Saturday, June 4, 2016

सीएजी की अनदेखी भारी पड़ी सेना पर: आयुध डिपो हुआ खाक

 सीएजी रिपोर्ट 2015
मंगलवार को महाराष्ट्र के पुलगांव में सेंट्रल एम्युनेशन डिपो में लगी भीषण आग में अब तक कुल 19 लोगों की जान चली गई है. 16 लोग अभी भी जिंदगी और मौत के बीच अस्पताल में जूझ रहे हैं. लेकिन सवाल ये खड़ा होता है कि इतनी बड़ी आग इतने संवदेनशील क्षेत्र में लगी कैसे. और अगर लगी तो उसपर समय रहते काबू क्यों नहीं पाया गया. क्या सेना के पास इस तरह की भीषण आग रोकने के लिए जरुरी साजों-सामान और फायर-स्टॉफ की कमी है ? ये सवाल इस लिए उठ रहा है क्योंकि सीएजी ने एक साल पहले ही अपनी रिपोर्ट में एम्युनेशन डिपो में इस तरह की घटना और जरुरी अग्निशमन उपकरण की कमी को लेकर आगाह किया था. लेकिन ना तो सेना और ना ही रक्षा मंत्रालय ने इस और ध्यान दिया. नतीजा ये हुआ कि 19 लोगों की जान चली गई और सेना के लिए बेहद जरुरी गोला-बारुद भी नष्ट हो गया. वो भी तब जबकि खुद सेना गोला-बारुद की कमी झेल रही है. 

काॅम्पर्टोलर एंड ऑडिटर जनरल यानि देश की सबसे बड़ी ऑडिट एजेंसी, सीएजी ने अपनी हालिया रिपोर्ट में सेना और रक्षा मंत्रालय को इस खतरे के लिए पहले ही आगाह कर दिया था. एबीपी न्यूज के पास सीएजी की वो रिपोर्ट मौजूद है जिसमें साफ लिखा है कि सेना के डिपुओं में 65 प्रतिशत अग्निशमन उपकरणों और 47 प्रतिशत अग्निशमन स्टॉफ की कमी है.

वर्ष 2015 में जारी की गई ये रिपोर्ट सीएजी ने सेना के गोला-बारुद की कमी और उसके रख-रखाव पर जारी की थी. सीएजी ने इसके लिए सेना के आधा दर्जन से भी ज्यादा डिपुओं की पड़ताल की थी. सभी आयुध डिपो में कमोबेश यही हालात थे. खुद सीएजी ने अपनी इस रिपोर्ट में माना है कि एम्युनेशन डिपो में गोला-बारुद का भंडार होता है इसलिए ये हमेशा आग जैसी दुर्घटनाओं के जोखिम में काम कर रहे हैं. यानि सीएजी की रिपोर्ट सही साबित हुई है. 

आपको बताते चलें कि नागपुर से करीब 115 किलोमीटर की दूरी पर महाराष्ट्र के पुलगांव का ये केंद्रीय आयुध भंडार सेना का सबसे बड़ा और अपने-आपका एक मात्र भंडार है. माना जाता है कि ये एशिया का दूसरा सबसे बड़ा आयुध सेंटर है. यहां पर तोप और टैंको के गोला-बारूद के अलावा लैंड-माईंस, एंटी-टैंक माईंस, राईफल और बंदूकों के कारतूस भी स्टोर किए जाते हैं. पुलगांव का सेंट्रल एम्युनेशन डिपो सेना के लिए कितना जरुरी और संवदेनशील होता है इस बात का अंदाजा इस बात से लगाया जाता है कि मिसाइल तक यहां रखी होती हैं. देश की अलग-अलग ऑर्डिनेंस फैक्ट्री से जो गोला बारूद आता है वो पहले यहीं लाकर रखा जाता है. इसके बाद सेना की जरूरत के हिसाब से यहां से गोला-बारुद कोर, कमांड और बाॅर्डर पर भेजा जाता है.

सेना के पास पुलगांव के केंद्रीय आयुध भंडार के अलावा 15 फील्ड एम्युनेशन डिपो स्टोर हैं. इसके अलावा हर कंपनी का अपना एम्युनेशन डिपो होता है जहां 2-3 दिन का गोला बारूद स्टोर होता है. इसके अलावा 17 सेंट्रल ऑर्डिनेंस डिपो और बड़ी तादाद में छोटे छोटे डिपो होते हैं.

सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में आयुध भंडारों और उनके रखरखाव करने वाली एजेंसियों के काम-काज पर भी बड़े सवाल उठाए हैं. रिपोर्ट में कहा गया कि सेना की हर कमांड की फायर स्टेशन कमेटियां की आखिरी बार 2002 और 2003 में बैठक हुई थी. रिपोर्ट में कहा गया कि डायरेक्टर जनरल ऑफ ऑर्डिनेंस सर्विस (डीजीओएस) ने 2011 में खुद माना था कि अग्नि-शमन उपकरण के जोखिम और उनके अंतर्गत आने वाले डिपोंओं की फायर स्टेशन कमेटियों को अपग्रेड करने की जरुरत है लेकिन 2013 तक भी अधिकतर भंडारों में इसको अंतिम रुप नहीं दिया जा सका.

सीएजी ने सेना के आयुध भंडारों पर अपनी रिपोर्ट पिछले साल यानि वर्ष 2015 में जारी की थी. लेकिन रिपोर्ट में साफ है कि गोला-बारुद भंडार में आग जैसी दुर्घटनाओं से लड़ने के लिए जरुरी ना केवल जरुरी साजों-सामान और कर्मचारी हैं बल्कि इच्छाशक्ति की भी कमी है. क्योंकि पुलगांव में लगी आग कोई पहली नहीं है. इससे पहले पुलगांव के आयुध भंडार में वर्ष 2005 में भी आग लगी थी. उस दौरान करीब 126 मैट्रिक-टन (एमटी) गोला बारूद नष्ट हुआ था, जिसकी कीमत करीब 22 करोड़ थी.

