Wednesday, February 8, 2017

आतंकवाद के खिलाफ कारगर 'हथियार' भी है सोशल मीडिया !

सोशल मीडिया आंतकवाद के खिलाफ जंग लड़ने में अहम भूमिका निभा रहा है. ये मानना है सूचना एवम प्रसारण राज्यमंत्री राज्यवर्धन राठौर का. राठौर के मुताबिक, आतंकवाद के खिलाफ जंग में सुरक्षा एजेंसियों को प्राईवेट सेक्टर की मदद लेनी चाहिए. सोशल मीडिया के जरिए आतंकियों की पहचान कराने में प्राईवेट सेक्टर की भूमिका की तारीफ करते हुए सेना के पूर्व कर्नल ने कहा कि आतंकवाद से लड़ने के लिए इंटेलीजेंस, टेक्नोलोजी और सामरिक-रणनीति का समन्वय बेहद जरुरी है.

राज्यवर्धन राठौर आज राजधानी दिल्ली के करीब मानेसर स्थित एनएसजी कैंपस में एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन को संबोधित कर रहे थे. इस मौके पर राठौर ने कहा कि आंतकियों के लिए कोई सरहद या सीमा नहीं होती, जबकि सेनाओं और सुरक्षा एजेसिंयों को अपने निश्चित बॉर्डर्स में काम करना होता है. हाल ही में हैदराबाद से पकड़े गए आईएसआईएस के एक आंतकी का हवाला देते हुए, सूचना एवम प्रसारण राज्यमंत्री ने कहा कि वो आतंकी सीरिया में बैठे अपने आकाओं से निर्देश लेकर महाराष्ट्र के तट पर हथियारों की एक कंसाईनमेंट लेने वाला था. टी.वी चैनल्स के सिग्नल्स के तरह ही अल-कायदा और आईएसआईएस के आंतकी भी दुनिया के किसी भी कोने में अपने संपर्क-सूत्रों से दिशा-निर्देश लेते रहते हैं.

सेना में कर्नल के पद से रिटायर हुए राज्यवर्धन राठौर ने कहा कि वे लोन-वुल्फ जैसी किसी थ्योरी को नहीं मानते हैं. उन्होनें कहा कि आंतकियों की कमर तोड़ने के लिए टेरर-फंडिग पर लगाम लगानी बेहद जरुरी है. अमेरिका का जिक्र करते हुए राठौर ने कहा कि 9-11 के हमले के बाद जिस तरह से वहां पर टेरर-फंडिग पर रोक लगाई गई है उसी का नतीजा है कि वहां पर अब आतंकी हमले काफी कम हो गए हैं. राठौर के मुताबिक, हाल ही में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नोटबंदी के फैसले से जम्मू-कश्मीर में पथराव और माओवादियों की हिंसक घटनाओं में कमी आई है. लेकिन उन्होनें कहा कि नोटबंदी के दीर्घकालिक परिणाम अभी दिखने बाकी हैं.

सेमिनार को संबोधित करने से पहले राज्यवर्धन राठौर ने एनएसजी के नेशनल काउंटर टेरेरिज्म इंस्टीट्यूट के ऑडिटोरियम का उद्घाटन किया. इस ऑडिटोरियम का नाम पठानकोट हमले में शहीद हुए लेफ्टिनेंट कर्नल, निरंजन कुमार के पर रखा गया है. जनवरी 2016 में पठानकोट हमले के बाद एक आईईडी को निष्कृय करने के दौरान निरंजन कुमार शहीद हो गए थे. एनएसजी के मुताबिक, वर्ष 2016 में आईईडी से जुड़ी कुल 300 घटनाएं सामने आईँ, जिनमे करीब 100 लोगों की जान चली गई. हर साल एनएसजी, आंतकवाद और आईईडी से जुड़ा एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित करती है, जिसमें देश-विदेश के डेलीगेट्स हिस्सा लेते हैं.

Sunday, December 18, 2016

बिपिन रावत बने नए सेनाध्यक्ष-'योग्यता' ने मारी बाज़ी ?

