्थित 14 कोर और श्रीनगर स्थित 15 कोर यहीं फोन इस्तेमाल कर रही है. एक कोर के लिए इस फोन को मुहैया कराने का खर्चा करीब-करीब 250 करोड़ रुपये है. जल्द ही सामरिक-दृष्टि से महत्वपूर्ण तीन और कोर में ये (ओबामा जैसे) खास फोन सभी अधिकारिओं और जवानों के हाथों में होंगे. इन हैंडसेट और सेक्यूर लाइन से किसी दूसरी कंपनी के फोन या फिर सर्विस-प्रोवाइर से बात नहीं की जा सकती है.
  
    सेना के ‘डिजिटल-आर्मी’ प्रोजेक्ट का जिम्मा डीजीआईएस यानि डायेरेक्टरेट-जनरल ऑफ इंर्फोमेशन सिस्टम के जिम्मे है. लेकिन इतने बड़े और अहम प्रोजेक्ट को कार्यंवित करने के लिए मूलभूत ढांचा तैयार किया है सिग्नलस कोर ने. वही सिग्नल कोर जिसे सेना का आंख और कान कहा जाता है और जिसने अपनी स्थापना के सौ स्वर्णिम साल पूरे कर लिए हैं.

Thursday, January 22, 2015

फ्रॉम रशिया विद लव !



कम ही लोग जानते हैं कि रशिया ऐसा पहला देश था जिसने भारत को सबसे पहले स्वतंत्र देश के रुप में मान्यता दी थी. जी हां, रुस ने भारत को आजादी की आधिकारिक घोषणा से पहले, यानि अप्रैल 1947 में ही स्वतंत्र देश मान लिया था—यानि ब्रिटेश राज से (पूरी) आजादी (अगस्त 1947) मिलने से चार महीने पहले ही मित्र-राष्ट्र घोषित कर दिया था. इतना ही नहीं अपनी एंबेसी यानि दूतावास भी दिल्ली में स्थापित कर दिया था. 
 
       इतिहास गवाह है कि रुस से हमारे संबंध सिर्फ 70 साल पुराने नहीं बल्कि करीब 500 साल पुराने हैं. रशिया के ज़ार (राजा) ने अपना पहला मिशन मुगलकाल में ही भारत भेज दिया था. 1695 में मुगल शासक औंरगजेब के दरबार में रुस का पहला दूत आया था और उसे प्रशस्ति-पत्र भी मिला था. इससे पहले एक रुसी व्यापारी अफांसे निकितिन तो 15वीं सदी में ही भारत पहुंच गया था--यानि वास्को डिगामा से भी पहले. जानकारी तो ये भी मिलती है कि मुगल शासन की भारत में नींव रखने वाले बाबर ने भी अपना एक दूत रशिया भेजा था.

      आजादी के बाद भारत और रुस के रिश्ते और अधिक प्रगाढ़ हुए. एक नए राष्ट्र को जिस भी चीज की जरुरत पड़ी, चाहे वो हथियार हों, टैंक, फाइटर एयरक्राफ्ट, मिसाइल, पनडुब्बियां या युद्धपोत या फिर कोई दूसरी सैन्य सहायता , टैक्नोलोजी हो, ऊर्जा हो या फिर कर्ज, रुस ने भारत को दिल खोल कर दिया. इस बात का अंदाजा बेहद आसानी से लगाया जा सकता है कि अगर रुस ने हमारी सहायता ना की होती तो हमारे देश का (भारी) उद्योग कैसा होता—होता भी यहां नहीं. भारत भले ही अपनेआप के गुटनिरपेक्ष देश की श्रेणी में रखता हो, लेकिन दुनिया जानती है कि शीत-युद्ध के दौरान भारत किसके ज्यादा करीब था. 1971 युद्ध में पाकिस्तान की मदद करने आ रहा अमेरिका का एयरक्राफ्ट कैरियर अगर बंगाल की खाड़ी से भाग खड़ा हुआ था तो वो सिर्फ इसलिए की रुस की पनडुब्बियां उसने नेस्तानबूत करने वहां पहुंच गईं थीं. ऐसी थी कभी भारत की रुस से दोस्ती--और पाकिस्तान की अमेरिका से. लेकिन शीत-युद्ध के खत्म होने और सोवियत संघ के विघटन के बाद भारत के रुस से संबंधों में थोड़ा लचीलापन आ गया.