पुलगांव के केंद्रीय आयुध डिपो में लगी आग के अलावा वर्ष 2000 में भरतपुर स्थित आयुद्ध भंडार में आग लगी थी जिसमें 387 करोड़ का नुकसान हुआ था और करीब 13 हजार मैट्रिक टन गोला बारूद नष्ट हुआ था. इसके अलावा 2001 में पठानकोट और गंगानगर भंडार में आग लग चुकी है. 2002 मे डपार और जोधपुर में, और 2007 में खुंडरू (जम्मू-कश्मीर) के डिपो में आग की घटना सामने आ चुकी है. इन सभी दुर्घटनाओं की कोर्ट ऑफ इंक्वायरी में आग का कारण अचानक चिंगारी, शोर्ट-सर्किट, टेस्टिंग और रिपेयर के दौरान धमाका होना पाया गया है. यानि एक छोटी सी गलती से एक बड़ा हादसा हो सकता है. वो भी तब जबकि सेना गोला-बारुद की कमी से जूझ रही है.

सीएजी रिपोर्ट में इस बात का भी खुलासा हुआ था कि सेना के पास करीब 20 दिन तक युद्ध लड़ने का ही गोला-बारुद मौजूद है. जबकि मिनमम वॉर रिर्जव यानि न्यूनतम 40 दिन का गोला-बारुद सेना के पास हमेशा मौजूद होना चाहिए. ऐसे में पुलगांव जैसी आग की दुर्घटनाओं में सेना का वॉर-रिर्जव और कम हो जाता है. जो हमारी सेना के लिए बेहद चिंता का कारण है.

जानकारी के मुताबिक, मारे गए 19 लोगों में से 13 रक्षा मंत्रालय के अधीन काम करने वाले फायर-सर्विस के कर्मचारी थे. सेना के मुताबिक, इन लोगों के चलते ही आग पुलगांव के डिपो में सिर्फ एक शेड में ही लगी थी. वहां पर इस तरह के करीब 30 शेड हैं. अगर आग दूसरे शेडों में फैल जाती तो स्थिति और भयावह हो सकती थी. लेकिन इन 13 कर्मचारियों ने आग को एक शेड से आगे नहीं बढ़ने दिया, और आग से लड़ते-लड़ते अपनी जान न्यौछावर कर दी. खुद डिपो के डिप्टी कमांडेंट कर्नल ध्यानेंद्र सिंह बुरी तरह जख्मी हो गए.

Thursday, May 19, 2016

चीन के समंदर में भारतीय जंगी बेड़ा, चढ़ सकती हैं ड्रैगन की त्यौरियां !

अगले ढाई महीने के लिए भारतीय नौसेना के आधा दर्जन जंगी जहाज दक्षिण चीन सागर में ऑपरेशनल तैनाती के लिए जा रहे हैं. इस दौरान ये युद्धपोत जापान में होने वाले तीन देशों के युद्धभ्यास, मालाबार में भी हिस्सा लेंगे. गौरतलब है कि चीन हमेशा से दूसरे देशों के युद्धपोत का साउथ चायना सी मे आने का विरोध करता रहा है. साथ ही चीन मालाबार युद्धभ्यास में जापान के शामिल होने पर भी पहले विरोध जता चुका है.

भारतीय नौसेना का जंगी बेड़ा ऐसे समय में साऊथ चायना सी जा रहा है जब खुद राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी चार दिन की राजकीय यात्रा पर चीन जा रहे हैं (24-27 मई).

नौसेना के प्रवक्ता, कैप्टन डी के शर्मा के मुताबिक, पूर्वी कमांड के जंगी बेड़े के छह युद्धपोत अगले ढाई महीने तक दक्षिण चीन सागर और उत्तर-पश्चिम प्रशांत महासागर में तैनात रहेंगे. इस दौरेन ये जंगी जहाज वियतनाम, फिलीपींस, मलेशिया, जापान, दक्षिण कोरिया और रशिया के बंदरगाहों की 'गुडविल-यात्रा' पर भी जाएंगे. हर पोर्ट पर ये जहाज कम से कम चार दिन रूकेंगे.

नौसेना के मुताबिक, भारत में ही निर्मित सतपुड़ा, सहयार्दि, शक्ति और क्रीच युद्धपोत इस यात्रा में शामिल हैं. सतपुड़ा और सहयार्दि मिसाइल स्टील्थ फ्रिगेट है तो शक्ति सपोर्ट-शिप है, जबकि क्रीच मिसाइल कोर्वेट है. इनकी कमान पूर्वी कमांड के जंगी बेड़े के कमांडर इन चीफ रियर-एडमिरल एस वी बोकाड़े के हाथों में हैं जो खुद इस अहम यात्रा का हिस्सा हैं.

प्रवक्ता के मुताबिक, इस दौरान ये युद्धपोत जापान में होने वाली तीन देशों के युद्धभ्यास, मालाबार में भी हिस्सा लेंगे. भारत और जापान के अलावा अमेरिकी नौसेना भी इस एक्सरसाइज में हिस्सा लेगी.

2010 में जब जापान ने भारत और अमेरिका के साथ हुए मालाबार युद्धभ्यास में हिस्सा लिया था तो चीन ने भारत से इस का बाकयदा विरोध जताया था. उसके बाद से जापान ने इस युद्धभ्यास में हिस्सा नहीं लिया था. लेकिन पिछले साथ बंगाल की खाड़ी में हुए इस युद्धभ्यास में जापान ने भी हिस्सा लिया था.

