Friday, May 10, 2019

कराची से गलत दिशा में आ रहे विमान की भारत के फाइटर जेट्स ने कराई जयपुर में लैंडिंग

कराची से भारत की एयर-स्पेस में गलत दिशा से दाखिल होने के चलते जार्जिया के एक कार्गो प्लेन को भारतीय वायुसेना के सुखोई लड़ाकू विमानों ने जयपुर एयकपोर्ट पर जबरदस्ती लैंडिंग कराई. ये एएन12 विमान जार्जिया की राजधानी तिल्बिसी से उड़कर कराची के रास्ते दिल्ली आ रहा था. देर जयपुर में इस विमान के पायलट और क्रू के दूसरे सदस्यों से वायुसेना और इंटेलीजेंस एजेंसियां कड़ी पूछताछ कर रहीं थीं.  


भारतीय वायुसेना के प्रवक्ता, ग्रुप कैप्टन अनुपम बैनर्जी ने एक प्रेस रिलीज जारी करते हुए कहा कि दोपहर 3.15 बजे एक विमान ने उत्तरी गुजरात से भारत की हवाई-सीमा में दाखिल होने की कोशिश की. हालांकि इस विमान का आईएफएफ (यानि आईडिंटिफिकेशन, फ्रेंड ओर फो) चालू था लेकिन इसने निर्धारित एयर-ट्रैफिक रूट नहीं लिया था और भारत की एटीसी द्वारा की गई रेडियो-कॉल्स का भी जवाब नहीं दिया. क्योंकि मौजूदा जियो-पोलिटिकल परिस्थितियों (यानि बालाकोट एयर-स्ट्राइक और उसके बाद के भारत-पाकिस्तान संबंध)  के कारण ये रूट बंद था इसलिए जैसे ही इस विमान ने गलत रूट लिया, फौरन ही एयर डिफेंस को अलर्ट कर दिया गया और सुखोई लड़ाकू विमानों को स्क्रैमब्ल (SCRAMBLE) किया गया. 

जानकारी के मुताबिक, उस वक्त ये विमान करीब 27 हजार फीट की ऊंचाई पर था और पता चला कि एक एएल12 विमान है. इसके बाद ना तो इंटरनेशनल डिस्ट्रेस फ्रीकवंसी और ना ही विजयुल सिग्लन का इस विमान ने जवाब दिया. इसके बाद सुखोई विमानों ने इसे गिराने की चेतावनी दी, तब जाकर पायलट्स ने जवाब दिया और बताया कि विमान तिब्लसी (जार्जिया की राजधानी) से दिल्ली आ रहा था कराची के रास्ते. 

इसके बाद इस विमान को जयपुर मे जांच पड़ताल के लिए जयपुर ले जाया गया जहां पर इसके पायलट्स से पूछताछ की जा रही है. पूछताछ में पता करने की कोशिश की जा रही है कि आखिर प्लेन डेवियेट क्यों हुआ. ये विमान किन कारणों से दिल्ली आ रहा था और क्या इसमें कोई सामान था. 

सूत्रों के मुताबिक, ये एएन12 विमान यूक्रेन की एक एयरलाइंस कंपनी का है जो कार्गो की नॉन-शेडूय्लूड सर्विस देती है. यानि की घंटे या फिर किलोमीटर के हिसाब से अपने इन विमानों को किराये पर देती है. यूक्रेन की ये कंपनी एयरक्राफ्ट के इंजन भी बनाती है. 

आपको बता दें कि ये एएन12 विमान पूर्व सोवियत संघ में बनाए गए थे जिन्हें आज भी कई देश इस्तेमाल कर रहे हैं. भारतीय वायुसेना भी एक समय में इन एएन12 विमानों का इस्तेमाल करती थी. लेकिन 90 के दशक मे ये रिटायर हो गए थे. आजकल भारतीय वायुसेना एएन32 विमान ओपरेट करती है. 

आपको बता दें कि बालाकोट एयर-स्ट्राइक के बाद और उसके बाद उपजे हालात के बाद से ही भारतीय वायुसेना बेहद अलर्ट है. पाकिस्तान की तरफ से आनी वाली सभी फ्लाईट्स को भी दक्षिण भारत के रास्ते से ही भारत की एयर स्पेस में दाखिल होने की इजाजत है. ऐसा ना करने पर भारतीय वायुसेना आदेश ना मानने वाले विमान के खिलाफ जरूरी कारवाई कर सकती है. पाकिस्तान ने भी बालाकोट हमले के दो महीने बाद तक भी अपनी एयर-स्पेस को पूरी तरह से नो फ्लाईंग जोन घोषित कर रखा था. 

अब अक्षय कुमार के युद्धपोत पर होने से बरपा हंगामा


पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी द्वारा नौसेना के एयर-क्राफ्ट कैरियर, आईएनएस विराट को निजी-टैक्सी की तरह इस्तेमाल करने का विवाद थमा भी नहीं था कि अब कांग्रेस की एक नेता ने ट्वीटर पर अक्षय कुमार को नौसेना के युद्धुपोत पर सवार होने पर सवाल खड़े कर दिए हैं. कांग्रेस का सोशल मीडिया संभालने वाली दिव्या स्पंदना ने इसको लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को कटघरे में खड़ा कर दिया है. लेकिन लेखक‌
को पुख्ता जानकारी है कि इसके लिए अक्षय कुमार को नौसेना ने आमंत्रित किया था. मौका था इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू (आईएफआर) का, जो विशाखापट्टनम में वर्ष 2016 में हुआ था. लेखक भी इस अंतर्राष्ट्रीय कार्यक्रम की कवरेज के लिए वहीं मौजूद था. 