बिपिन रावत: नए सेना प्रमुख
सरकार ने आज नए सेना प्रमुख और वायुसेना प्रमुखों के नाम की घोषणा कर दी. सबसे हैरानी हुई है थलसेना प्रमुख के नाम पर. सरकार ने सह-सेना प्रमुख बिपिन रावत को नया सेनाध्यक्ष बनाने की घोषणा की है. बिपिन रावत 31 दिसम्बर को रिटायर हो रहे जनरल दलबीर सिंह की जगह भारतीय सेना के 27वें सेनाध्यक्ष होंगे. बिपिन रावत सेना में फिलहाल वरिष्ठता में तीसरे नंबर पर थे. नए वायुसेनाध्यक्ष के तौर पर आज बी एस धनोआ का ऐलान किया गया. वे भी 31 दिसम्बर को रिटायर हो रहे एयर चीफ मार्शन अरुप राहा की जगह लेंगे.  

सेना में अभी तक वरिष्ठता को ही वरीयता देते हुए सेनाध्यक्ष की घोषणा की जाती रही है. ऐसे में बिपिन रावत के नाम ने सभी को हैरान कर दिया. बिपिन रावत भले ही सह-सेनाध्यक्ष यानि वाईस चीफ ऑफ चीफ स्टाफ के पद पर तैनात हों, लेकिन पूर्वी कमान के कमांडर, लेफ्टिनेंट जनरल प्रवीन बख्शी और दक्षिणी कमान के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल पी एम हैरिज़ सीनियोरिटी में उनसे ऊपर थे.

सूत्रों के मुताबिक, सेना के सभी लेफ्टिनेंट जनरल्स में बिपिन रावत को “सबसे उपयुक्त पाया गया.” जनरल रावत “उत्तर ( यानि चीन से) उभरती चुनौतियों और उसके लिए पुर्नगठित किए गए सैन्यबल सहित आंतकवाद और पश्चिम ( यानि पाकिस्तान के) प्रोक्सी-वॉर से निपटने तथा उत्तर-पूर्व की परिस्थितियों से निपटने के लिए सबसे उपयुक्त पाया गया.”
भारतीय सेना: गोरखा अधिकारियों का बोलबाला
बिपिन रावत को सेना में हाई-ऑलिट्यूड यानि उंचाई पर युद्ध लड़ने और काउंटर-इंनसर्जेंसी ऑपरेशन्स के एक्सपर्ट के तौर पर जाना जाता है. मीडिया-स्ट्रटेजी में डॉक्टरेट रखने वाले बिपिन रावत ने अपने 38 साल के कार्यकाल में एलओसी, चीन सीमा और उत्तर-पूर्व में एक लंबा वक्त बिताया है. उनका “सैनिकों के प्रति संतुलित दृष्टिकोण तो है ही, साथ ही नागरिक-समाज के साथ जुड़ा माना जाता है.” दक्षिणी कमांड की कमान संभालते हुए उन्होनें पाकिस्तान से सटी पश्चिमी सीमा पर मैकेनाइजड-वॉरफेयर के साथ-साथ वायुसेना और नौसेना के साथ बेहतर समन्वय और सामंजस्य बैठाया.

मूल रुप से उत्तराखंड के रहने वाले बिपिन रावत ने 1978 में सेना ज्वाइन की थी. उन्हे इंडियन मिलेट्री एकेडमी (आईएमए) में स्वार्ड ऑफ ऑनर’ से नवाजा गया था.  उन्होनें सेना की 11वीं गोरखा राईफल्स की पांचवी (5) बटालियन ज्वाइन की थी. (मौजूदा सेना प्रमुख जनरल दलबीर सिंह भी गोरखा अधिकारी हैं.)  बिपिन रावत ने कश्मीर घाटी में पहले राष्ट्रीय-राईफल्स में ब्रिगिडेयर और बाद में मेजर-जनरल के तौर पर इंफंट्री डिवीजन की कमान संभाल. साथ ही चीन सीमा पर कर्नल के तौर पर इंफेंट्री बटालियन की कमान भी संभाली थी. वे दीमापुर स्थित तीसरी कोर के जीओसी पर रह चुके हैं (दीमापुर में कार्यरत के दौरान ही वे एक बड़े हेलीकॉप्टर दुर्घटना में बाल-बाल बचे थे). इसके अलावा सेना मुख्यालय में डीजीएमओ कार्यालय और कांगो में यूएन-पीसकीपिंग फोर्स की ब्रिगेड की कमान संभाल चुके हैं.
अब क्या करेंगे प्रवीन बख्शी
वेलिंगटन स्थित डिफेंस सर्विस स्टाफ और नेशनल डिफेंस कॉलेज से हायर कोर्स करने के अलावा वे आईएमए और आर्मी वॉर कॉलेज, महूं में भी इंस्ट्रक्टर रह चुके हैं.