दीगर है कि हाल ही में अमेरिका के पैसेफिक कमांड के चीफ, एडमिरल हैरिस ने राजधानी दिल्ली में भारत को दक्षिण चीन सागर में साझा-पैट्रोलिंग का सुझाव दिया था. लेकिन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने अमेरिका का ये सुझाव ये कहते हुए ठुकरा दिया था कि इसकी फिलहाल कोई जरूरत नहीं है. अमेरिका, दरअसल साऊथ चायना सी में चीन के एकाधिकार (या यूं कहें कि ठसक को) खत्म करना चाहता है. क्योंकि चीन किसी बाहरी देश के युद्धपोतों को इस क्षेत्र में घुसने नहीं देता है. लेकिन पिछले कुछ समय से अमेरिका के जंगी जहाज बेधड़क इस समंदर में गश्त कर रहे हैं. अब भारत के जहाज से चीन की भौहें और तन सकती हैं.

Wednesday, May 11, 2016

बूढ़े हुए सी-हैरियर को विदाई, मिग-29के ने संभाली कमान !

गुड-बॉय: तैतीस साल तक सेवा करने के बाद सी-हैरियर रिटायर
भारतीय नौसेना के एयरक्राफ्ट कैरियर, आईएनएस विराट सेे उड़ान भरने वाला लड़ाकू विमान सी-हैरियर अब उड़ान नही भरेेंगे. नौसेना की 'वाइट टाइगर्स' स्कावड्रन का हिस्सा रहे सी-हैरियर ने आज गोवा में आखिरी उड़ान भरी. सी-हैरियर की जगह अब अत्याधुनिक रूसी लडाकू विमान 'मिग-29के' ने ले ली है. नौसेना प्रमुख एडमिरल आर के धवन की मौजूदगी में गोवा में सी-हैरियर को परंपरागत तरीके से विदाई दी गई तो मिग-29के का स्वागत किया गया.

भारतीय नौसेना ने सी-हैरियर लड़ाकू विमान 1983 में ब्रिटेन से खरीदे थे. नौसेना में आने के बाद ये पहले विमान वाहक पोत विक्रांत और उसके बाद फिर विराट पर तैनात किए गए.  विमानवाहक पोत से ही ये भारत की लंबी समुद्री सरहद की हिफाजत करते थे. दुनिया में शायद ही कोई ऐसा लड़ाकू विमान हो जो इसकी तरह वर्टिकल लैडिंग करता हो और इसकी यही  खासियत दूसरे लड़ाकू विमानों से अलग करती थी. साथ ही बहुत कम रनवे पर ये आसानी से टेक ऑफ भी कर लेता था यानि इसे उतारने के लिये किसी हवाई पट्टी की जरुरत  नही पड़ती थी.
आईएनएस विराट पर लैंडिंग करता सी-हैरियर
सी-हैरियर में आसमान में ही एयर टू एयर रिफ्युल क्षमता भी थी.  ये 500 पाउंड के बम, कलस्टर बम और मिसाइल से लैस होने पर किसी भी दुश्मन के लिये इससेे पार पाना काफी मुश्किल होता था. बड़ी बात है ये कि कई मुसीबत आने पर भी ये अपनी ड्यूटी से कभी नही हटा। खासकर अपनी लाइफ खत्म कर लेेनेे के बाद इसेे मरम्मत कर काम में लगाया जाता रहा और ये डटा रहा. कई सी हैरियर दुर्घटनााग्रस्त भी हुए और अब तो गिनती के ही सी-हैरियर नौसेना के जंगी बेड़े में रह गए थे.
पिवेट-फॉरमेशन में सी-हैरियर्स
ब्रिट्रेन में तो 2006 में ही ये विमान रिटायर हो गए थे लेकिन भारत में इसे अपग्रेड करके उड़ाया जाता रहा.  इसी साल 6 मार्च को विराट पर से अंतिम उड़ान भरी थी. अब तो विमानवाहक पोत विराट भी रिटायर होने वाला है. सी-हैरियर अब बूढ़ा भी हो गया है और इसकी जगह लेने के लिये मिग-29के भी आ गया है. अगले एक-दो साल में भारत का स्वनिर्मित विमानवाहक युद्दपोत, आईएनएस विक्रांत तैयार हो जाएगा. तब ये मिग-29के उसपर तैनात कर दिए जाएंगे.
1971 के युद्ध में वाइट-टाइगर स्कावड्रन के सी-हॉक ने की थी बम-वर्षा  
मिग-29के भी उसी 'वाइट-टाइगर' स्कावड्रन का हिस्सा होंगे जिसका सी-हैरियर हिस्सा थे. वाइट टाइगर यानि नौसेना की वो 'आईएएनएस-300' स्कावड्रन जिसका हिस्सा कभी सी-हाॅक विमान थे, जिन्होने 1971 के युद्ध में पाकिस्तान को घुटने टेंकने पर मजबूर कर दिया था. एयरक्राफ्ट कैरियर, आईएनएस विक्रांत (पुराने वाले) से  उड़ान भरने वाले सी-हाॅक्स ने '71 के युद्ध में पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) के चितगांव इत्यादि बंदरगाहों पर इतनी बमबारी की कि पाकिस्तानी नौसेना के पांव उखड़ गए थे. यहां ये बताना काफी है कि 1971 का युद्ध भारत के सैन्य इतिहास के स्वर्णिम युग में तब्दील हो चुका चुका है.


Monday, April 11, 2016

अमेरिकी राष्ट्रगान का मुंबई कनेक्शन: कार्टर को पर्रिकर का गिफ्ट !