पेशे से एक्टर दिव्या स्पंदना ने अपने ट्वीटर एकाउंट पर एक फोटो साझा की जिसमें अक्षय कुमार सैल्यूट की दशा में नौसेना के युद्धपोत, आईएनएस सुमित्रा में सवार हो रहे हैं. साथ में नौसेना के अधिकारी भी है. इस पर टिप्पणी करते हुए दिव्या ने लिखा है, "ये ठीक था? नरेन्द्र मोदी आप एक कनाडा के नागरिक अक्षय कुमार को अपने साथ आईएनएस सुमित्रा में ले गए." साथ में उन्होनें एक लिंक भी शेयर किया और हैशटैग लिखा 'सबसे बड़ा झूठा मोदी.'

दरअसल, 5-6 फरवरी को विशाखापट्टनम में भारतीय नौसेना ने आईएफआर का आयोजन किया था. इस कार्यक्रम में दुनियाभर की 48 देशों की नौसेना ने हिस्सा लिया था. 6 फरवरी को देश के राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने प्रेसिडेंशयल-यॉट में अंतर्राष्ट्रीय जंगी बेड़े की समीक्षा भी की थी. इसके लिए नौसेना के जहाज, आईएनएस सुमित्रा को प्रेसिडेंशयल-यॉट में तब्दील किया गया था. इस जहाज में समीक्षा के वक्त सशस्त्र सेनाओं के सुप्रीम कमांडर (यानि राष्ट्रपति) के साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी. रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर, तीनों सेनाओं के प्रमुख. सहित कई गणमान्य व्यक्ति मौजूद थे. उसी यॉट में अक्षय कुमार भी मौजूद थे. 

कार्यक्रम खत्म होेने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने अक्षय कुमार के बेटे के कान मरोड़े थे, जिसका फोटो वायरल हो गया था. 

5 फरवरी को आईएफआर की ओपनिंग सेरेमनी थी जिसमें अक्षय कुमार के साथ साथ कंगना रनावत भी मौजूद थीं. सेरेमनी की ओपनिग के बाद नौसेना ने प्रेस रिलीज जारी कर दोनों को आईएफआर का ब्रेंड-एम्बेसडर घोषित किया था. 

लेकिन कार्यक्रम खत्म होने के बाद जब तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर ने एक प्रेंस कांफ्रेस को संबोधित किया, तो ब्रांड एम्बेसडर पर सवाल पूछा गया. इसपर रक्षा मंत्री ने साफ तौर से इंकार कर दिया कि आईएफआर को किसी ब्रांड एम्बेसडर की जरूरत है. उन्होनें साफ किया कि दोनों ही बालीवुड स्टार्स का लेकिन आमंत्रित किया गया था. इसके बाद नौसेना के प्रवक्ता ने भी मीडिया से सफाई दी कि अक्षय कुमार और कंगना रनावत आईएफआर के ब्रांड एम्बेसडर नहीं हैं. 

Thursday, May 9, 2019

भारत फ्रांस की नौसेनाएं कर रही हैं 'वरूणा' एक्सरसाइज



अरब सागर में इनदिनों भारत और फ्रांस की नौसेनाएं एक दूसरे की पनडुब्बी को खोजने का युद्धभ्यास कर रही हैं. इस युद्धभ्यास का नाम है वरूणा. हालांकि, ये दोनों देशों के बीच 17वां युद्धभ्यास है लेकिन खास बात ये है कि ऐसा पहली बार हुआ है कि कोई नौसेना अपनी परमाणु पनडुब्बी के साथ भारत की समुद्री सीमाओं में पहुंची है. वो भी युद्धभ्यास के लिए. इसके अलावा फ्रांस की नौसेना का एयरक्राफ्ट कैरियर, एफएनएस चार्ल्स डी गुएल और उसपर तैनात राफेल लड़ाकू विमान भी इस खास युद्धभ्यास का हिस्सा है जो 1 मई से 10 मई तक अरब सागर में चल रहा है. इस युद्धभ्यास का दूसरा चरण, अफ्रीकी देश, जिबूती में होगा, जहां पर कुछ समय पहले चीन ने अपना पहला विदेशी मिलिट्री-बेस बनाया है.

नौसेना के प्रवक्ता, कैप्टन डी के शर्मा के मुताबिक, युद्धभ्यास के पहले चरण का अभ्यास सात दिनों तक गोवा में चला था. जहां पर दोनों देशों के नौसैनिकों ने एक दूसरे के जंगी-जहाज, लड़ाकू विमान और पनडुब्बियों को समझने के साथ-साथ एक-दूसरे के वॉर-गेम्स के लिए टेबल-टॉप एक्सरसाइज की. आखिरी तीन दिन (8-10 मई) दोनों देशों की नौसेनाएं समंदर में एक्सरसाइज कर रही हैं.