लेकिन जानकारों के मुताबिक, बिपिन रावत ने कभी भी सेना की दो सबसे महत्वपूर्ण कमांड (उत्तरी और पूर्वी) में से एक की भी कमान नहीं संभाली है. जबकि प्रवीन बख्शी (जम्मू-कश्मीर स्थित) उत्तरी कमांड में चीफ ऑफ स्टाफ और फिलहाल (कोलकता स्थित) पूर्वी कमांड की कमान संभाले हुए है. 

33 साल में पहली बार ऐसा हुआ है कि सरकार ने वरिष्ठता को दरकिनार करते हुए बिपिन रावत को सेना प्रमुख बनाया है. 1983 में इंदिरा गांधी ने एस के सिन्हा की जगह जूनियर अधिकारी ए एस वैद्य को सेना प्रमुख बनाया था. उसके बाद से सबसे सीनियर लेफ्टिनेंट जनरल को ही सेनाध्याक्ष बनाए जाने की पंरपरा थी.

माना ये भी जा रहा है कि बिपिन रावत को इंफेंट्री-अधिकारी होने का फायदा मिला है. क्योंकि प्रवीन बख्शी आर्मर्ड (यानि टैंक रेजीमेंट के) अधिकारी है. रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर पहले ही कई सार्वजनिक मंचों पर इस बात का ऐलान कर चुके थे कि (मोदी) सरकार ‘वरिष्ठता की बजाए योग्यता’ को तबज्जो देती है. 
विवादों से दूर रही नए वायुसेनाध्यक्ष की नियुक्ति
नए वायुसेना प्रमुख बी एस धनोआ ने भी 1978 में एक फाइटर पायलट के तौर पर वायुसेना ज्वाइन की थी. कारगिल युद्ध में वायुसेना की तरफ से उन्होनें एयर-ऑपरेशन्स में हिस्सा लिया था. वे भटिंडा स्थित उस मिग-फाइटर प्लेन स्कॉवड्रन के कमांडिग ऑफिसर (सीओ) थे जिसके अधिकारी अजय आहूजा करगिल युद्ध में शहीद हुए थे.  करगिल युद्ध में उन्हें युद्ध-सेवा मेडल से नवाजा गया था. वे फिलहाल सह-वायुसेना प्रमुख के तौर पर एयर-हेडक्वार्टर में तैनात हैं. इससे पहले वे साउथ-वेस्टर्न कमांड की कमान संभाल चुके हैं. उनके पिता एस एस धनोआ पंजाब के चीफ सेक्रटेरी रह चुके हैं. 

Friday, December 16, 2016

जवान की कस्टडी को लेकर सेना प्रमुख को कानूनी नोटिस



सेना प्रमुख जनरल दलबीर सिंह की पलटन में एक जवान की एलओसी पर तैनाती को लेकर अफसरों में आपसी टकराव हो गया है. नेपाल के रहने वाले इस जवान के वकील ने सेना द्वारा 'गैर-कानूनी' तरीके से उसके मुवक्किल को 'मिलेट्री-कस्टडी' में रखने का विरोध करते हुए सेनाध्यक्ष और रक्षा मंत्री को कानूनी-नोटिस भेजा है. 