       शीत-युद्ध के खात्मे के बाद और 90 के दशक के आखिरी सालों में अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार बनने के बाद भारत का रुझान अमेरिका की तरफ होने लगा. एक बार फिर मोदी के नेतृत्व में ‘राष्ट्रवादी’ सरकार बनने के बाद भारत और अमेरिका के रिश्तों में गर्मजोशी आ गई है. प्रधानमंत्री मोदी के गणतंत्र दिवस परेड में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को बतौर चीफ-गेस्ट बुलाने और न्यौता स्वीकार करने से दुनियाभर में दोनों देशों के संबधों की चर्चा जोरो पर हैं.
 
रुसी रक्षा मंत्री दिल्ली में रक्षा मंत्रालय के लॉन में गार्ड ऑफ ऑनर लेते हुए

      गणतंत्र दिवस को अब महज चंद दिन बचे हैं. पूरा देश अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के इंतजार में आंखे लगाए बैठा है. ऐसे में ओबामा की यात्रा से ठीक पहले रशिया के रक्षा मंत्री का भारत दौरा कई मायने में अहम हो जाता है. रुस के रक्षा मंत्री सर्जई शोयगु तीन दिन (21-23 जनवरी) के भारत दौरे पर आए हुए हैं. ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि क्या रुस को भारत के अमेरिका के करीब जाने का डर सता रहा है. क्या भारत से ऐतिहासिक सैन्य रिश्तों को एक बार फिर मजबूत करने पर जोर दे रहा है रशिया.

     कुछ दिनों पहले ही रुस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन भी भारत के दौरे पर आए थे. लेकिन उनकी यात्रा ने इतनी सुर्खियां नहीं बंटोरी थी, जितनी ओबामा की यात्रा पर घर-घर में चर्चा हो रही है.

        ऐसे में भारत के रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर का वो हालिया (22 जनवरी का) बयान गौर करने वाला है जो उन्होनें रुस और अमेरिका पर दिया है. मनोहर पर्रिकर से जब अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा की यात्रा से भारत की अपेक्षाओं के बारे में पूछा गया तो उनका जवाब था, “अगर हम अपने बड़े मित्र देशों से अच्छे संबंध रखते हैं तो हमारी बहुत से समस्याएं खुद-ब-खुद दूर हो जाती हैं.” दूसरा सवाल जब रक्षा मंत्री से रशिया के डिफेंस मिनिस्टर की यात्रा के बारे में पूछा गया तो उनका जवाब था, “ मैने उनसे कई प्रोजेक्टस पर धीमी चल रही चाल को तेज करने के लिए कहा है...मैंने उनसे एफजीएफए (फिफ्थ जेनेरशन फाइटर एयरक्राफ्ट) के खरीदने के बारे में भी बात की है और क्योंकि हम उनके कई विमान और मशीनरी इस्तेमाल करते है तो उनके स्पेयर पार्टस भी ‘मेक इन इंडिया’ के तहत ही भारत में बनाने का आग्रह किया है.”
        
      रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर के इन दोनों बयानों से साफ हो जाता है कि भारत के लिए ये दोनों महाशक्तियां अब क्या मायने रखती हैं. शीतयुद्ध के वक्त अमेरिका और रुस (सोवियत संघ) दोनों ही सुपर-पॉवर थीं. लेकिन शीतयुद्ध के खत्म होने के बाद दुनिया में सिर्फ एक ही महाशक्ति बची है, और वो है अमेरिका-यानि बड़ा देश. और इस बड़े देश से मित्रता करने में हमें कई फायदे हैं. पहला तो ये कि पाकिस्तान समर्थित प्रॉक्सी-वॉर पर लगाम लगाई जा सकती है. यानि पाकिस्तान द्वारा समर्थित आतंकवाद पर अमेरिका पाकिस्तान के कान खींच सकता है. दूसरा ये कि चीन जैसे बड़े (शक्तिशाली) देश को सीधे भिड़त से दूर रखा जा सकता है. तीसरा, ये कि यूएन की सुरक्षा-परिषद में स्थायी सदस्य बनने का मौका मिल सकता है और दुनिया में शक्तिशाली देशों की श्रेणी में भारत का नाम भी शुमार हो सकता है.