फ्रांस की नौसेना की तरफ से वरूणा युद्धभ्यास में हिस्सा लेने के लिए चार्ल्स डी गुएल और एक परमाणु पनडुब्बी के साथ साथ दो विंध्वंसक युद्धपोत, फोरबिन और प्रोविंस, एक फ्रीगेट लाटुचे-ट्रेविले और टैंकर मार्ने हिस्सा ले रहे हैं. भारतीय नौसेना की तरफ से विमान-वाहक युद्धपोत, आईएऩएस विक्रमादित्य, डेस्ट्रोयर आईएनएस मुंबई, तेग-क्लास फ्रीगेट तरकश, शिशुमार क्लास पनडुब्बी, शंकुल और एक फ्लीट-टैंकर दीपक हिस्सा ले रहे हैं.

समुद्री युद्धभ्यास में दोनों देशों के युद्धपोतों ने एक दूसरे की पनडुब्बी को ढूंढने का काम किया. इसके लिए टोही विमान और हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल किया गया, साथ ही दोनों देशों के एयरक्राफ्ट कैरियर पर तैनात लड़ाकू विमान, राफेल (चार्ल्स डी गुएल पर) और मिग-29के (विक्रमादित्य पर) ने मिलकर पिजेन-आईलैंड पर मिलकर गोलाबारी की. साथ ही एयर-डिफेंस को और मजबूत करने के लिए इन फाइटर जेट्स को एयरक्राफ्ट कैरियर के बजाए डेस्ट्रोयर्स को दे दिया गया. इसके साथ साथ दोनों देशों की जंगी जहाजों ने एक दूसरे की युद्धकला और बारीकियों को समझने के लिए अपने अपने टैंकर-जहाजों से एक दूसरे के युद्धपोतों की फ्यूलिंग यानि ईधन भरने का काम किया. जानकारी के मुताबिक, दोनों देश के जंगी जहाजों ने एरयिल टारगेट्स पर गोलाबारी भी की।

आपको बता दें कि पाकिस्तान स्थित ग्वादर पोर्ट तैयार करने के बहाने अरब सागर में लगातार चीन की पनडुब्बियां घूमती रहती हैं. ऐसे में वरूणा एक्सरसाइज में समंदर में सबमरीन ढूंढने का अभ्यास काफी अहम हो जाता है.

जानकारी के मुताबिक, इस महीने के आखिर में दोनों देशों का जंगी बेड़ा, हार्न ऑफ अफ्रीका स्थित देश जिबूती की तरफ रूख करेगा. क्योंकि वरूणा एक्सरसाइज का आखिरी चरण वहीं पर होना है. जिबूती में फ्रांस नौसेना का सैन्य-अड्डा है. हाल ही में चीन ने भी जिबूती में अपना एक मिलिट्री-बेस तैयार किया है. अमेरिका का भी यहां काफी समय से एक बड़ा सैन्य-अड्डा है. यहीं से अमेरिका सीरिया और ईराक में अपने ऑपरेशन्स करता है. इसके साथ साथ सोमिलायाई समुद्री-लुटेरों पर नकेल कसने के लिए भी ये मिलिट्री बेस काफी महत्वपूर्ण हैं.

महा'विराट' आरोप पर बढ़ा विवाद, पूर्व कमांडर ने मोदी के आरोपों का किया खंडन


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के तत्कालीन पीएम राजीव गांधी और आईएनएस विराट के बेजा इस्तेमाल पर विवाद बढ़ गया है. अब आईएनएस विराट के कमांडर ने दावा किया है कि दिसम्बर 1987 में राजीव गांधी प्रधानमंत्री होने के नाते आधिकारिक तौर पर नौसेना के एयरक्राफ्ट कैरियर पर आए थे, ना कि छुट्टी मनाने के लिए. लेखक से फोन पर बातचीत में विराट के तत्कालीन सीओ (कमांडिंग ऑफिसर) विनोद पशरीचा ने कहा कि एयरक्राफ्ट कैरियर का इस्तेमाल पीएम और उनकी पत्नी (सोनिया गांधी को) लक्षद्वीप ले जाने के लिए इस्तेमाल किया गया था. 

दरअसल, बुधवार की शाम को राजधानी दिल्ली में एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आरोप लगाया था कि तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने नौसेना के विमान-वाहक यु्द्धपोत, आईएनएस विराट को छुट्टियां मनाने के लिए 'निजी-टैक्सी' की तरह इस्तेमाल किया था. साथ ही आरोप लगाया था कि छुट्टी मनाने के दौरान राजीव गांधी के साथ उनके इटली के रिश्तेदार भी शामिल थे. 

लेकिन विनोद पशरीचा ने साफ तौर से कहा कि राजीव गांधी लक्षद्वीप एक आधिकारिक मीटिंग के लिए गए थे. इसी लिए आईएनएस विराट से उन्हें वहां ले जाया गया था. उनके साथ उनकी पत्नी सोनिया गांधी भी थीं. ये मीटिंग आईलैंड्स के समूह से जुड़ी थी. पशरीचा ने कहा कि विराट पर कोई पार्टी नहीं हुई थी, जैसाकि इनदिनों आरोप लगाया जा रहा है. उन्होनें ये भी कहा कि इस दौरान कोई भी विदेशी नागरिक विराट पर नहीं आया था. ना ही अमिताभ बच्चन ही विराट पर आए थे. 