ये अजीबो-गरीब मामला सामने तब आया जब गोरखा राईफल्स की 2/1 यूनिट के एक राईफलमैन टेक बहादुर थापा को गोरखा ट्रेनिंग सेंटर के कमांडेंट ने 28 दिनों की मिलेट्री-कस्टडी (यानि सैन्य-जेल) में भेज दिया. इसका विरोध ना केवल राईफलमैन की यूनिट ने किया है बल्कि उसके वकील ने भी किया है. वकील का कहना है की अधिकारियों की आपसी खीचतान में एक बेकसूर जवान को सताया जा रहा है. बतातें चलें कि सेना प्रमुख जनरल दलबीर सिंह और सह-सेनाध्यक्ष विपिन रावत भी गोरखा रेजीमेंट से ताल्लुक रखते हैं.

दरअसल, पूरे मामले की शुरूआत होती है इस साल के फरवरी में जब राईफलमैन टेक बहादुर थापा को उसकी यूनिट (2/1 गोरखा) से 179 दिनों के लिए सुबाथु स्थित गोरखा ट्रेनिंग सेंटर (शिमला के करीब) में 'प्रशासनिक ड्यूटी' के लिए भेजा गया था. उसे ये डयूटी खत्म करने के बाद अगस्त महीने में वापस अपनी यूनिट मे रिपोर्ट करना था. लेकिन वो तय-समय पर अपनी यूनिट वापस नहीं लौटा.

इस बीच उरी हमले और फिर सर्जिकल स्ट्राइक के बाद एलओसी पर पाकिस्तान से तनातनी बढ़ी तो 2/1 गोरखा के सीओ (कमांडिंग ऑफिसर) कर्नल ललित जैन ने ट्रैनिंग सेंटर के कमांडेंट, ब्रिगेडयर आर एस रावत को राईफलमैन टेक बहादुर थापा थापा को वापस यूनिट भेजने के लिए कहा. उस वक्त ये यूनिट एलओसी पर तैनात थी. सीओ ने कमांडेंट को बताया कि इस वक्त एलओसी पर हालात सही नहीं है और जवानों की जरूरत है. इसलिए टेक बहादुर को फौरन यूनिट वापस भेज दिया जाए. लेकिन बताया जा रहा है कि कमांडेंट ने ऐसा नहीं किया.

इस बीच टेक बहादुर थापा कि यूनिट के एक अधिकारी ने उसे फोन पर आदेश दिया कि वो फौरन एलओसी पर रिपोर्ट करे. टेक बहादुर ने अपने वरिष्ठ अधिकारी की आज्ञा का पालन किया और 16 नबम्बर को वहां पहुंच गया. बस इसी बात से ट्रैनिंग सेंटर के कमांडेंट और दूसरे अधिकारी नाराज हो गए. 

इसके बाद कमांडेंट आय एस रावत ने 2/1 यूनिट के सीओ से कहा कि वे टेक बहादुर को वापस भेज दें ताकि कागजी कारवाई के बाद उसे ट्रेनिंग सेंटर से यूनिट के लिए 'डिस्पेच' किया जाए. इसके बाद टेक बहादुर को 27 नबम्बर को एक बार फिर ट्रेनिंग सेंटर भेजा दिया गया. लेकिन वहां पहुंचने पर कमाडेंट ने उसे बिना बताए सेंटर छोड़कर जाने के लिए 28 दिन की कठोर कारावास की सजा सुना दी. एक दिसम्बर को ये सजा सुनाई गई थी जिसके बाद से वो मिलेट्री-जेल में है.

सजा की खबर मिलने के बाद टेक बहादुर की यूनिट के सीओ ने ट्रेनिंग सेंटर के कमांडेंट को कड़ी चिठ्ठी लिखते हुए इस सजा पर ऐतराज जताया है. साथ ही वरिष्ठ अधिकारियों को भी पूरे मामले से अवगत कराया.