पर्रिकर की कार्टर को भेंट: एचएमएस मिन्डेन का मॉडल
भारत की यात्रा पर आए अमेरिका रक्षा सचिव (मंत्री) ऐश्टन कार्टर को रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने गोवा में कल रात अपने प्राईवेट डिनर में उस ‘एचएमएस-मिन्डेन’ जहाज का मॉडल भेंट-स्वरुप पेश किया जिसपर 19 वी सदी में अमेरिका का राष्ट्रगान लिखा गया था. लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि इस जहाज का निर्माण मुंबई में हुआ था. यानि अमेरिका के राष्ट्रगान का भारत कनेक्शन भी है. शायद यही वजह है कि इनदिनों भारत और अमेरिका बेहद करीब आ रहे हैं. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और बराक ओबामा की दोस्ती तो दुनिया जानती है. लेकिन अब अमेरिका के रक्षा सचिव भी मनोहर पर्रिकर के मुरीद हो गए हैं.

दरअसल, अपनी तीन दिनों के भारत दौरे पर आए अमेरिका के रक्षा सचिव, ऐश्टन कार्टर सीधे गोवा पहुंचे. गोवा यानि भारत के रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर का गृह-राज्य. खुद मनोहर पर्रिकर ने ऐश्टन कार्टर को पहले गोवा आने का निमंत्रण दिया था. क्योंकि रक्षा मंत्री ऐश्टन कार्टर को अपना शहर गोवा तो दिखाना चाहते ही थे, उन्हे गोवा के करीब कारवार में भारतीय नौसेना के बेस भी ले जाना चाहते थे जो कि सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है. यहीं पर दोनों देशों के रक्षा मंत्री सोमवार को भारतीय नौसेना के एयरक्राफ्ट कैरियर, आईएनएस विक्रमादित्य पर पूरा दिन बिताने वाले हैं.

लेकिन उससे पहले रविवार की रात को गोवा में मनोहर पर्रिकर ने अपने रात्रि-भोज के दौरान ऐश्टन कार्टर को भेंट किया ‘एचएमएस-मिन्डेन’ जहाज का रेप्लिका. ये वही जहाज है जिस पर 1814 में अमेरिका के एक वकील जेम्स स्कॉट-की ने प्रसिद्ध गीत, ‘स्टार स्पेंगल्ड बैनर’  लिखा था. बाद में ये गीत का अमेरिका का राष्ट्रगान बन गया.

पूरी कहानी कुछ यूं हैं. आज से करीब 215 साल पहले यानि 1801 में ‘एचएमएस-मिन्डेन’ युद्धपोत का निर्माण ब्रिटेश नेवी ने मुंबई (उस वक्त 'बांम्बे') डॉकयार्ड में कराया था. मुंबई के इस डॉकयार्ड को अब मझगांव डाकयार्ड के नाम से जाना जाता है. 1812 में जब ब्रिटेन और अमेरिका में युद्ध हुआ तो ब्रिटेश रॉयल नेवी ने अपने इसी जहाज, ‘एचएमएस-मिन्डेन’ को अमेरिका पर हमला करने के लिए कूच किया था. 
एचएमएस मिन्डेन का मॉडल भी मुंबई डॉकयार्ड में हुआ तैयार
इस युद्ध के दौरान ब्रिटिश सेना ने अमेरिका के एक वकील जेम्स स्कॉट-की को युद्ध-बंदी बना लिया और इसी जहाज पर कैद करके रखा गया. बताते हैं कि ‘एचएमएस-मिन्डेन’ ने रात भर तोपों और बंदूकों से अमेरिका के एक किले पर गोलाबारी की. लेकिन जब सुबह हुई तो जेम्स स्कॉट ने देखा कि किले के ऊपर अमेरिका का झंडा (स्टार वाला झंडा) ज्यों का त्यों फहर रहा है. उसे कोई नुकसान नहीं हुआ है. बस इसी स्टार-झंडे को देखकर जेम्स स्कॉट ने ‘एचएमएस-मिन्डेन’ पर ही ‘स्टार स्पेंगैल्ड बैनर’ गीत की रचना की. ये 1814 का साल था. इसी स्टार स्पेंगैल्ड रचना को 1931 में अमेरिका का राष्ट्रगान घोषित कर दिया गया. इसी लिए ये गीत सभी अमेरिकी-वासियों की तरह ऐश्टन कार्टर के भी बेहद करीब है.

रविवार को जिस ‘एचएमएस-मिन्डेन’ का मॉडल रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने ऐश्टन कार्टर को पेश किया, उसे भी मझगांव डॉकयार्ड में तैयार कराया गया है. यानि मॉडल को भी उसी डॉकयार्ड में तैयार कराया गया जहां ऑरिजनल ‘एचएमएस-मिन्डेन’ ब्रिटिश रॉयल नेवी के लिए तैयार हुआ था.   

अमेरिका के रक्षा सचिव (मंत्री) ऐश्टन कार्टर भारत यात्रा के पहले दिन (10 अप्रैल को) मनोहर पर्रिकर के गृह-राज्य गोवा में मंदिर और चर्च के दर्शन कए . उसके बाद दोनो रक्षा मंत्री गोवा में आए अमेरिका के युद्धपोत 'ब्लू-रिज़' पर पहुंचे. अगले दिन यानि सोमवार को गोवा के करीब कारवार में भारत के एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रमादित्य पर पहुंचंगे. कार्टर 10-12 अप्रैल तक भारत की यात्रा पर रहेंगे.
नौसेना के एयरक्राफ्ट कैरियर विक्रमादित्य पर अमेरिका रक्षा मंत्री
अगले दिन यानि 12 अप्रैल को दिल्ली पहुंचने पर साझा प्रेस कांफ्रेंस करेंगे. साझा बयान जारी किया जायेगा. अमेरिका भारत से लाॅजिस्टिक सपोर्ट एग्रीमेंट (एलएसए) यानि भारत के मिलेट्री-बेस इस्तेमाल करने सहित कई मुख्य सैन्य-समझौते करना चाहता है. लेकिन भारत को एलएसए के मौजूदा स्वरूप पर ऐतराज है. भारत इसे सिर्फ शांति के समय में इस्तेमाल करने देना चाहता है

Wednesday, March 30, 2016

क्या युद्ध से डरता है भारत ?