आईएनएस विराट, नौसेना का विमान-वाहक युद्धपोत था जो 30 साल देश की सेवा करने के बाद 2017 में रिटायर हो गया था। 

दरअसल, पीएम मोदी के आरोपों के बाद 1988 के इंडिया टुडे मैगजीन का एक लेख भी सामने आया है जिसमें ये लिखा हुआ है कि लक्षद्वीप में छुट्टी मनाने के दौरान राजीव गांधी के साथ उनकी पत्नी सोनिया गांधी और बच्चे तो थे ही साथ में इटली के रिश्तेदार सहित अमिताभ बच्चन का परिवार भी था. लेख का दावा है कि इस दौरान आईएनएस विराट वहां तैनात रहा था. हालांकि ये साफ नहीं हो पाया है कि क्या वाकई नौसेना ने उस वक्त आधिकारिक तौर पर इस लेख का खंडन किया था. गौरतलब है कि कि वायस एडमिरल पशरीचा (जिन्हें नौसेना में 'पाशा' के नाम से जाना जाता है) बाद में मुंबई‌ स्थित नौसेना की पश्चिमी कमान के कमांडिंग इन चीफ यानि सीेएनसी बनकर रिटायर हुए थे.

सूत्रों के मुताबिक, प्रधानमंत्री और उनका परिवार किसी भी युद्धपोत भी सवार हो सकता है. नौसेना से जुड़े सूत्रों ने एबीपी न्यूज से कहा कि किसी भी युद्धपोत के लिए ये बेहद ही गर्व की बात होती है कि कोेई पीएम उसपर सवार हो. क्योंकि 1987 में लक्षद्वीप में कोई लैंडिंग स्ट्रीप नहीं थी (जहां कोई जहाज उतारा जा सके) इसलिए पीएम और उनकी पत्नी को केरल की राजधानी त्रिवेन्द्रम से नौैसेना के एक हेलीकॉप्टर ने पिक किया था.  वहां से हेलीकॉप्टर विराट के डेक पर पहुंचा और फिर लक्षदीप गए थे. 

राजीव गांधी की इस यात्रा का जिक्र नौसेना की विराट पर जारी की गई कॉफी-टेबल बुक में भी हैं. इस बुक की एक तस्वीर में पशरीचा राजीव गांधी और उस वक्त के नौसेना प्रमुख, आर एच टहिलायनी दिख रहे हैं. बुक में राजीव गांधी एक युद्धभ्यास का जिक्र करते हैं और हस्ताक्षर करते हैं विजिटर बुक पर. साथ में विराट पर उनके मेजबानी की बात भी लिखी है. 

इस बीच पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल रामदास ने एक प्रेस वक्तव्य जारी कर पीएम मोदी के बयान का खंडन किया है. रामदास के मुताबिक, उस वक्त वे कोच्चि स्थित नौसेना की दक्षिणी कमान के कमांडर इन चीफ (सीएनसी) थे और जिस राजीव गांधी के दौरे के वक्त विराट पर मौजूद थे. इसके प्रेस स्टटेमेंट को उन्होनें पशरीचा, एडमिरल अरूण प्रकाश और वायस एडमिरल मदनजीत सिंह की तरफ से भी लिखा है. अरूण प्रकाश उस दौरान आईएनएस विंध्यागिरी के सीओ थे जबकि मदनजीत सिंह आईएनएस गंगा के सीओ थे. ये दोनों युद्धपोत विराट के साथ युद्धभ्यास में तैनात थे (जिसका जिक्र कॉफी टेबल बुक में भी है).

इस बीच विराट पर तैनात एक कमांडर (वी के जेटली) ने ट्वीटर
 पर आरोप लगाया है कि राजीव गांधी ने छुट्टिया मनाने के लिए आईएनएस विराट का इस्तेमाल किया था.

दरअसल, जो जानकारी सामने आई है‌‌ उसके मुताबिक अपनी आधिकारिक बैठक निपटाने के बाद राजीव गांधी और सोनिया गांधी लक्षद्वीप के बंगराम द्वीप छुट्टियां मनाने चले गए थे। वहां पर उन छुट्टियों को मनाने के लिए राहुल गांधी, इटली के रिश्तेदार और अमिताभ बच्चन का परिवार पहुंच गया था। 

Tuesday, May 7, 2019

अफगानिस्तान में शांति की राह नहीं है आसान


भारत में आम चुनावों की सरगर्मी के बीच सोमवार को विदेश मंत्रालय ने विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की एक फोटो ट्वीट की. फोटो कतर की राजधानी, दोहा की थी जिसमें विदेश मंत्री के साथ थे अमेरिका के खास राजनयिक, ज़लमे खलीलज़ाद, जो अफगानिस्तान में शांति स्थापित करने के लिए तालिबान से बात करने के लिए नियुक्त किए गए हैं. खास बात ये है कि ये फोटो ऐसे वक्त में आई जब कतर में ही अमेरिका और तालिबान के बीच शांति-वार्ता छठी बार फेल हो गई थी. दुनियाभर की तरह भारत भी इस वार्ता पर नजरें गड़ाए बैठा है कि आखिर क्या वजह है कि जिस देश की दुनिया में सबसे ताकतवर सेना है और पिछले 17 सालों से अफगानिस्तान में तालिबान से लड़ रहा है, वही अमेरिका आज तालिबान से बातचीत के लिए कैसे तैयार हो गया. 