इस बीच टेक बहादुर के वकील अजय शर्मा ने ट्रेनिंग सेंटर के कमांडेंट आर एस रावत सहित सेना प्रमुख, रक्षा मंत्री और पश्चिमी कमान के कमांडर को कानूनी नोटिस भेजकर उसे जल्द रिहा करने के लिए कहा है. वकील अजय शर्मा ने कहा कि अगर सेना ने टेक बहादुर को रिहा ने किया तो वे अदालत का दरवाजा खटखटाएंगे. अजय शर्मा के मुताबिक, आर्मी एक्ट के मुताबिक, किसी भी जवान को सजा देने का अधिकार उसकी यूनिट के सीओ को है. ट्रेनिंग सेंटर के कमांडेंट और दूसरे अधिकारियों को टेक बहादुर को सजा देना का हक नहीं है.

इस मामले पर सेना मुख्यालय का कहना है कि ये आर्मी का 'आंतरिक और प्रशासनिक मामला' है. लेकिन सूत्रों ने बताया कि दरअसल ये दो अधिकारियों की आपसी 'ईगो' यानि अहम की लड़ाई का नतीजा है जिसका खामियाजा एक सैनिक को उठाना पड़ रहा है.

Thursday, December 8, 2016

21वीं सदी की 'निर्णायक' सैन्य साझेदारी !


भारत को 'प्रमुख रक्षा पार्टनर' घोषित करते हुए अमेरिका ने आज कहा कि दोनों देशों की सैन्य-साझेदारी 21वीं सदी की 'निर्णायक साझेदारी' सबित होगी. 

अमेरिका के रक्षा सचिव ऐश्टन कार्टर ने आज राजधानी दिल्ली में घोषणा की कि भारत अमेरिका का 'मेजर डिफेंस पार्टनर' है. कार्टर ने ये घोषणा आज राजधानी दिल्ली में रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर से मुलाकात के दौरान की. अपने कार्यकाल के खत्म होने पर कार्टर मित्र-देशों की यात्रा पर निकले हैं. ये पहली बार है कि अमेरिका का कोई रक्षा सचिव अपनी फेरवेल-वीजिट पर भारत आया है.

मुलाकात के बाद दोनों देशों ने साझा-बयान ('ज्वाइंट स्टेटमेंट') जारी किया. साझा बयान में कहा गया कि दोनों देश इस बात पर ध्यान देंगे कि आतंकवाद को किसी भी देश (पढ़े पाकिस्तान) का सरंक्षण ना मिल पाए. साथ ही कहा गया कि दोनों देश आतंक के खिलाफ एक दूसरे का सहयोग करेगें.

साझा बयान में कहा गया है कि दोनों देश एशिया-पैसेफिक और हिंद महासागर क्षेत्र में शांति और सम्पनता चाहते हैं.

पिछले दो सालो में कार्टर और पर्रीकर की ये सातवी मुलाकात है. मुलाकात के दौरान पर्रीकर ने कहा कि भारत और अमेरिका के बीच में जितने भी सैन्य समझौते पिछले दो सालों में हस्ताक्षर हुए हैं वे अब पूरे होने जा रहे है. पर्रीकर ने कहा कि दोनों देशों के संबंधों की जो नींव कार्टर ने डाली है वो आने वाले समय में और बड़ी हो जायेगी. 

कार्टर रक्षा सचिव के पद पर अगले महीने तक हैं. अमेरिका के नए राष्ट्रपति डोनालड ट्रंप ने सेना के पूर्व वरिष्ठ षैन्य अधिकारी, जेम्स मैटिस को अपना रक्षा सचिव बनाने की घोषणा की है.

गौरतलब है कि हाल के समय में भारत और अमेरिका के संबंध काफी मजबूत हुए हैं. अमेरिका भारत को अहम सैन्य साजों सामान मुहैया करा रहा है जिसमें एम-777 तोपें, मिलेट्री एयरक्राफ्ट, अटैक-हेलीकाॅप्टर और एयरक्राफ्ट-कैरियर से जुड़ी अहम तकनीक शामिल हैं. भारत ने अमेरिका से रक्षा तकनीक के लिए डीटीटीआई (डिफेंस टेक्नाॅलोजी एड ट्रेड इनीशियेटिव) नाम की संधि भी कर रखी है. हाल ही में दोनों देशों ने एक दूसरे के मिलेट्री-बेस को इस्तेमाल करने के लिए 'लेमोआ' (लाॅजिस्टिक एंड मेमोरेंडम एक्सचेंज एग्रीमेंट) समझौता भी किया है.