दिल्ली में एनआईए अधिकारियों के साथ पाकिस्तानी जांच टीम
पठानकोट हमले की जांच के लिए पाकिस्तान की ज्वाइंट इंवेस्टीगेशन टीम (जेआईटी) इनदिनों भारत के दौरे पर आई हुई है. हालांकि पांच सदस्य वाली इस टीम को इंवेस्टीगेशन कम और इंटेलीजेंस-टीम कहना ज्यादा बेहतर होगा. क्योंकि इस टीम में मात्र दो जांच (पुलिस) अधिकारी है जबकि तीन खुफिया अधिकारी हैं. हालांकि ये मुद्दा इतना इतर नहीं है जितना कि ये कि क्या शांति बहाली के लिए भारत इतना बैचेन (या आतुर) हो जायेगा कि अपने सबसे कट्टर दुश्मन की सेना और सबसे खतरनाक खुफिया एजेंसी के अधिकारियों को अपने मिलेट्री बेस में घुसने तक की इजाजत दे सकता है. क्या वाकई भारत आतंक के खिलाफ सीधे लड़ाई लड़ने से डरता है? क्या वाकई हमारा देश युद्ध करने से डरता है? और अगर नहीं तो क्यों दुश्मन देश को अपनी सरजमीं में जांच के लिए आने का न्यौता दिया?

देश के रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने साफ मना किया था कि अगर पाकिस्तानी की जांच टीम भारत आती है तो उसे पठानकोट एयरबेस में दाखिल होने की इजाजत नहीं दी जायेगी. लेकिन फिर ऐसा क्या हुआ कि सरकार ने अपने रक्षा मंत्री के कथन को ही धत्ता बता दिया. क्या देश के रक्षा मंत्री की बात में कोई दम नहीं है. या पड़ोसी देश से शांति बहाली के लिए हम अपने घुटने तक टेक सकते हैं? ये शायद पहली बार ऐसा हुआ होगा कि किसी दुश्मन देश की सेना और खुफिया एजेंसी के अधिकारी हमारे किसी मिलेट्री बेस में दाखिल हुए हों. वो भी ऐसा एयर-बेस जो सरहद के बेहद करीब हो. जहां पर लड़ाकू विमानों की स्कावड्रन हो.

सबसे पहले बात करते हैं की आखिर सरकार ने पाकिस्तानी संयुक्त जांच दल को भारत आने क्यों दिया.  दरअसल 2 जनवरी को आधा-दर्जन आतंकियों ने पाकिस्तान सीमा से सटे पंजाब के पठानकोट एयरबेस पर हमला कर दिया था. तीन दिन तक चली मुठभेड़ में एनएसजी, सेना और एयरफोर्स के कमांडोज़ ने सभी छह के छह आतंकियों को मार गिराया था. क्योंकि मामला आतंकियों से जुड़ा था, सो हमले की जांच नेशनल इंवेस्टीगेशन एजेंसी यानि एनआईए को सौंप दी गई. जांच में पता चला कि मारे गए आतंकी पाकिस्तान के रहने वाले हैं और पाकिस्तान से संचालित आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद से ताल्लुक रखते हैं. उनके पास से बरामद हथियार, दवाई और खाने का सामान तक पाकिस्तान का था. यानि पठानकोट एयरबेस पर हुआ हमला पाकिस्तान से ही संचालित हुआ था.
हमले के बाद पठानकोट एयरबेस पर पीएम मोदी
यहां ये बात भी किसी से छिपी नहीं रही है कि भारत के खिलाफ आतंकी हमले करने के लिए पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी, आईएसआई, जैश, लश्कर और हिजबुल मुजाहिद्दीन जैसे संगठनों को उकसाती है और उनकी फंडिग तक करती है. मुंबई के 26/11 हमले में तो आतंकियों को ट्रैनिंग तक आईएसआई ने दी थी. बस इसी बात का विरोध हो रहा है सरकार का कि वो (खुफिया) एजेंसी जो भारत के खिलाफ हमलों को प्रयोजित करती है उसी आईएसआई के अधिकारी को पठानकोट एयरबेस में जांच करने के लिए क्यों दाखिल होने दिया गया.

एक बार जरा पाकिस्तान की संयुक्त जांच दल के सदस्यों पर नजर डाल लेते हैं. पांच सदस्य इस दल का नेतृत्व कर रहे हैं पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के आंतक-निरोधी विभाग के एडीजी मोहम्मद ताहिर राय़. साथ ही इसी विभाग के गुजरांवाला में तैनात इंस्पेक्टर शाहिद तनवीर. ये दोनों ही पुलिस महकमें से ताल्लुक रखते हैं. या यूं कहें कि जांच अधिकारी हैं. इंस्पेकटर शाहिद तनवीर ही पाकिस्तान में पठानकोट हमले से जुड़े मामले के जांच-अधिकारी हैं. गौरतलब है कि भारत के दवाब के बाद पाकिस्तान ने इस हमले की एफआईआर दर्ज की थी. अब जरा बाकी तीन सदस्यों के प्रोफाइल को देखते हैं. पहले हैं पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी, आईएसआई के लेफ्टिनेंट कर्नल तनवीर हैदर. साथ ही हैं मिलेट्री इंटेलीजेंस के लेफ्टिनेंट कर्नल इरफान मिर्जा और इंटेलीजेंस ब्यूरो के उप-निदेशक अजीम अरशद. 
एनआईए मुख्यालय के बाहर पाकिस्तानी जांच दल केसदस्य
इंटेलीजेंस ब्यूरो के अधिकारी तो एक बार को समझ में आतें हैं कि उन्हे जांच दल में इसलिए रखा गया होगा क्योंकि जैश ए मोहम्मद पाकिस्तान से ही संचालित होता है. और इसका मुखिया मसूद अजहर पाकिस्तान में ही पनाह लिए हुए है. लेकिन आईएसआई और एमआई के सैन्य अधिकारियों को इस जांच दल में शामिल करने के पीछे क्या मंशा हैं सिर्फ पाकिस्तान ही जानता है. क्या इन दोनों को इसलिए जांच दल में शामिल किया गया है कि अगली बार किसी भारत के सैन्य-ठिकाने पर हमला करवाना हो तो उसकी फुल-प्रूफ प्लानिंग कर सकें. ये देखने के लिए कि पठानकोट एयरबेस में हमले में कहां उनके संचालित आतंकियों से गलती हो गई. क्यों नहीं वे टेक्निकल एरिया में दाखिल हो पाए.