       वहीं रुस से पिछले करीब 70 सालों के संबंधों में अब वो तीव्रता नहीं रही है. उसकी चाल ‘सुस्त’ पड़ गई है. उसमें तेजी लाने की जरुरत है. भले ही भारत की सैन्य ताकत का अभिप्राय बन चुके मिग, सुखोई, मी-17, आईएनएस विक्रमादित्य हमें रुस से ही प्राप्त हुए हैं, लेकिन वहीं सी-17 ग्लोबमास्टर, पी8-आई, चिनूक और अपॉचे जैसे अटैक हेलीकॉप्टर हमें अमेरिका से मिल चुके हैं या मिलने वाले हैं. यानि अब हम सिर्फ अपनी सैन्य जरुरतों के लिए रुस तक ही सीमित नहीं है.   

        रुस भी अब भारत को ही अपने हथियार, विमान और हेलीकॉप्टर नहीं बेचता है. वो भारत के धुर-विरोधी और दुश्मन पाकिस्तान को भी हेलीकॉप्टर बेच रहा है. क्या इसका मतलब ये निकाला जाए कि रोल बदल रहे हैं. शीतयुद्ध के वक्त रुस और भारत की दोस्ती वैसी ही थी जैसी पाकिस्तान और अमेरिका की हुआ करती थी. लेकिन अब उल्टा हो गया है. भारत जितना करीब अमेरिका के आ गया है, पाकिस्तान उतना तो नहीं लेकिन धीरे-धीरे रशिया से सैन्य संबंध स्थापित करना शुरु कर दिया है.  हाल ही में रुस के रक्षा मंत्री ने पाकिस्तान की यात्रा की थी और अफगानिस्तान में और अपने देश के आंतकियों से निपटने के लिए अटैक हेलीकॉप्टर देने का वादा किया था.
      जानकारों की मानें तो आज के वैश्विक दौर में (शीत-युद्ध के बाद) जब दुनिया में कोई ग्रुप या धड़े नहीं बचे हैं तो हर कोई (देश) हर किसी देश के साथ संबंध बनाने में विश्वास रखता है. इसीलिए अगर कभी भारत के लिए बेहद ही रुखा व्यवहार रखने वाला अमेरिका आज हमारे इतने करीब आ गया है, तो हमें रुस के पाकिस्तान को हथियार या हेलीकॉप्टर बेचने पर ज्यादा आपत्ति नहीं होनी चाहिए. वैसे भी भारत के लिए सुपर-पॉवर अमेरिका से दोस्ती रखना एक बेहतर विकल्प है क्योंकि हमने रुस से अपने संबंधों को कभी खत्म नहीं किया है. यहां ये बात दीगर है कि भले ही दूसरे देशों के साथ हमारे संबंधों में उतार-चढ़ाव आता रहा हो लेकिन रशिया से प्यार की दोस्ती हमेशा बरकरार है.

Sunday, January 18, 2015

चीन की 'मोतियों की माला' से कैसे बच पाएगा भारत ?

भारत और चीन की सेनाओं के अधिकारी एलएसी पर एक मीटिंग के दौरान

1962 के चीन युद्ध के बाद से ही भारत के ड्रैगन से रिश्ते बेहद संवदेनशील रहे हैं. वास्तविक नियंत्रण रेखा (लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल यानि एलएसी) पर चीनी सेना की आए दिन घुसपैठ से इन रिश्तों में खटास और अधिक बढ़ जाती है. ऐसे में अगर रक्षा मंत्रालय का एक बड़ा फौजी अधिकारी सार्वजनिक रुप से ये कह दे कि भारत को चीन के ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ से चौकन्ना रहना होगा तो सभी के कान खड़े हो जाते हैं. 