Tuesday, December 6, 2016

चीन की तर्ज पर हटेगा दिल्ली एयरपोर्ट से घना कोहरा

दिल्ली एयरपोर्ट पर घने कोहरे के कारण विमानों की आवाजाही में होने वाली समस्या जल्द दूर हो सकती है. दिल्ली एयरपोर्ट और मौसम विभाग एक साथ मिलकर ऐसे प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं जिससे एयरपोर्ट पर कोहरे की चादर को को हटा जा सकेगा और ज्यादा से ज्यादा विमान उड़ान भर सकेंगे. ये ठीक वैसा ही प्लान है जैसाकि चीन ने कुछ साल पहले किया था.

सर्दी के मौसम में दिल्ली एयरपोर्ट पर घने कोहरे के कारण हर साल विमानों की उड़ान पर खासा असर पड़ता है. जिसके चलते हजारों यात्रियों को काफी मुश्किल का सामना करना पड़ता है. इसी चुनौती को दूर करने के लिए ये प्रयोग किया जा रहा है. दिल्ली एयरपोर्ट को संचालित करने वाली कंपनी, जीएमआर के सीईओ ने आज ये जानकारी दी. 

घने कोहरे के दौरान यात्रियों को कम से कम परेशानी हो, उसपर आज मीडिया से बातचीत करते हुए जीएमआर कंपनी के सीईओ, आई प्रभाकर राव ने कहा कि "मौसम विभाग घने कोहरे के कणों ('पार्टिकल्स') की स्टडी कर रहा है ताकि उन्हें हवा से हटाया जा सके." प्रेस कांफ्रेंस में मौजूद मौसम विभाग के एक वैज्ञानिक ने बताया कि "ये प्रयोग चीन की तरह ही है."

दरअसल, वर्ष 2009 में चीन की राजधानी बीजिंग में कम्युनिस्ट शासन के 60 साल पूरे होने के मौके पर शानदार परेड होने वाली थी. लेकिन इस दौरान घना कोहरा छाया हुआ था. माना जाता है कि चीन के वैज्ञानिकों ने उस दौरान आसमान में मिसाइल दागकर कृत्रिम बारिश कर दी और घना कोहरा दूर हो गया था. यही तकनीक माना जा रहा है कि भारत के मौसम वैज्ञानिक इस्तेमाल करने जा रहे हैं.

आई प्रभाकर राव के मुताबिक, दिल्ली एयरपोर्ट पर 50 मीटर की विज़ीबिलेटी में भी विमान लैंड कर सकते हैं. लेकिन टेक-ऑफ के लिए कम से कम 125 मीटर की विजीबिलेटी होने चाहिए. उन्होने बताया कि एयरपोर्ट पर सीडीएम-सैल (कोलेब्रेटिव डिशीजन मेकिंग-प्रकोष्ठ) तैयार किया गया है. इस सेल में एयरपोर्ट संचालित करने वाली कंपनी (जीएमआर), एटीसी (एयर ट्रैफिक कंट्रोल) और मौसम विभाग सहित एयरलांइस कंपनियां शामिल हैं.

सीडीएम के जरिए कोहरे से जुड़ी सही जानकारी और फ्लाइट ऑपरेशन्स की डिटेल एक समय में सभी को एक साथ मिल जाती है. इससे एयरलाइंस कंपनियां यात्रियों को सही जानकारी सही समय में बताने में कारगर हैं (और यात्रियों को सही जानकारी मिलने से परेशानी कम हो सकेगी).

जानकारी के मुताबिक, हर साल नबम्बर से लेकर फरवरी तक करीब 20 दिन ऐसे होते हैं जब राजधानी दिल्ली में घना कोहरा होता है. इस दौरान करीब 100 घंटों तक फ्लाइट्स की आवाजाही पर काफी असर पड़ता है. अगर मौसम विभाग का (चीन की तरह) प्रयोग सफल रहा तो ये परेशानी 20 घंटे तक रह जायेगी.