भले ही रक्षा मंत्री के विरोध के बाद सरकार ने बीच का रास्ता निकाला और पाकिस्तानी जेआईटी को सिर्फ पठानकोट एयरबेस के डोमेस्टिक एयरबेस तक ही सीमित रखा. एयरबेस के टेक्निकल एरिया को पाकिस्तानी जांच दल की जद्द से दूर रखा गया. एयरबेस के टेक्निकल एरिया में ही लड़ाकू विमान खड़े होते हैं, रनवे होता है, लड़ाकू विमानों का ऑपरेशन यहीं पर बने कमांड एंड कंट्रोल सेंटर से होता है. यहां तक की हवाई सुरक्षा के लिए मिसाइल और एंटी-एयरक्राफ्ट गन्स (छोटी तोपें) इसी टेक्निकल एरिया में तैनात होती हैं. इसी लिए किसी भी देश की सेना के लिए अपने एयरबेस को ना केवल सुरक्षित रखना बेहद जरुरी है, दुश्मन की नजर उसपर ना पड़े ये भी बेहद जरुरी है. इसीलिए जांच दल को एयरबेस के डोमेस्टिक एरिया तक ही सीमित कर दिया गया.
पठानकोट एयरबेस पर चाक-चौबंद सुरक्षा
डोमेस्टिक एरिया में जवानों और एयरमैन के बैरक, प्रशासनिक-भवन, अधिकारियों के निवास और स्कूल इत्यादि होता है. 2 जनवरी को आतंकी पठानकोट एयरबेस के इसी डोमेस्टिक एरिया में दाखिल होने में कामयाब हो गए थे. हालांकि आतंकियों ने टेक्निकल एरिया में घुसने का भरसक प्रयास किया था, लेकिन कमांडोज़ ने उन्हे इसी डोमेस्टिक एरिया में ही ढेर कर दिया था. यानि आतंकवादियों और सुरक्षाबलों में मुठभेड़ इसी डोमेस्टिक एरिया में ही हुई थी. इसीलिए एनआईए की जांच का केंद्रबिन्दु भी डोमेस्टिक एरिया ही था. यहीं वजह है कि रक्षा मंत्री ने भी कहा कि ‘क्राइम-सीन’ तक ही पाकिस्तानी टीम को जाने की इजाजत दी जायेगी. और जब मंगलवार को पाकिस्तानी जेआईटी एयरबेस पहुंची, तो उसे मैन-गेट की बजाए चारदीवारी के पिछले हिस्से में एक छोटा गेट बनाकर अंदर दाखिल करवाया गया. इसी दरवाजे के करीब से ही आंतकी एयरबेस में दाखिल हुए थे. पूरे टेक्निकल एरिया को टैंट और शामियाने लगाकर ढक दिया गया था.

दरअसल, बात सैन्य-ठिकाने पर टेक्निकल एरिया में क्या दिखा या नहीं देखा है. बल्कि इस देश की सैन्य-अस्मिता की है. भला कैसे एक देश, जिसके साथ एक-दो नहीं बल्कि चार-पांच युद्ध लड़ चुके हों, जिसकी नीति ही आतंकियों के जरिए भारत में प्रॉक्सी-वॉर की हो, जो भारत को इन आतंकियों के जरिए ‘हजारों घाव देना चाहता हो’, उस देश की सेना और खुफिया एजेंसी को अपने एयरबेस में दाखिल क्यों होने दिया जाए.

क्या इस जेआईटी के जांच के लिए भारत (और पठानकोट एयरबेस) आने के बाद क्या गारंटी है कि आईएसआई और पाकिस्तानी सेना द्वारा प्रायोजित आतंकी हमले, युद्धविराम उल्लंघन और सीमा पर घुसपैठ बंद हो जायेगी. तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी की लाहौर यात्रा के फौरन बाद ही करगिल-युद्ध को क्या कोई आज तक भूला पाया है. और ज्यादा दूर जाने की जरुरत नहीं है. जब पाकिस्तान का जांच दल भारत आया हुआ है तो आईएसआई ने बलूचिस्तान में भारतीय नौसेना के एक पूर्व-अधिकारी को (जो नौकरी छोड़ने के बाद बिजनेसमैन बन चुका था) रॉ का जासूस बताकर गिरफ्तार कर लिया है.
नौसेना के पूर्व-अधिकारी को पाकिस्तान ने जासूस बना दिया
मंगलवार को जब पाकिस्तानी जांच दल पठानकोट में था, तब पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता जोर-शोर से प्रेस कांफ्रेंस कर इसी रॉ के कथित जासूस के इकबालिया बयान का वीडियो जारी कर भारत पर पाकिस्तान में आतंक फैलाने का दोष मढ़ रहे थे. यानि उल्टा चोर कोतवाल को डांटे. भारत एक सिरे से पाकिस्तान के इन आरोपों को नकार चुका है. भारत साफ कर चुका है कि कुलभूषण जाधव नौसेना की नौकरी छोड़ने के बाद कार्गो-कारोबार कर रहा था. उसका रॉ से कोई लेना-देना नहीं है.