क्या सुपर-पॉवर ने तालिबान के लड़ाकों के सामने घुटने टेक दिया हैं. लड़ाकें इसलिए क्योंकि अमेरिका भले ही पिछले 17 सालों से तालिबान के खिलाफ लड़ रहा हो, लेकिन वो तालिबान को एक आंतकी संगठन नहीं बल्कि 'मिलिशिया' या फिर एक विद्रोही संगठन मानता है. सवाल ये भी है कि जब आज अमेरिका जैसा देश तालिबान से वार्ता के लिए तैयार है तो क्या भविष्य में सीरिया या फिर ईराक में आईएसआईएस जैसे आतंकी संगठन के साथ एक टेबल साझा कर सकता है. क्या अमेरिका की सेना तालिबान से गुरिल्ला युद्ध करते करते थक गई है और इसलिए अफगानिस्तान को बीच मझधार में छोड़कर जाने के लिए तैयार है.  

लेकिन जब अमेरिका और तालिबान के बीच एक बार फिर शांति-वार्ता विफल हो गई है तो ऐसे में भारत के लिए क्या कोई खास संदेश है. क्योंकि खलीलज़ाद के साथ भारत की विदेश मंत्री के साथ फोटो भी लगभग उसी वक्त आई है जब वार्ता फेल होने की आई. माना जा रहा है कि तालिबान से शांति-वार्ता अमेरिकी सैनिकों की वापसी के समय को लेकर विफल हुई है। 

कम ही लोग जानते हैं कि 1947 से पहले तो अफगानिस्तान की सीमा भारत (वृहत-भारत) से मिलती ही थी, लेकिन पाकिस्तान से बंटवारे के बाद भी भारत और अफगानिस्तान के बीच करीब 65 किलोमीटर का बॉर्डर था. लेकिन 1948 के युद्ध के बाद हुए युद्धविराम उल्लंघन के बाद गिलगिट-बालतिस्तान (पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर यानि पीओके) का ये इलाका पाकिस्तान के हिस्से में चला गया. बाद में पाकिस्तान ने शगज़म घाटी का ये हिस्सा चीन को दे दिया था. इसके बावजूद अगर 90 के दशक के तालिबान के राज को छोड़़ दें तो भारत और अफगानिस्तान का संबंध बेहद करीबी रहा है. मौजूदा लोकतांत्रिक सरकार भी भारत के काफी करीबी है. भारत इस समय अफगानिस्तान में सबसे बड़े निवेशक-देशों में शामिल है जो सड़कों से लेकर, डैम और वहां की संसद की बिल्डिंग से लेकर अफगान सैनिकों को ट्रैनिंग देने तक का काम करता है. 

लेकिन, अगर अमेरिकी सैनिक अफगानिस्तान छोड़कर निकल जाते हैं, जो तालिबान और अमेरिका की शांति-वार्ता का एक अहम हिस्सा है तो क्या भारतीय सैनिक उस जगह को भर सकते हैं. इस पर अभी से कयास लगाना बाकी है. क्योंकि इस सवाल का जवाब बहुत हद तक 23 मई के बाद बनने वाली नए सरकार पर निर्भर करेगा. 

हालांकि अभी तक भारत अपने सैनिकों को अफगानिस्तान भेजने के लिए तैयार नहीं है. इसके दो-तीन मुख्य कारण हैं. पहला तो ये कि भारत अभी तक ब्लू-बेरेत यानि संयुक्त-राष्ट्र शांति-सेना के तत्वाधान में ही किसी दूसरे देश में अपने सैनिकों को भेजता है. भारत अभी भी अमेरिका के नेतृत्व वाले नॉटो या फिर किसी दूसरे अंतर्राष्ट्रीय-सैन्य मंच का हिस्सा नहीं है. दूसरा ये कि शगज़म-वैली के भारत के कट जाने से भारत का अफगानिस्तान से सीधा लैंड-कनेक्शन नहीं है. ऐसे में सैनिकों की मूवमेंट करना काफी मुश्किल हो जायेगा. हवाई-मार्ग से सैनिकों को भेजना काफी महंगा सौदा हो सकता है. तीसरा कारण ये भी हो सकता है कि भारत में बड़ी संख्या में मुस्लिम-जनसंख्या है. ऐसे में अफगानिस्तान में मुस्लिमों के खिलाफ लड़ना राजनैतिक तौर से भारत के मुस्लिमों के खिलाफ जा सकता है. 