    क्या वाकई ये ‘मोतियों की माला’ भारत के गले में कभी भी कसने का काम कर सकती है. क्या ‘मोतियों की लड़ी’ से वक्त पड़ने पर भारत का गला घोेंटा जाता सकता है.  आखिर क्या है ये चीन का ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’. भारत को कैसे रहने होगा चौकन्ना. इसको समझने से पहले रक्षा मंत्रालय के उस बड़े सैन्य अधिकारी का वो पूरा बयान जान लेते हैं जो उसने हाल ही में डिफेंस से जुड़े एक बड़े सम्मेलन में दिया था.

   
सीआईडीएस, एयर मार्शल पी पी रेड्डी
5 जनवरी 2015 को देश के सबसे बड़े व्यापारिक और औद्योगिक संगठनों में से एक, एसौचैम (एसोसियटड चैम्बर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज) ने राजधानी दिल्ली में
‘रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता’ नाम के एक सम्मेलन का आयोजन किया था. रक्षा मंत्री से लेकर रक्षा क्षेत्र की कंपनियों के बड़े-बड़े सीईओ और एमडी उसमें शामिल हुए थे. साथ ही शामिल हुए थे रक्षा मंत्रालय के एकीकृत रक्षा स्टॉफ के चीफ (चीफ ऑफ इंटीग्रेटड डिफेंस स्टॉफ यानि सीआईडीएस) एयर मार्शल पी पी रेड्डी. सम्मेलन के आखिरी सत्र में पी पी रेड्डी को संबोधित करना था.

    सीआईडीएस, एयर मार्शल रेड्डी ने जैसे ही सम्मेलन में बोलना शुरु किया, हर कोई स्तब्ध रह गया. अपने ‘पॉवर प्वाइंट’ भाषण में एक-एक कर रेड्डी ने बताया कि सामरिक और भौगोलिक (जियोस्ट्रेटैजिक) नक्शे पर भारत की स्थिति क्या है. उन्होनें बताया कि हमारे देश के “उत्तर में चीन है और पश्चिम में पाकिस्तान है. दोनों ही देश परमाणु हथियारों से लैस हैं.”  दोनों ही देशों से हमारे युद्ध हो चुके हैं. पाकिस्तान की चीन से नजदीकियां किसी से छिपी नहीं रही हैं. ऐसे में अगर दोनों देशों से एक साथ युद्ध की नौबत आ गई तो हम क्या करेंगे. यानि “दो-दो मोर्चों पर एक साथ परमाणु युद्ध के लिए भारत को तैयार रहना होगा.”
  
    रेड्डी ने कहा कि “...चीन का बढ़ता (क्षेत्रीय) दबदबा, आर्थिक क्षमता और अपने उद्योग के लिए संसाधनों की बढ़ती भूख के चलते चीन हमारे पड़ोसी देशों से राजनयिक संबध कायम कर रहा है... उन्हें (पड़ोसी देशों) लोन दे रहा है, उनके यहां बदंरगाह बनवा रहा है, हथियारों की सप्लाई कर रहा है....चीन हमारे चारों तरफ ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ बनाना चाहता है.”

    ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’  का जिक्र आज से करीब दस साल पहले (2005 में) अमेरिकी के रक्षा मंत्रालय ने ‘एशिया में ऊर्जा का भविष्य’ नाम की एक खुफिया रिपोर्ट में किया था. पेंटागन की इस रिपोर्ट में चीन द्वारा समुद्र में तैयार किए जा रहे ‘मोतियों’ का विस्तृत विवरण दिया गया था. ये समुद्र में पाए जाने वाले मोती नहीं बल्कि दक्षिण चीन सागर से लेकर मलक्का-स्ट्रैट, बंगाल की खाड़ी और अरब की खाड़ी तक (यानि पूरे हिंद महासागर में) सामरिक ठिकाने (बंदरगाह, हवाई पट्टी, निगरानी-तंत्र इत्यादि) तैयार करना था. हालांकि रिपोर्ट में कहा गया था कि चीन ये ठिकाने अपने ऊर्जा-स्रोत और तेल से भरे जहाजों के समुद्र में आवागमन की सुरक्षा के लिए तैयार कर रहा है. लेकिन जरुरत पड़ने पर इन सामरिक-ठिकानों को सैन्य-जरुरतों के लिए भी इस्तेमाल कर सकता है.
चीन का स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स: साभार नीतिसेन्ट्रल.कॉम
   आइए जानते हैं कि चीन के ये ‘मोती’ कहां-कहां हैं और इनका भारत की सुरक्षा को कैसा खतरा है. इसे समझने के लिए ऊपर दिए नक्शे को गौर से देखेंगे तो साफ हो जायेगा कि चीन की मोतियों की लड़ी आखिर किस तरह से भारत के लिए गले का फंदा भी बन सकता है.