Wednesday, September 14, 2016

राफेल फाइटर प्लेन : एशिया का गेम-चेंजर

फ्रांस के साथ हुए सौदे में जो 36 राफेल (या रफाल) फाइटर प्लेन भारत को मिलने वाले हैं, वे अत्याधुनिक हथियारों और मिसाइलों से लैस हैं. खास है दुनिया की सबसे घातक समझे जाने वाली हवा से हवा में मार करन वाली 'मेटेओर' मिसाइल. ये मिसाइल चीन तो क्या किसी भी एशियाई देश के पास नहीं है. यानि राफेल प्लेन वाकई दक्षिण-एशिया में गेम-चेंजर साबित हो सकता है.

सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, भारत ने राफेल सौदे में करीब 710 मिलियन यूरो (यानि करीब 5341 करोड़ रुपये) लड़ाकू विमानों के हथियारों पर खर्च किए हैं. गौरतलब है कि पूरे सौदे की कीमत करीब 7.9 बिलियन यूरो है यानि करीब 59 हजार करोड़ रुपये है.

रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर के मुताबिक, राफेल सौदा आखिरी चरण में है और आखिरी मुहर लगनी बाकी है. सौदे से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक, सौदे का प्रारुप तैयार किया जा रहा है और अगले कुछ दिनों में सौदे की घोषणा कर दी जायेगी. अभी ये सौदा इंटर गर्वमेंटल कमेटी के पास फाइनल होने के लिए भेजा गया है.

जानकारी के मुताबिक, वियोंड विज्युल रेंज ‘मेटेओर’ मिसाइल की रेंज करीब 150 किलोमीटर है. हवा से हवा में मार करने वाली ये मिसाइल दुनिया की सबसे घातक हथियारों में गिनी जाती है. इसके अलावा राफेल फाइटर जेट लंबी दूरी की हवा से सतह में मार करने वाली 'स्कैल्प' क्रूज मिसाइल और हवा से हवा में मार करने वाली 'माइका' मिसाइल से भी लैस है.

सूत्रों के मुताबिक, राफेल प्लेन में एक और खासयित है. वो ये कि इसके पायलट के हेलमेट में ही फाइटर प्लेन का पूरा डिस्पले सिस्टम होगा. यानि उसे प्लेन के कॉकपिट में लगे सिस्टम को देखने की जरुरत भी नहीं पड़ेगी. उसका पूरा कॉकपिट का डिस्पले हेलमेट में होगा.

माना जा रहा है कि सौदे पर स्टैंप लगने के बाद पहला प्लने अगले 36 महीने में भारत पहुंच जायेगा. सभी 36 प्लेन अगले 66 महीने में भारतीय वायुसेना में शामिल होने के लिए तैयार हो जायेंगे.

जानकारी के मुताबिक, राफेल बनाने वाली कंपनी से भारत ने ये भी सुनिश्चित कराया है कि एक समय में 75 प्रतिशत प्लेन हमेशा ऑपरेशनली-रेडी रहने चाहिए. इसके अलावा भारतीय जलवायु और लेह-लद्दाख जैसे इलाकों के लिए खास तरह के उपकरण लगाए गए हैं.

राफेल का फुल पैकेज कुछ इस तरह है. 36 विमानों की कीमत 3402 मिलियन यूरो, विमानों के स्पेयर पार्टस 1800 मिलियन यूरो के हैं जबकि भारत के जलवायु के अनुरुप बनाने में खर्चा हुआ है 1700 मिलियन यूरो का. इसके अलवा पर्फोमेंस बेस्ड लॉजिस्टिक का खर्चा है करीब 353 मिलियन यूरो का.

Tuesday, September 13, 2016

सारागढ़ी की लड़ाई अब रुपहले परदे पर !


विश्व- प्रसिद्ध ऐतिहासिक ‘सारागढ़ी की लड़ाई’ पर जाने-माने फिल्मकार राजकुमार संतोषी फिल्म बनाने जा रहे हैं. आज राजधानी दिल्ली में रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर, सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी और सूचना एवम प्रसारण राज्य मंत्री राज्यवर्धन राठौर ने फिल्म का मुहूर्त शॉट दिया. फिल्म में मुख्य भूमिका में हैं रणदीप हुड्डा.