साथ ही श्रीलंका में शांति-सेना भेजने का (कड़वा) अनुभव भी भारत झेल चुका है. लेकिन इस सबके बावजूद जिस तरह से पिछले कुछ सालों में भारत का कद वैश्विक स्तर पर बढ़ा है उससे किसी भी संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता. साथ ही भारत ने श्रीलंका में भेजी पीसकिपिंग फोर्स के अनुभव से भी काफी कुछ सीखा है. आज भारत की सेनाएं अमेरिका और रूस जैसे देशों के साथ बड़े युद्धभ्यास करती है. आपको बता दें कि ये युद्धभ्यास भले ही यूएन के चार्टर के तहत टेरेरिज्म के खिलाफ होते हैं लेकिन जिस तरह सुपर-पॉवर (खास तौर से रूस जैसी सेना) आतंकियों के खिलाफ अपने टैंक और हवाई-हमले के जरिए ऑपरेशन्स करती है उससे भारतीय सेनाओं ने काफी कुछ सीखा है और किसी भी तरह के मिशन को अंजाम देने में सक्षम है. 

कुछ समय पहले अमेरिका ने भारत को अफगानिस्तान में 'फुट ऑन सोल्जर्स' के लिए आमंत्रित किया था. क्योंकि अमेरिका का मानना है कि अफगानिस्तान की समस्या एक क्षेत्रीय समस्या है और इससे इस क्षेत्र की जो महाशक्तियां हैं वो निपटें (आपको बता दें कि अमेरिका एशिया-पैसेफिक रिजन में भारत को एक बड़ी शक्ति मानता है). लेकिन भारत ने ये कहकर पेशकश ठुकरा दी थी कि वो सिर्फ संयुक्त राष्ट्र के तत्वाधान में ही अपने सैनिकों को वहां भेज सकता है. 

दरअसल, 9/11 हमले के बाद अमेरिका ने अफगानिस्तान पर ये कहकर हमला किया था कि वहां कि कट्टरपंथी तालिबान-सरकार अल-कायदा और उसके मुखिया ओसामा बिन लादेन को सरंक्षण देती है. इसके बाद तालिबान सरकार को उखा़ड़ फेंक-कर वहां लोकतांत्रिक सरकार की बहाली तो हुई लेकिन 17 साल बाद भी तालिबान के लड़ाके करीब 50 प्रतिशत हिस्से पर कब्जा किए हुए हैं और करीब-करीब 75 फीसदी पर उनका प्रभाव है. अमेरिका सेना की मौजूदगी के बावजूद कोई सा दिन ऐसा जाता है जब तालिबान वहां कोई बड़ा हमला ना करता हो. यहां तक की शांति-वार्ता के दौरान भी वहां हमले हो रहे हैं.

अफगानिस्तान का इतिहास उठाकर देंखे तो पता चलेगा कि कोई भी देश और सेना आजतक पठानों के देश पर अपना दबदबा कायम नहीं कर पाई। लेकिन खुद अफगान के कबीलों का इतिहास भी खूनी-संघर्ष 
से भरा रहा है (जो शायद आज भी जारी है).

अमेरिका को शायद अब समझ चुका है कि अफगानिस्तान में शांति कायम करना एक टेढ़ी खीर है. साथ ही 9-11 हमले का गुनहगार, ओसामा भी मारा जा चुका है और अल-कायदा पर बहुत हद तक नकेल भी कसी जा चुकी है. ऐसे में अफगानिस्तान में रूकना अब फायदा का सौदा नहीं है. लेकिन भारत सहित कई देश चाहते हैं कि अमेरिका फौज को अभी कुछ समय और अफगानिस्तान में रूकना चाहिए. तब तक जबतक की अफगान सैनिकों को पूरी तरह से प्रशिक्षण कर तालिबान से लड़ने के काबिल ना बना दिया जाए.   

भारत अफगानिस्तान में शांति इसलिए भी कायम करना चाहता है ताकि जिस चाबहार बंदरगाह को भारत ने तैयार किया है उससे अफगानिस्तान के जरिए मध्य-एशियाई देश और रूस से सीधे लैंड कनेक्शन स्थापित किया जा सके, जो व्यापार और सामरिक तौर से भारत के लिए महत्वपूर्ण है. 

लेकिन इस शांति-वार्ता के बीच में तीन और अहम खिलाड़ी हैं जो किसी ना किसी तरह से अफगानिस्तान के लिए महत्वपूर्ण हैं. पहला है पाकिस्तान. अफगानिस्तान से जुड़ा होने के साथ साथ ये बात भी जग-जाहिर है कि पाकिस्तान के तालिबान से काफी करीबी संबंध हैं. अफगानिस्तान में जब तालिबान की सरकार थी तब पाकिस्तान की उससे दोस्ती किसी से छिपी नहीं थी. जबकि अफगानिस्तान की मौजूदा सरकार के दौरान पाकिस्तान के संबंधों में खटास आ गई है. आए दिन डूरंड-लाइन (दोनों देशों के बीच बॉर्डर) पर पाकिस्तान और अफगानिस्तान के सैनिकों के बीच झड़प की खबर आती रहती है. यही वजह है कि पाकिस्तान अब अफगानिस्तान की सीमा पर तारबंदी कर रहा है (जैसा भारत ने पाकिस्तान की सीमा पर कर रही है). हालांकि तालिबान भी इस डूरंड लाइन को नहीं मानता है और पाकिस्तान के बड़े हिस्से पर अपना दावा करता है. लेकिन इसी तालिबान को अमेरिका से शांति-वार्ता के लिए पाकिस्तान ने एक अहम भूमिका निभाई है. 