    पेंटागन की खुफिया रिपोर्ट में बताया गया था कि अमेरिका के दक्षिण चीन-सागर और दक्षिण-पूर्व देशों में बढ़ते दबदबे के चलते ही चीन ने इन ‘मोतियों की लड़ी’ को पिरोना शुरु किया था. अमेरिका का ताइवान को लेकर रुख चीन को नागवार गुजर रहा है, इसीलिए वो अमेरिका की तरह सुपर-पॉवर बनने की जुगत में जुटा है. अमेरिका से (आधुनिक) हथियारों की होड़ में जुट गया है चीन. लेकिन मोतियों की इस लड़ी को गौर से देखेंगे तो ये भारत के गले में भी खतरे की घंटी दिखाई पड़ती है.

      इसकी शुरुआत चीन ने दक्षिण चीन-सागर से शुरु की. यहां मौजूद हेनान द्वीप चीन का सबसे पहला ‘मोती’ है. ये द्वीप चीन का एक बड़ा सामरिक ठिकाना है. इस द्वीप पर एक बड़ा एयरबेस तो है ही सर्विलांस सिस्टम भी मौजूद है. इस द्वीप से चीन पूरे साउथ चायना-सी पर नजर रखता है. वर्ष 2001 की वो घटना अमेरिका शायद ही भूल सकता है जब चीन के दो लड़ाकू विमानों ने एक यूएस स्पाई प्लेन को क्षतिग्रस्त कर हेनान द्वीप पर उतरने के लिए मजबूर कर दिया और अमेरिकी सैनिकों को बंदी बना लिया था. बड़ी मुश्किल से अमेरिका इस संकट का टाल पाया था. लेकिन ये शायद पहली बार था कि चीन ने इस इलाके में अपनी प्रभुता का नमूना पेश किया था. ना केवल नमूना पेश किया बल्कि सुपरपॉवर अमेरिका के साथ-साथ पूरी दनिया को इस इलाके से दूर रहने और ड्रैगन से पंगा ना लेने की चेतावनी भी दे डाली थी.

      इसी तरह, चीन एशियान (एसोशियसन ऑफ साउथ-ईस्ट नेशन्स) देश कंबोडिया और थाईलैंड में अपने ठिकाने बनाने के साथ-साथ इस इलाके में अपना वर्चस्व कायम करना चाहता है.
  
     अगर भारत की ‘गले में स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ की बात करें तो सबसे पहले देखें की चीन ने म्यांमार (बर्मा) में अपना रुतबा कायम करना शुरु कर दिया था. म्यांमार में लोकतंत्र की गैर-मौजूदगी और मिलैट्री-शासन के चलते भारत ने अपने पड़ोसी देश से कभी मजबूत राजनयिक संबध नहीं कायम किए. इस बात का फायदा चीन ने उठाया और करोड़ो रुपये की सैन्य सहायता दे डाली. इतना ही नहीं बर्मा के सिटवे पोर्ट को भी चीन ने ही तैयार किया, जो कोलकाता से ज्यादा दूर नहीं है. साथ ही मलक्का-स्ट्रैट के करीब बने बर्मा के कोको-द्वीप में ना केवल हवाई-पट्टी बना ली है बल्कि इलैक्ट्रॉनिक-इंटेलिजेंस इकठ्ठा करने की एक पूरी इकाई स्थापित करली है. ये कोको द्वीप भारत के अंडमान-निकोबर द्वीप से मात्र पैतीस (35) किलोमीटर की दूरी पर हैं. पेंटागन की रिपोर्ट में म्यांमार को चीन के ‘सैटेलाइट’ के तौर पर संबोधित किया गया है.
साभार: चायना ब्रीफिंगडॉटकॉम