साफ है कि आईएसआई और पाकिस्तानी सेना कभी भी भारत से किसी भी हाल में शांति बहाल नहीं करना चाहती है. हां शांति बहाली के लिए भारत और भारत की सरकार किसी भी हद तक अपने घुटने जरुर टेक सकती है. क्या पाकिस्तान के परमाणु हथियारों से भारत को डर लगता है इसलिए. या इसलिए कि कहीं पाकिस्तान से संचालित इन आतंकी संगठनों के हाथों में ये परमाणु हथियार ना पड़ जाएं. जैसा कि हाल ही में रक्षा मंत्रालय की सालाना-रिपोर्ट (2015-16) में लिखा गया है. अगर नहीं तो फिर आंतकियों के खिलाफ सीधे जंग छेड़ने के बजाए भारत ने इन आंतकियों को पनाह देने वाली आईएसआई और पाकिस्तानी सेना के अधिकारियों को अपने सैन्य-ठिकाने में जांच के नाम पर दाखिल क्यों होने दिया.
पठानकोट एयरबेस पर पाकिस्तान टीम
क्यों नहीं एनआईए को जांच के लिए पाकिस्तान भेजा गया. क्यों नहीं एनआईए को मसूद अजहर और उसके साथियों से पूछताछ करने दी गई. क्योंकि इस बात की इजाजत पाकिस्तानी सरकार भी नहीं दे सकती है. क्योंकि पाकिस्तान में सेना और आईएसआई खुद सरकार की नहीं सुनती हैं. क्योंकि वे अपने-आप में खुद एक सरकार हैं. पाकिस्तानी सेना और आईएसआई एक समांतर-सरकार को संचालित करती हैं. वहां की (राजनैतिक) सरकार भी इनके खिलाफ चूं तक नहीं करती है.

पाकिस्तानी अवाम भी अपनी राजनैतिक सरकार के बजाए सेना और आईएसआई में ज्यादा विश्वास करती है. इसीलिए वहां सेना द्वारा तख्ता-पलट आम बात है. यही वजह है कि जब भी भारत और पाकिस्तान के बीच दूरियां कम होती है, आईएसआई और पाकिस्तानी सेना कोई ना कोई ऐसी चाल चलती हैं कि दोनो देश फिर से दूर हो जाते हैं. याद है ना क्रिसमस पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पाकिस्तान यात्रा और उसके महज एक हफ्ते के भीतर ही पठानकोट एयरबेस पर आतंकी हमला. ऐसे में पाकिस्तानी हूकुमत से शांति की अपेक्षा बेमानी लगता है.

हाल ही में रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने संसद में ऐलान किया था कि आतंकी हमलों को देश के खिलाफ युद्ध के तौर पर देखना चाहिए. रक्षा मंत्री के इस बयान से कोई इंकार नहीं कर सकता है. लेकिन सवाल ये है कि अगर युद्ध की तरह देखना चाहिए तो उसके खिलाफ युद्ध करके मुंह तोड़ जवाब भी देना चाहिए. ना कि आतंकियों को पनाह देने वाले देश के नुमाइंदों को अपने मिलेट्री-बेस में जांच के नाम पर घूमाना चाहिए.

Thursday, March 10, 2016

टू-फ्रंट वाॅर के लिए नहीं है तैयार वायुसेना !

वायुसेना की घटती स्कावड्रन से बढ़ी चिंता
अगले हफ्ते पाकिस्तानी सीमा के करीब भारतीय वायुसेना सबसे बड़ा युद्धभ्यास करने जा रही है. लेकिन उससे पहले आज वायुसेना के वाइस चीफ ने ये कहकर सनसनी फैला दी कि अगर पाकिस्तान और चीन एक साथ भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ देते हैं तो मुकाबला करने के लिए वायुसेना के पास पर्याप्त लड़ाकू विमान नहीं हैं.

उप-वायुसेना प्रमुख एयर वाइस मार्शल बी एस धनोआ आज राजधानी दिल्ली में, 18 मार्च से शुरु हो रहे युद्धभ्यास, ‘आयरन-फिस्ट’ (IRON-FIST) के बारे में मीडिया से बातचीत कर रहे थे. इसी दौरान एक सवाल के जवाब में एयर मार्शल बी एस धनोआ ने कहा कि वायुसेना में वर्तमान में 32 स्क्वाड्रन (यानि 'जहाजों के जंगी बेड़े') हैं जबकि जरुरत 42 की है. खास बात ये है कि मौजूदा वायुसेना-प्रमुख के रिटायरमेंट के बाद बी एस धनोआ एयर फोर्स चीफ बनने की दौड़ में सबसे आगे हैं. खुद धनोआ कारगिल युद्ध में हिस्सा ले चुके हैं और उस वक्त लड़ाकू विमान मिग-21 से फ्रंट पर जाकर दुश्मन पर हमला किया था.
उप-वायुसेना प्रमुख एयर मार्शल बी एस धनोआ

 बताते चलें कि इस महीने की 18 मार्च को भारतीय वायुसेना राजस्थान के पोखरन में आयरन-फीस्ट नाम की एक्सरसाइज करने जा रही है. एक्सरसाइज में एयरफोर्स के 181 लड़ाकू विमान और हेलीकॉप्टर हिस्सा ले रहे हैं और इसे वायुसेना का शक्ति-परीक्षण माना जा रहा है. खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की मौजूदगी में आयरन-फीस्ट एक्सरसाइज हो रही है. ये युद्धभ्यास दिन और रात दोनों में होगा.  

बी एस धनोआ ने कहा कि कारगिल युद्ध के वक्त भारतीय वायुसेना के पास रात में एयर-ऑपरेशन करने की क्षमता नहीं थी. लेकिन आयरन-फीस्ट में दिखाया जायेगा कि 16 साल बाद वायुसेना नाइट-ऑपरेशन करने का माद्दा ही रखती है. इस युद्धभ्यास का 'मोटो' (आदर्श-वाक्य) है ‘सबक सिखाने की क्षमता का प्रदर्शन—हथियार सही समय, सही निशाने पर.’