पाकिस्तान के अलावा रूस पर भी तालिबान को मदद देने के आरोप लगते रहते हैं. तालिबान का राज कायम होने से पहले शीत युद्ध के समय (80 के दशक) में रूसी सेना भी अफगानिस्तान में तैनात थी और वहां से जाने से पहले नजीबुल्लाह की 'पपेट' सरकार को अफगानिस्तान की सत्ता पर काबिज किया था. रूस भी अफगानिस्तान में शांति स्थापित करने की कोशिश कर रहा है. इसके लिए हाल ही में 'मास्को-फॉरमेट' में भारत ने भी 'नॉन-ऑफिसयल' तरीके से हिस्सा लिया. रूस भी चाहता है कि उसका कट्टर-दुश्मन, अमेरिका अफगानिस्तान से निकल जाए और फिर वहां अपना प्रभुत्व वहां एक बार फिर से कायम कर ले. लेकिन ये इतना आसान नहीं है. क्योंकि तालिबान को मुख्यधारा में लाना और फिर चुनाव के लिए तैयार करना एक बड़ी चुनौती है. क्योंकि तालिबान शरिया और कट्टर इस्लामिक विचारधारा को मानने वाला संगठन है. शांति कायम ना होने के चलते अफगानिस्तान में राष्ट्रपति-चुनाव ही समय पर नहीं हो पा रहे हैं। 

लेकिन इस सब में चीन को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, जो एशिया हीं नहीं पूरे विश्व में एक महाशक्ति के तौर पर उभर रहा है और एशिया-पैसेफिक से लेकर अफ्रीका तक अपने पांव जमाने की भरपूर कोशिश कर रहा है. अफगानिस्तान की शांति बहाली से चीन वहां पर अपनी दूरगामी योजना, 'बेल्ट एंड रोड इनिशेयेटिव' (बीआरआई) को पसारने की कोशिश में रहेगा.  

Tuesday, April 30, 2019

भारतीय सेना के पर्वतरोही दल को मिले 'येती' के निशान


भारतीय सेना ने नेपाल के माऊंट मकालू पर्वत-श्रृंखला में हिम-मानव, येती के होने के निशानों का दावा किया है. येती के पैरों के निशानों के फोटो सेना ने जारी किए हैं. इन पैरों की लंबाई करीब 32 इंच और चौड़ाई 15 इंच है. येती के पैरों के निशान उस वक्त दिखाई पड़े जब भारतीय सेना का एक पर्वतरोही-दल माऊंट मकालू के लिए गया हुआ था. भारतीय सेना के इस दावे ने पूरी दुनिया में कौतहल पैदा कर दिया है. 

सेना ने दावा किया है कि येती के पैरों के निशान के फोटो और वीडियो को सबूत के तौर पर संबधित जानकारों को सौंप दिया गया है ताकि इसपर साईंटेफिक-स्टडी हो सके और इसपर लोगों की दिलचस्पी बढ़ सके. 

जानकारी के मुताबिक, भारतीय सेना का ये पर्वतरोही-दल 27 मार्च को राजधानी दिल्ली से माऊंट मकालू के लिए रवाना हुआ था. इस दल में चार अधिकारी, जो जेसीओ और 11 जवान शामिल थे. दल का नेतृत्व, कुमाऊं रेजीमेंट के मेजर मनोज जोशी कर रहे हैं. दल को राजधानी दिल्ली में डीजीएमटी (यानि सेना के डीजी, मिलिट्री-ट्रैनिंग) ने फ्लैग-ऑफ किया था. बताते चलें कि माऊंट मकालू पर्वत-श्रृंखला तिब्बत (चीन) से सटे नेपाल के खुंभु प्रांत में है और राजधानी काठमांडू से पूर्व की दिशा में करीब 180 किलोमीटर दूर है.  माऊंट एवरेस्ट की दूरी यहां से करीब 40 किलोमीटर है और कंचनजंगा 90 किलोमीटर है. 

सेना मुख्यालय के उच्च-पदस्थ सूत्रों ने एबीपी न्यूज को बताया कि 9 अप्रैल को जब पर्वतरोही दल माऊंट मकालू के रास्ते में लंगमारे-खारका में एक्लेमेटाईजेशन के लिए कैंप कर रहा था तब येती के इन रहस्यमयी पैरों के निशान दिखाई पड़े. तुरंत ही दल के सदस्यों ने कैलीपर की मदद से इन पैरों को नापा तो पता चला कि ये 32 इंच लंबे हैं और 15 इंच चौड़े हैं. लंगमारे-खारका की ऊंचाई करीब 3600 मीटर यानि करीब 12 हजार फीट की ऊंचाई पर है. जबकि माऊंट मकालू दुनिया की पांचवी सबसे ऊंची चोटी है जिसकी ऊंचाई करीब 8485 मीटर यानि करीब साढ़े 27 हजार फीट की ऊंचा्ई पर है. 