   चीन ने भारत के एक दूसरे पड़ोसी देश बांग्लादेश के चित्तागोंग बंदरगाह पर अपने लिए एक कंटनेर-पोर्ट तैयार किया है. साथ ही चीन बांग्लादेश से भी राजनयिक संबध मजबूत करने की ताक में है.

   भारत के दक्षिणी छोर पर स्थित श्रीलंका में भी चीन ने हम्बनटोटा में बंदरगाह तैयार किया है. इस बंदरगाह पर हाल ही में चीन की पनडुब्बियों को देखा गया है. साफ है कि भले ही चीन ये कहे कि वो दूसरे देशों में बंदरगाह पूरी तरह से व्यापारिक दृष्टिकोण से तैयार कर रहा है. लेकिन श्रीलंका में उसकी पनडुब्बियों की मौजूदगी ने साफ कर दिया है कि व्यापारिक-बंदरगाहों को जरुरत पड़ने पर सैन्य-बंदरगाहों में भी तब्दील किया जा सकता है. यहां ये बात गौरतलब है कि हम्बनटोटा बंदरगाह को विकसित करने के लिए श्रीलंका ने सबसे पहले भारत से ही आग्रह किया था. लेकिन इससे पहले की भारत तैयार होता, चीन ने श्रीलंका को जरुरी मदद करने की पेशकश कर डाली और भारत मुंह ताकता रह गया. साफ है कि भारत की गलत (विदेश और सामरिक) नीतियां ही उसके लिए गले का फंदा बन रहीं हैं.

    अब बात करते हैं भारत के चिरपरिचित दुश्मन पाकिस्तान की, जहां चीन लगातार अपने पैर पसार रहा है. पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह को चीन ने ही तैयार किया है. कराची से करीब 250 मील दूर बने इस पोर्ट से पाकिस्तान का समुद्री-व्यापार तो आसान हुआ ही है, सामरिक दृष्टि से भी ये बेहद महत्वपूर्ण है. 1971 युद्ध में भारत की नौसेना ने कराची बंदरगाह को तहस-नहस कर डाला था. ऐसे में पाकिस्तान को जररुत थी एक वैकल्पिक पोर्ट की. जो चीन ने ग्वादर-बंदरगाह को तैयार कर पूरा कर दिया है. लेकिन ये पोर्ट हालांकि चीन और पाकिस्तान व्यापारिक बंदरगाह की श्रेणी में रखना पसंद करते हैं. लेकिन जानकारों की मानें तो इस बंदरगाह की गहराई से ही साफ हो जाता है कि ये युद्धपोतों के अलावा पनडुब्बियों के लिए भी सुरक्षित पोर्ट है. ग्वादर पोर्ट से होर्मोज-स्ट्रैट भी बेहद करीब है. इसके अलावा चीन ने कराची और ग्वादर बंदरगाहों के बीच का हाईवे भी तैयार करने में पाकिस्तान की (आर्थिक) मदद की है.

   भले ही चीन इस बात का दावा करे कि वो ये सभी बंदरगाह अपने व्यवसायिक जरुरतों को पूरा करने के लिए तैयार कर रहा है. लेकिन इतिहास गवाह है कि चीन अपने व्यापार को मिलेट्री-सहायता देने में गुरेज नहीं करता है—जैसा कि हर देश को करना चाहिए. 15वीं सदी के शुरुआत में जब चीन के मिंग-राजवंश ने अपना समुद्री-काफिला व्यापार करने के लिए दुनियाभर में भेजा था तो उसके साथ पूरे 72 युद्धपोत भेजे थे, ताकि उन्हे समुद्री-डकैतों और विरोधी देशों की नौसेनाओं से मुकाबला किया जा सके.