इसी दौरान ही मीडिया से बातचीत के दौरान पूछा गया कि क्या इस युद्धभ्यास के बाद हम क्या चीन और पाकिस्तान से एक साथ लड़ने यानि 'टू-फ्रंट वॉर' के लिए तैयार हैं, एयर वाइस चीफ बी एस धनोआ ने कहा कि इसके लिए हमारे पास पर्याप्त स्क्वाड्रन (जंगी जहाजों का बेड़ा) नहीं हैं. उन्होनें कहा कि वायुसेना के पास इस वक्त मात्र 32 स्कावड्रन हैं जबकि हमें 42 की जरुरत है. 

वायुसेना के एक स्कावड्रन में 16-18 लड़ाकू विमान होते हैं. इस वक्त वायुसेना के पास 10 स्कावड्रन सुखोई के हैं और 11 मिग-21 और मिग-27 के हैं. इसके अलावा जगुआर के 06 स्कावड्रन, मिराज के 02 और मिग-29 की 03 हैं. यानि वायुसेना के पास अभी भी करीब 150 लड़ाकू विमान कम हैं. 

वायुसेना काफी समय से सरकार और ससंद की कमेटियों में स्कावड्रन की कमी की शिकायत कर चुकी है. लेकिन ये पहली बार है कि एयरफोर्स के किसी बड़े सैन्य-अधिकारी ने खुले-आम स्कावड्रन की कमी पर चिंता जताई है.

वायुसेना फ्रांस से मिलने वाले 36 रफाल फायटर एयरक्राफ्ट्स बेसब्री से इंतजार कर रही है. लेकिन रफाल सौदे की बढ़ी हुई कीमत के चलते लंबे समय से अधर में अटका हुआ है. बी एस धनोआ ने कहा कि अगर रफाल लड़ाकू विमान वायुसेना को मिलते हैं तो एयरफोर्स की मारक क्षमता काफी बढ़ जायेगी.

Saturday, March 5, 2016

सेना कम करे 'चर्बी' : पर्रिकर

सैनिकों से मिलते रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर
रक्षा बजट कम करने के लिए बेहद जरुरी है कि सेना अपनी 'चर्बी' कम करे. ये मानना है रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर का. पर्रिकर के मुताबिक ये सेना को तय करना है कि किस तरह से दुबला-पतला रहकर सेना अपने को फिट रखती है. 

रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर गुरुवार को राजधानी दिल्ली में रक्षा-बजट के बारे में मीडिया को सम्बोधित कर रहे थे. एक सवाल के जवाब में कि क्या देश इतने भारी-भरकम रक्षा बजट को सहन कर सकता है, पर्रिकर ने कहा कि उन्होनें खुद सेनाओं को सलाह दी है कि वे फालतू खर्चे ना करे. 
इस साल के आम बजट का 17.23% हिस्सा रक्षा बजट के लिए रखा गया है. इस साल रक्षा बजट करीब 3.41 लाख करोड़ रुपये है. इसमें से करीब 80 हजार करोड़़ सेनाओं के आधुनिकीकरण और 82 हजार करोड़ (रक्षा) पेंशन के लिए निर्धारित किया गया है. बाकी बजट सेना की सैलरी पर खर्च होता है.
गौरतलब है की 13 लाख की भारतीय सेना दुनिया की सबसे बड़ी सेनाओ में से एक है. लेकिन समय समय पर इतनी बड़ी सेना के औचित्य पर ही जानकार सवाल खड़े करते आएं हैं.  
प्रेस को सम्बोधित करते रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर
उदाहरण देते हुए रक्षा मंत्री ने कहा कि आज के दौर मे सेनाओं को टेलीफोन-ऑपरेटर्स की जरुरत नहीं है तो भी हर रेजीॉमेंट में उसकी पोस्ट बनी हुई है. साथ ही कहा कि नॉन-कॉम्बेट ट्रैनिंग को ज्यादा से ज्यादा फील़्ड की बजाए सिम्युलेटर पर करनी चाहिए. वायुसेना का भी उदाहरण देते हुए रक्षा मंत्री ने कहा कि एक पायलेट को अगर 300 घंटों की फ्लाईंग की ट्रैनिंग करनी है तो उसे बजाए पूरा समय हवा में ट्रैनिंग लेने के, आधा वक्त सिम्युलेटर पर भी ट्रैनिंग लेनी चाहिए. 

हालांकि रक्षा मंत्री ने उन  सभी अटकलों को मीडिया के सामने दूर कर दिया जिसमें ये बात लगातार उठ रही थी कि सरकार सेना के लिए बेहद जरुरी माउंटेन स्ट्राइक कोर का बजट कम करने जा रही है या उसे छोटा करने जा रही है. माना जा रहा है कि भारतीय सेना के ये स्ट्राइक कोर चीन की बढ़ती ताकत से टक्कर लेने के लिए खड़ी की जा रही है.

पर्रिकर ने ये भी कहा कि इस साल अमेरिका सरकार के खाते में पड़े तीन बिलियन डॉलर (करीब 2 खरब रुपये) में से 1.3 बिलियन डॉलर निकाल लिए हैं. क्योंकि इतनी बड़ी रकम पिछले कई सालों से बिना किसी कारण से पड़ी हुई थी. भारत सरकार ने ये रकम अमेरिका में फॉरेन मिलेट्री सेल्स (एफएमएस) के लिए जमा कराई थी. लेकिन रक्षा सौदोेें में हो रही देरी के कारण इसका कोई उपयोग नहीं हो रहा था, इसलिए इसका एक बड़ा हिस्सा रक्षा मंत्रालय ने निकाल लिया है.