मकालू शब्द संस्कृत‌ से निकला है जो महाकाल यानि भगवान शिव से निकला है। स्थानीय‌ भाषा में उसे खुंभ-करण यानि विशालकाय‌ कहा जाता है। 

सूत्रों के मुताबिक, 10 दिन तक सेना के उच्च-अधिकारियों ने इन फोटो और वीडियो की गहन पड़ताल की और जब येती से जुड़ी पुरानी थ्योरी से मिलान  किया तो 29 अप्रैल की रात को आधिकारिक ट्वविटर और इंस्टाग्राम पर फोटो के साथ आधिकारिक तौर से इस जानकारी को साझा किया गया. आपको बता दें कि नेपाल की किवदंतियों में भी इसी माऊंट मकालू-बरूण नेशनल पार्क में ही येती को देखने का जिक्र आता है. 

ट्वविटर पर भारतीय सेना ने फोटो के साथ लिखा, "पहली बार भारतीय सेना के पर्वतरोही दल को 09 अप्रैल 2019 को मकालू बेस के करीब पौराणिक जंगली जानवर (बीस्ट) येती के 32X15 इंच के नाप के रहस्यमयी पैरों के निशान दिखाई पड़े. इससे पहले केवल मकालू-बरूण नेशनल पार्क में इस मायावी हिम-मानव को देखा गया है. "

सेना के मुताबिक, मेजर जोशी के नेतृत्व वाला पर्वतरोधी दल अभी माऊंट मकालू में ही ट्रैकिंग कर रहा है और जून के महीने तक ही वापस आने की उम्मीद है. मेजर मनोज भारतीय‌ सेना के ट्रैनड पर्वतरोही हैं और अबतक तीन बड़ी श्रृंखला चढ़ चुके हैं।

सेना के येती पर दावे के बाद सोशल मीडिया पर जबरदस्त चर्चा है। कुछ सेना की तारीफ कर रहे हैं तो कुछ खिंचाई कर रहे हैं। 

Friday, April 26, 2019

आईएनएस विक्रमादित्य में लगी आग, युवा अधिकारी की मौत


भारतीय नौसेना के एयरक्राफ्ट कैरियर, आईएनएस विक्रमादित्य में लगी आग में फंसकर लेफ्टिनेंट कमांडर रैंक के एक अधिकारी की मौत हो गई. ये घटना शुक्रवार की सुबह उस वक्त हुई जब आईएनएस विक्रमादित्य गोवा के करीब कारवार बंदरगाह में दाखिल हो रहा था. नौसेना ने घटना के जांच के आदेश दे दिए हैं.

भारतीय नौसेना के प्रवक्ता के मुताबिक, लेफ्टिनेंट कमांडर डी एस चौहान ने बहादुरी से आग बुझाने के काम का नेतृत्व किया. आग पर तो काबू पा लिया गया लेकिन इस दौरान आग और धुएं के कारण डीएस चौहान बेहोश हो गए. उन्हें कारवार स्थित नेवल हॉस्पिटल, आईएनएचएस पतंजलि ले जाया गया. लेकिन इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई.

जानकारी के मुताबिक, लेफ्टिनेंट कमांडर डी एस चौहान मध्य प्रदेश के रतलाम इलाके के रहने वाले थे और एक महीना पहले ही उनकी शादी हुई थी. चौहान, विमान-वाहक युद्धपोत आईएनएस विक्रमादित्य में एग्जुकेटिव ऑफिसर के पद पर तैनात थे और  फायर-फाइटिंग टीम का नेतृत्व भी करते थे. वे सीबीआरएन डिस्साटर यानि कैमिकल, बाईलोजिकल, रेडियोलोजिकल और न्युक्लिर अटैक से लड़ने में भी ट्रैनिंग ले चुके थे. 

जानकारी के मुताबिक, 1 मई से आईएनएस विक्रमादित्य को फ्रांस के नौसेना के साथ भारतीय नौसेना के साझा युद्धभ्यास, वरूणा में हिस्सा लेना है. इस एक्सरसाइज के लिए फ्रांस की नौसेना का एयरक्राफ्ट कैरियर, चार्ल्स डी गेयूल भी कारवार पहुंच रहा है जिसपर रफाल लड़ाकू विमान तैनात होते हैं. भारतीय नौसेना के सूत्रों के मुताबिक, क्योंकि विक्रमादित्य में आग इंजन रूम में लगी थी और समय रहते काबू पा लिया गया था इसलिए विमान-वाहक युद्धपोत का ज्यादा नुकसान नहीं हुआ है और वो वरूणा एक्सरसाइज में हिस्सा लेगा.

बताते चलें कि आईएनएस विक्रमादित्य भारत का एकमात्र एयरक्राफ्ट कैरियर है जिसपर मिग-29के फाइटर जेट सहित कामोव, सीकिंग और चेतक हेलीकॉप्टर तैनात रहते हैं। हाल ही में पुलवामा और बालाकोट में हुई एयर-स्ट्राइक के बाद पाकिस्तान से हुई तल्खी के बाद विक्रमादित्य को अरब सागर में भारत-पाक आईएमबीएल यानि इंटरनेशनल मेरीटाइम बाउंड्री लाइन के पास तैनात किया गया था। उसपर करीब 1600 नौसैनिक तैनात होते हैं।