   चीन लगातार अपना प्रभाव अफ्रीकी देशों में भी दिनोदिन बढ़ा रहा है. सूडान, कांगो और अंगोला जैसे देशों से चीन लगातार अपने सबंध कायम कर रहा है. ये वे देश हैं जिनसे ना तो पश्चिम की विकसित देश तो दूर विकासशील देश भी राजनयिक संबध कायम करने में कतराते हैं. चीन इन अफ्रीकी देशों से तेल के साथ-साथ बड़े व्यापारिक समझौते कर रहा है.  वर्ष 2008 में स्ट्रैटजिक-एनैलेसिस में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, चीन के 25 अफ्रीकी-देशों के साथ मिलैट्री-राजनयिक संबध थे. जबकि भारत के इस दौरान सिर्फ चार डिप्लोमेट नौ अफ्रीकी देशों को (राजनयिक तौर पर) संभालते हैं. इसी तरह बीजिंग में 18 अफ्रीकी देशों के मिलेट्री-अटैचे थे जबकि दिल्ली में मात्र सात.

   बस यही डर सीआईडीएस पी पी रेड्डी को सता रहा है. और इसी के लिए वे भारत की फौज और रक्षा उपक्रमों को भविष्य में तैयार रहने के लिए आगाह कर रहे है. एयर मार्शल रेड्डी ने अपने भाषण में कहा कि “...हमारी अर्थव्यवस्था और रक्षा उपक्रम हमें चीन से स्पर्धा करने से रोक देते हैं. हमारे पड़ोसी देश हमारी तरफ ताक रहे हैं (लोन, हथियार और दूसरे सामरिक जरुरतों के लिए) लेकिन हम उनकी जरुरतें पूरी नहीं कर पाते हैं.”
साभार: विशफुलथिंकिंग.वर्ल्डप्रेस.कॉम

   दरअसल, एयर मार्शल रेड्डी की चिंता वही है जो पूरे देश के सैन्य-तंत्र की है. और वे ये कि भारत दुनिया के सबसे बड़े हथियारों के आयात करने वाले देशों में से एक है. मोदी सरकार की  ‘मेड इन इंडिया’ पॉलिसी से पहले शायद ही हमारी सरकारों ने देश को रक्षा के क्षेत्र में स्वावलंबन बनाने की दिशा में इतना बड़ा कदम उठाया है. ना ही हमारी किसी सरकार ने निजी कंपनियों को रक्षा क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए उत्साहित किया है. मोदी सरकार ने दिल्ली में राजकाज संभालने के तुरंत बाद ही रक्षा क्षेत्र में प्रत्यक्ष रुप से 49 फीसदी (26 प्रतिशित से बढ़ाकर) विदेशी निवेश को हरी झंडी दे दी. इन दोनों नीतियों का सीधा-सीधा मतलब ये था कि देश को रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर करना है.  ना केवल आत्मनिर्भर बनना बल्कि जरुरत पड़ने पर अपने पड़ोसी (मित्र) देशों को सामरिक मदद करना. और इस की शुरुआत एक तरह से हो भी चुकी है.
मॉरीशस को निर्यात किए जाने वाला देश में निर्मित पहला ऑफशोर-पैट्रोल शिप

  भारत ने हाल ही में मॉरिशस को देश में ही निर्मित एक पैट्रोलिंग शिप दिया है. ये पहली बार है कि भारत ने किसी देश को स्वेदशी युद्धपोत निर्यात किया है. इसी तरह से एशियान देश वियतनाम को भी ऐसे ही युद्धपोत देने के प्रकिया शुरु हो गई है. खबर तो यहां तक है कि भारत जल्द ही वियतनाम को दुनिया की सबसे खतरनाक बह्मोस मिसाइल देने वाला है. वियतनाम से भारत के सामरिक संबंध चीन के ‘स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स’ की काट में खासी मदद कर सकते हैं.
इसी तरह भारत ने पिछले कई दशकों के बाद म्यांमार के साथ संबंध सुधारने की पहल की है. 