सारागढ़ी की लड़ाई 12 सितबंर 1897 को पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा पर सारागढ़ी चौकी पर लड़ी गई थी. इस लड़ाई में 21 सिख योद्धाओं ने 10 हजार अफगानी कबीलाईयों से मुकाबला किया था. हालांकि लड़ते लड़ते सभी 21 सिख सैनिक शहीद हो गए थे, लेकिन मरने से पहले उन्होनें 600 अफगानियों को मौत के घाट उतार दिया था. करीब साढ़े छह घंटे चली इस लड़ाई में बेहद बहादुरी से लड़े इन वीर सैनिकों ने अफगानी कबीलाईयों को नाकों चने चबा दिए थे. यही वजह है कि यूनेस्को ने इस लड़ाई को इतिहास की आठ (08) सर्वश्रेष्ठ बहादुरी की गाथाओं में जगह दी है.

राजकुमार संतोषी ने इस फिल्म का टाइटल दिया है ’21 द लास्ट स्टैंड---द बैटेल ऑफ सारागढ़ी’. फिल्म के मुहूर्त शॉट के लिए राजधानी दिल्ली में सेना के मानेकशॉ-सेंटर में रणदीप हुड्डा और बाकी 20 सैनिकों को अंग्रेजों की फौज की वर्दी में मुहूर्त शॉट लिया गया. खास बात ये है कि मुहूर्त शॉट की क्लैपिंग केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने की और कैमरे पर थे मनोहर पर्रीकर और राज्यवर्धन राठौर. राजकुमार संतोषी ने फिल्म के महूर्त के लिए 12  सितम्बर का ही दिन चुना--यानी जिस दिन ये लड़ाई वास्तव में लड़ी गयी थी आज से 119 साल पहले. 

सारागढ़ी की लड़ाई की बारे में कम ही लोग जानते हैं. यही वजह है कि राजकुमार संतोषी इस लड़ाई को फिल्मी पर्दे पर उतारकर देश के आमजन तक पहुंचाने चाहते हैं. इस मौके पर बोलते हुए राजकुमार संतोषी ने कहा कि इस फिल्म के जरिए देश की गौरवगाथा का तो लोगों को पता चलेगा ही साथ ही सिखों को भी बालीवुड में एक उचित स्थान मिलेगा, जो अभी तक सिर्फ कॉमेडियन या फिर छोटे मोटे रोल तक सीमित रह जाते हैं. इस फिल्म के जरिए सिखों की बहादुरी की सच्ची कहानी लोगों तक पहुंचेगी. मिलेट्री इतिहास के जानकारों के मुताबिक हमारे देश के कम लोग ही इस विश्व-प्रसिद्ध जंग से वाकिफ हैं. हालांकि कई देशों की फौज में इस लड़ाई को (ट्रेनिंग) कोर्स के दौरान पढ़ाया जाता है--की कैसे विपरीत परिस्तिथियों में भी अपना मोर्चा नहीं छोड़ते हैं और दुश्मन से डटकर मुक़ाबला करते हैं.  

1897 में जब ये लड़ाई लड़ी गई थी उस वक्त हिंदुस्तान (यानि आज के भारत और पाकिस्तान में) अंग्रेजों की हुकुमत थी. ये 21 सिख सैनिक अंग्रेजी फौज का हिस्सा थे. ये सैनिक सिख रेजीमेंट का हिस्सा थे और नार्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्रोविंस (आज के पाकिस्तान में) सारागढ़ी किले की चौकसी का काम करते थे. बताते हैं कि इस इलाकों को अंग्रेजी हुकुमत से आजाद कराने के लिए अफगानी कबीलाईयों ने सारागढ़ी चौकी पर हमला बोल दिया था. लेकिन मात्र 21 सैनिकों ने मरते दम तक इस चौकी को नहीं छोड़ा. राजकुमार संतोषी के मुताबिक, ये 21 सैनिक चाहते तो सरेंडर भी कर सकते थे, लेकिन उन्होनें अपना कर्तव्य निभाना ज्यादा जरुरी समझा.