  एशियान की बैठक में प्रधानमंत्री मोदी के पहुंचने से पहले ही विदेश मंत्री सुषमा स्वराज वहां पहुंच गई थीं. साफ है कि भारत अब वहां की मिलेट्री-जुंटा सरकार से सबंध बनाने में गुरेज नहीं करता है. इसी तरह से (मोदी) सरकार के बनने के बाद ही विदेश मंत्री की बांग्लादेश यात्रा बताती है कि भारत के लिए उसके (अब तक उपेक्षित पड़े) पड़ोसी देश कितने जरुरी हैं. यहां तक की भारत ने कई वर्ग-किलोमीटर विवादित जमीन बांग्लादेश को दे दी है. जो इस और इशारा करता है कि भारत अपने सभी पड़ोसी देशों से प्रगाढ़ रिश्तों की तरफ अग्रसर है.
पीएम मोदी नेपाल के प्रधानमंत्री को 'गिफ्ट' देते ध्रुव-हेलीकॉप्टर

   खुद पीएम मोदी इसी नीति पर चलते हैं कि अपने सभी पड़ोसी देशों (नेपाल, भूटान, अफगानिस्तान) को नकारकर भारत दुनिया की बड़ी ताकत नहीं बन सकता है. नेपाल को स्वेदशी ध्रुव हेलीकॉप्टर गिफ्ट करना पीएम मोदी की इसी विदेश-नीति का सूचक है. और प्रधानमंत्री बनने के बाद सबसे पहली विदेश यात्रा पर भूटान जाना भी यही दर्शाता है. यहां ये बात दीगर है कि भारतीय थलसेना के प्रमुख, नेपाल की सेना के होनोररी-प्रमुख भी होते हैं. और भूटान की रॉयल-सेना का प्रशिक्षण भी भारतीय सेना ही करती है. इस साल इंडियन मिलेट्री एकेडमी में अफगानिस्तान के करीब एक दर्जन कैडेट भारतीय कैडेट्स के साथ ही पास होकर अपने देश (अफगानिस्तान) की सेना में नियुक्त हुए हैं. अगर चीन के श्रीलंका से गूढ़ संबध स्थापित हो रहे हैं तो भारत के चीन के कभी सबसे कट्टर दुश्मन रहे मंगोलिया से सामरिक संबध किसी से छिपे नहीं हैं.

   शीत-युद्ध के बाद दुनिया में एक मात्र सुपर-पॉवर अमेरिका से चीन अगर होड़ करना चाहता है तो वो ये भूल जाता है कि एशिया में उसके दो सबसे ‘भरोसेमंद’ दोस्त भारत और जापान मौजूद हैं. अमेरिकी नौसेना ‘मालाबार-युद्धभ्यास’ भारत और जापान के साथ ही मिलकर करती है.

   अगर चीन ने म्यांमार में सैन्य-पांव पसार दिए हैं तो भारत भी अब वहां (म्यांमार) के सिटवे पोर्ट पर अपना व्यापारिक-बंदरगाह तैयार करने लगा है. ये बंदरगाह कालडन नदी के जरिए भारत के मिजोरम से जुड़ जायेगा ताकि वहां से कार्गो-जहाज आवागमन कर सके. इसी तरह अगर चीन पाकिस्तान के ग्वादर में पोर्ट बना रहा है तो भारत भी ईरान के चाहबर-पोर्ट बनाने में जुट गया है. अगर पाकिस्तान परमाणु शक्ति है तो ईरान भी न्यूकिलर-पॉवर बनने की और अग्रसित है. यानि भारत भी स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स बनाना जानता है.

फुटनोट्स
1. चायना बिल्ड्स अप स्ट्रैटजिक लाईंस, वाशिंगटन टाइम्स...17 जनवरी 2005
2. स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स: मीटिंग द चैलेंज ऑफ चायनाज राईजिंग पॉवर (स्ट्रैटजिक स्टीडज इंस्टीटयूट, जुलाई 2006)
3. चायनाज स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स इन इंडियन ओशियन: स्ट्रैटजिक एनैलैसिस फरवरी 2008